आगरा के गवर्नर इतबारी खां की भी मस्जिद है यहाँ !

आम लोग मुगल सम्राट जहांगीर से अधिक शहजादे सलीम को जानते हैं, जो अनारकली से बेपनाह मुहब्बत करता था. पर इतिहासकार अनारकली को काल्पनिक चरित्र मानते हैं. और शहजादा सलीम को एक महत्त्वपूर्ण मुगल शासक.

अकबर ने अगर अपने वफादार घोड़े की स्मृति में आगरा के मुख्य राजमार्ग पर उसकी प्रतिमा स्थापित की थी, तो उसके पुत्र जहाँगीर ने अपने वफादार दरबारी और शाही हरम के तत्कालीन अधीक्षक ऐतबारी खां के लिए उसी स्थल पर एक विशिष्ट शैली की गुम्बद युक्त मस्जिद का निर्माण कराया था.

आगरा शहर के गुरु-का-ताल गुरुद्वारे के ठीक सामने आगरा-दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग-२ पर यह अपेक्षाकृत छोटी मस्जिद १३ गुणा १० फीट के आकार की है. तीन मेहराबदार गेट वाली इस मस्जिद में इन मेहराबों के ऊपरी भाग में पर्शियन भाषा में इबारतें गढ़ी हुई हैं.

 

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ऐतबारी खां जहाँगीर के समय में सम्राट का सर्वाधिक विश्वसनीय दरबारी था. उसको महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी के रूप में शाही हरम का नाज़िर भी नियुक्त किया गया था. यह मस्जिद जहाँगीर में सन १६०५ में बनवाई थी. बाद में जहाँगीर ने उसे सन १६२२ में आगरा का गवर्नर नियुक्त किया, आगरा किले की सुरक्षा का प्रभारी बनाया और शाही खजाने की भी देखभाल उसी को सौंप दी. उसका असली नाम कुछ और था परन्तु सम्राट जहाँगीर ने उसे विश्वासपात्र होने के कारण “इतबारी खां” का टाइटल दिया था.

बताया जाता है कि सन १६२३ में जब युवा शहजादे शाह जहाँ ने अपने पिता सम्राट जहाँगीर के विरुद्ध बगावत कर सत्ता हथियानी चाही थी, तब इतबारी खां ने ही उस विद्रोह को सफलतापूर्वक कुचला था. इससे प्रभावित होकर सम्राट ने उसे “मुमताज़ खां” कि एक नई पदवी और ६००० जट तथा ५०० सवार का ईनाम दिया था. उसी वर्ष इतबारी खां की मृत्यु हो गयी थी.

कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि यह मस्जिद इतबारी खां ने अपने उपयोग के लिए नहीं बनवाई थी. सूफी संत ख्वाजा कफूर के लिए यह मस्जिद इतबारी खां ने सम्राट जहाँगीर से अनुरोध कर के बनवाई गई थी. साथ में आराम के लिए एक कक्ष और पानी के लिए कुएं की भी स्थापना की गई थी. यह सब संरचनाएं और स्थल इतबारी खां के नाम से ही जाना जाता है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित हैं.

बताते हैं कि उस परिसर में अकबर के प्रिय घोड़े की प्रतिमा पहले नहीं थी. उसकी यह प्रतिमा तथा कब्र थोड़ा दूरी पर उस जगह थी जहाँ दिल्ली-आगरा रेलमार्ग की पटरियां हैं. ब्रिटिश समय में सन १९२२ के आसपास घोड़े की इस प्रतिमा और समाधि स्थल को विस्थापित कर इस मस्जिद के निकट वर्तमान परिसर में शिफ्ट किया गया था.

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यद्यपि यह स्मारक संरक्षित संरचनाओं की सूची में चिन्हित है, पर इसकी देखभाल के लिए कोई कर्मचारी अलग से नियुक्त नहीं है. अधिकतर इसके मुख्य द्वार पर मोटा ताला लटका रहता है, और अंदर बेतरतीब घास उगी दिखती है.

(चित्र: राजगोपाल सिंह वर्मा)

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स्त्रियोचित होना नैसर्गिक है क्या?

एक महान विचारक ने कहा था,
‘स्त्री पैदा होती नहीं…
बनाई जाती है’.
उसमें डाले जाते हैं कुछ तत्त्व,
जो करते हैं उसे पुरुषों से भिन्न
जैसे स्नेहिल प्रकृति,
प्रफुल्लता का आवरण,
करुणा की देवी,
शिशुवत सहजता,
संवेदनाओं की अनुभूतियां,
मधुरभाषिणी,
सदैव उष्मीत व उर्जित,
नैसर्गिक रूप से
समझदार भी हो वह स्वयं,
और दूसरों का समझे मन,
सहज़विश्वासी हो,
और हो दयालु,
कर सके निःस्वार्थ समर्पण,
देकर तिलांजलि
स्वयं की भावनाओं की!

और कैसे होते हैं हम पुरूष…
आक्रामकता होता पहला लक्षण,
महत्त्वाकांक्षी भी होते,
विश्लेषण करते पहले,
फिर पत्ते अपने खोलते,
प्रतिस्पर्धा में खो देते,
न जाने कितनी दिन-रातें,
आत्मनिर्भर खुद को समझते,
शासक भी स्वयं बन जाते,
करते निर्धारित दायरे,
खुद ही मानक बना डालते!

दैहिक विविधता से प्रबल है स्त्री
सांस्कृतिक अस्मिता भी है
अर्थपूर्ण उसके लिए,
स्त्रीत्व का पुनर्जीवन
कहीं बदल न दे
स्त्रियोचित होने की
कुछ परिभाषाएं,
बहुत संभव है
कि पुरुषोचित गुण
हों जाएं निषेचित
उसकी भी कोख में,
फिर देखना तुम कि
अस्तित्व का संकट
किस पर आता है,
सिर्फ मुख्यधारा में
चाहती है आना वह भी
हक़ है जो उसका,
न घर का अलंकार है
और न प्राण प्रतिष्ठित देवी,
गर होती वह ऐसी ही
तो क्यूँ नहीं बन सकी
एक पहचान उसकी,
कब तक सहती रहे वह
एक पुराना… अनकहा दर्द
और जिये सिर्फ तुम्हारा मन,
स्त्री है वह.. तभी कारण हैं
गर्वित होने के उसके पास !

-Raj Gopal Singh Verma

आगरा किला और…. किस्सा अमर सिंह का !

मूल रूप से चौहान वंशजों की मिल्कियत है…. लाल पत्थरों से बना आगरा किला, जिसमें शाहजहाँ ने कुछ इमारतों को तोड़कर ताजमहल जैसे सफ़ेद संगमरमर की भी कई बेहतरीन संरचनाएं बनवाई. इसे कुछ लोग लाल किला भी कहते हैं, इतिहास के न जाने कितने महत्त्वपूर्ण पन्नों और किस्से-कहानियों को समेटे हुए है.

यह किला महमूद गजनवी, सिकंदर लोदी, इब्राहिम लोदी और फिर बाबर, हुमायूं, अकबर,जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब की सत्ता का केंद्र रहा. कुछ स्वर्णिम स्मृतियाँ, कुछ विद्रोह और हिंसा तथा षड्यंत्रों के कुछ किस्सों को भी यह खुद में दफन किये हुए है! आप शायद न जानते होंगे उस गेट का इतिहास जिससे आप इस किले में प्रवेश करते हैं. ‘अमर सिंह गेट’ है इस मुख्य द्वार का नाम. पर भला मुगल क्यूँ रखेंगे एक ठाकुर जागीरदार के नाम पर इस प्रवेश द्वार का नाम. मुगलों ने नहीं, यह नामकरण ब्रिटिश सरकार ने किया था. यह वही बेख़ौफ़ राजपूत था जिसने शाहजहाँ को अपनी ठाकुरियत का भरे दरबार में ऐसा उदाहरण दिया था, कि मुगल सम्राट भी घबरा कर छिप गया था.

किसी को ‘गंवार’, ‘जाहिल’ या ‘मूर्ख’ कहने के कितने दुष्परिणाम हो सकते हैं वह या तो मुगल सम्राट शाहजहाँ और उसके दरबारियों ने अनुभव किया होगा या नागौर के जागीरदार अमर सिंह राठौर के परिजनों ने. इन शब्दों के गलत उपयोग से ही शाहजहाँ के साले को भरे दरबार में जान से हाथ धोना पड़ा, और स्वयं सम्राट को भी छिप कर जान बचानी पड़ी थी.

अमर सिंह गेट

अमरसिंह राठौड़ मारवाड़ राज्य के राजघराने के राजकुमार थे पर अपने स्वछन्द और आत्मसम्मानी स्वभाव के कारण अपने पिता राजा गज सिंह द्वारा राज्य से निर्वासित कर दिए गये थे. बताते हैं कि इन्होने किसी डकैत को राजा की इच्छा के विरुद्ध पनाह दी थी, जिससे इनके पिता ने इन्हें परिवार से अलग कर दिया था.

इसके बावजूद अपने बेहतरीन युद्ध कौशल और वीरता से चंद दिनों में ही वह बादशाह शाहजहाँ के नजदीक पहुंच गए थे. शहंशाह ने उन्हें अपने सीधे अधिकार क्षेत्र वाले नागौर क्षेत्र का सूबेदार बना दिया. उन्होंने शाहजहां को अपनी वीरता से प्रभावित किया था जिसके पुरस्कार स्वरूप उन्हें नागौर का जागीरदार बनाया गया।

धीरे-धीरे मुगल दरबार में उनके बढ़ते हुए वर्चस्व से अन्य दरबारी ईर्ष्या रखने लगे. जब अमरसिंह नागौर जाकर रहने लगा तो उसके प्रति ईर्ष्या भाव रखने वाले लोगों ने बादशाह से उसकी मित्रता को समाप्त कराने के उद्देश्य से उसकी चुगली करनी आरंभ कर दी. शाहजहां भी अमरसिंह राठौड़ से धीरे-धीरे दूरियां बनाने लगा. संयोग की बात रही कि इसी समय नागौर और बीकानेर के दो गांवों (जाखपीया नागौर का, और सीलवा बीकानेर राज्य का) में सीमा विवाद की गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गयी. यह विवाद इतना बढ़ा कि दोनों पक्षों ने एक दूसरे के विरुद्ध युद्ध करने की तैयारियां करनी आरंभ कर दीं. अंत में 09 अक्टूबर 1642 ई. को दोनों पक्षों की सेनाओं में एक युद्ध हो ही गया.

इस युद्ध में यूं तो दोनों पक्षों को जन-धन की अपार हानि हुई, पर नागौर पर राठौड़ की सेना को तो पराजय का ही मुंह देखना पड़ा. उस समय अमरसिंह के लिए यह दोहरा संकट था. उसे जनधन की हानि तो उठानी ही पड़ी साथ ही पराजय का अपमान भी झेलना पड़ा. उसके कई महत्वपूर्ण साथी और सेनानायक इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गये थे. युद्ध के समय अमरसिंह नागौर में नही था, उसकी अनुपस्थिति में ही युद्ध लड़ा गया था. उसने अपनी पराजय का समाचार पाते ही नागौर आने का मन बनाया.

उस समय बीकानेर का राजा कर्णसिंह था. उसे पता था कि यदि अमरसिंह नागौर चला गया तो उसके जाते ही युद्ध की ज्वाला पुन: भडक़ सकती है जिसका परिणाम विपरीत भी आ सकता था इसलिए उसने बादशाह शाहजहां के सामने अमरसिंह की चुगलियां की. बादशाह ने अमरसिंह राठौड़ को नागौर जाने की अनुमति प्रदान नही की. इससे राठौड़ की क्रोधाग्नि और भी अधिक भडक़ गयी पर वह उस समय अपने मित्र और विश्वसनीय साथी गिरधर व्यास के द्वारा समझाने पर उस समय मौन ही रहा.

एक बार बिना अनुमति के शिकार पर जाने को लेकर अमर सिंह की शाहजहाँ से चुगली की गई और उस पर जुर्माना लगाया गया. यद्यपि शाहजहाँ इतना सख्त नहीं था, पर उसका साला सलावत खां अमर सिंह को बेइज्ज़त करने पर तुला था. मुगल काल में हाथी की चराई के लिए जो भूमि दी जाती थी उस पर भी कर लगाने का प्राविधान था. इस कर को उस समय ‘फीलचराई’ कहा जाता था. अमरसिंह राठौड़ के हाथियों के लिए दी गयी भूमि पर भी यह कर लगाया गया, परंतु उसे देने से अमर सिंह राठौड़ ने स्पष्ट इंकार कर दिया.

बादशाह शाहजहां तो इस पर मौन हो गया परंतु उसका साला सलावत खां ‘फीलचराई’ के लिए अमरसिंह पर निरंतर दबाव बनाता रहा. तब कहा जाता है कि अमरसिंह राठौड़ ने बादशाह से मिलने का निर्णय लिया. अमरसिंह राठौड़ को बादशाह के लोगों का अपने ऊपर ‘फीलचराई’ देने के लिए दबाव बनाना कष्टकर और अपमान जनक लगा. इतिहास के पन्नों में दर्ज ये दो घटनाएं ऐसी थीं कि जिन्होंने अमरसिंह राठौड़ को बागी बना दिया.

हालांकि अमरसिंह के अनुरोध पर बादशाह शाहजहां ने उसको मिलने का समय सहर्ष दे दिया. बादशाह अमरसिंह राठौड़ से रूष्ट अवश्य था पर वह चाहता था कि अमरसिंह के साथ किसी प्रकार का तनाव ना लिया जाए.

इसके विपरीत सलावत खां पर उस समय ‘फीलचराई’ लेकर अमरसिंह को अपमानित करने का भूत सवार था इसलिए उसने अमरसिंह के मुगल राजदरबार में उपस्थित होने पर उसे उत्तेजित करना आरंभ कर दिया. उसने उत्तेजक शब्दों का प्रयोग करना भी प्रारंभ कर दिया। उसने एक बार अमर सिंह को ‘गंवार’ और ‘जाहिल’ कहकर संबोधित किया.

अमरसिंह ने कुछ क्षण मौन रहकर सुना. बादशाह या किसी भी राजदरबारी ने सलावत खां को अमरसिंह के साथ किये जा रहे अभद्र और अशोभनीय वार्तालाप या व्यवहार करने से नही रोका. कहा जाता है कि वह अपनी सीमाएं लांघ गया, और अमरसिंह राठौड़ के लिए ‘मूर्ख’ तक कह गया. वार्तालाप के इस क्रम में बादशाह मौन ही रहा, परंतु उसके मौन में छिपे क्रोध को अमरसिंह समझ गया.

अंततः अपने लिए प्रयुक्त किये गये मूर्ख शब्द पर अमरसिंह राठौड़ अपना आपा खो बैठा। इसे सुनते ही अमरसिंह राठौड़ का स्वाभिमान, आत्माभिमान और उसकी निजता आदि सब जागृत हो उठा. अमर सिंह अचानक बड़े ही वेग से उठा और अपनी कटार को म्यान से निकाल कर भरे दरबार में सलावत खां की छाती में भोंक दिया। कटार का प्रहार इतना घातक था कि सलावत खां दरबार में ही ढेर हो गया.

इस घटना को देखकर सारा दरबार आश्चर्यचकित और सन्न रह गया. किसी ने भी यह अनुमान नही लगाया था कि मुगल सम्राट के दरबार में एक हिंदू जागीरदार अपनी वीरता और शौर्य का इस प्रकार प्रदर्शन कर सकता है? कहा जाता है कि घटना के पश्चात दरबार में एक भी व्यक्ति नहीं रुका, सब भाग गये. बादशाह स्वयं भी उठकर भाग निकला और अपने स्नानागार या रनिवास में जाकर छिप गया. किसी का साहस इस साढ़े छह फीटे राजपूत वीर का सामना करने का नहीं हुआ. चारों ओर भय का वातावरण बन गया.

अमर सिंह की हरकत शाहजहाँ का सिंहासन हिला देने जैसी थी. वह मुगल साम्राज्य को खुली चुनौती थी. अगले दिन अदालत में सम्राट ने घोषणा की कि अमर सिंह को मारने वाले को जागीरदार बना दिया जाएगा. हालांकि कोई भी अमर सिंह राठौर के साथ दुश्मनी मोल लेने के लिए तैयार नहीं था, क्योंकि उन्हें सिर्फ एक दिन पहले ही भरे दरबार में अमर सिंह के क्रोध का सामना करना पड़ा था परन्तु अर्जुनसिंह जो अमर सिंह का साला था, ने लालच में आकर गुप्त रूप से इस चुनौती को स्वीकार कर लिया.

अर्जुनसिंह ने चाल के तहत अमरसिंह से कहा कि शाहजहां को अपनी गलती का एहसास हो गया है और वे अमरसिंह जैसा योद्धा नहीं खोना चाहता. हालांकि अमर सिंह को शुरुआत में विश्वास नहीं था, परन्तु जल्द ही वे अर्जुनसिंह के विश्वासघात की कला के झांसे में आ गए.

इस बीच, शाहजहां की अदालत के सामने एक छोटा दरवाजा खड़ा किया गया था, जिससे अमर सिंह को अदालत में प्रवेश करने के लिए उसके सामने झुकना था. अमर सिंह सम्राट के सामने झुकने के लिए तैयार नहीं था. अर्जुनसिंह ने यह भांप लिया था. उसने अमर सिंह को इस तरह से प्रवेश करने को कहा कि उसकी गर्दन झुकने का आभास न हो. अमर सिंह ने उसकी सलाह मान ली, तभी अर्जुनसिंह दूसरी तरफ से आया और धोखे से अमर सिंह की छाती में खंजर घोंप दिया. अमर सिंह वही पर वीरगति को प्राप्त हुए तो अर्जुनसिंह ने उनका सर काटा और सम्राट के पास ले गया. लेकिन शाहजहाँ ने अर्जुन सिंह से वादा तो निभाया नहीं, उलटे बाद में अर्जुनसिंह को भी मार दिया गया.

अमर सिंह की मृत्यु की सूचना पर, उनकी पत्नी, मित्र भल्लू सिंह और राम सिंह के नेतृत्व में राजपूत सैनिकों के साथ किले पर हमला किया जहां अमर सिंह का शरीर पड़ा था। हालांकि, हजारों मुगल सैनिकों ने राजपूत बलों को घेर लिया पर राजपूत बलों ने भरपूर विरोध किया और अमर सिंह के शरीर को किले से निकालने में सफल हुए।

बाद में, किले का यह संकीर्ण दरवाजा लोकप्रिय रूप से अमर सिंह दरवाजा के रूप में जाना जाने लगा क्योंकि यह मुस्लिम सेना के ऊपर राजपूत बहादुरी का प्रतीक था। कुछ इतिहासकारों का दावा है कि शाहजहां ने स्थायी रूप से दरवाजा बंद करने का आदेश दिया क्योंकि यह उन्हें राजपूत बलों के हाथों से उनकी हार की याद दिलाता था. लोक कथा में उन राजपूत लड़ाकों की प्रशंसा में एक हृदयस्पर्शी गायन शैली विकसित हुई, जो स्वाभिमान के लिए लड़े और गर्व से मरे।

देखकर शाहजहाँ बादशाह भरे हुंकारे,
कह सलबत खान नू…”करो काम हमारे”

आयु औना ना कर, राजपूत रक्षा आँखर ….!”.

राजस्थान, पश्चिम उत्तर प्रदेश और पंजाब के ग्रामीण अंचलों में जब यह बोल कहीं सुनें तो समझियेगा कि अमर सिंह और उसके लड़ाकों की गाथा को नमन किया जा रहा है !

-राजगोपाल सिंह वर्मा.

मुश्किल है स्त्री होने का अहसास

स्त्री होने का अहसास
समझना थोड़ा
मुश्किल है वाकई,
क्यूंकि पुरुष का दंभ
उसे सोचने ही नहीं देता,
कुछ भी इतर
किन्हीं चाहरदीवारियों
से चंद पग आगे,
उसके लिए,
बंधी है वह
परिधियों में अपनी
एक अलिखित
संविधान-सी बनी
चाहता है पुरुष कि
उसकी दृष्टि
रहे जमीं पर ही,
यह प्रमाण पत्र है
उसके चरित्र का भी
पुरुष के लिए,
पर,
कुछ भी नहीं ऐसा बंधन
न सीमा कोई,
न वर्जनाएं और
न ही परंपरा का निषेध,
असहज़ है वह
सिर्फ स्त्री को लेकर
क्यूंकि
नीला आसमान और
फ़लक उसका
बहुत विस्तृत है,
हो सकता है,
विस्मृत हो जाएं
या फिर दरक जाएं
वह परिधियाँ,
कहीं उस वृहद स्थल में,
गुमनामी का जश्न
कभी मनता है भला,
समानता का दिखावा
नहीं भाता,
न श्रेष्ठ होने का गुरूर,
रुधिर तुम्हारा भी वही है
और मस्तिष्क
बेहतर है पाया
स्त्री ने भी!

किसने की थी अकबर महान के स्मारक की दुर्दशा ?

आगरा के सिकंदरा इलाके में स्थित है मुग़ल सम्राट अकबर महान का मकबरा जो तात्कालीन वास्तुकला का एक नायाब नमूना भी है, लेकिन बहुत काम लोग इस तथ्य को जानते हैं कि इस मकबरे में अकबर महान के अवशेष मौजूद नहीं हैं. न ही वहां तत्कालीन समय में मौजूद रत्नजड़ित पत्थरों, आभूषण तथा नायब बहुमूल्य कालीनों में से कुछ शेष बचा है.

अकबर महान ने अपने स्मारक का स्थल अपने जीते जी स्वयं चयनित किया था. उनके बेटे जहाँगीर ने पूरी तन्मयता से उनके शानदार मकबरे को तैयार कराया और उसे ऐसा भव्य रूप दिया कि दूर-दूर तक उसकी चर्चा होने लगी. तब तक ताजमहल का कोई नामोनिशान नहीं था, इसलिए लोग इस मकबरे की भव्यता से ही अभिभूत हो जाते थे.

औरंगजेब की धार्मिक असहिष्णुता तथा आक्रामकता की नीति ने मुग़लों की साख खराब करनी आरम्भ कर दी थी. ऐसे में, उसकी नीति का विरोध करने के लिए निकटवर्ती मथुरा के जाटों ने विद्रोह कर दिया. वे सिनसिनी (जो बाद में भरतपुर रियासत बनी) के स्थानीय जागीरदार राजा राम जाट के नेतृत्व में एकजुट हो गये. और मुग़ल साम्राज्य के गौरव अकबर के स्मारक को निशाना बनाने की ठानी.

विद्रोहियों के मन में औरंगजेब के प्रति इतना आक्रोश था कि उन्होंने उनके पड दादा के मसोलियम की ईंट से ईंट बजा दी.औरंगजेब की गुप्तचर सेवा लोगों में पनप रहे आक्रोश को भांपने में असफल रही. जब तक औरंगजेब की ओर से कोई कार्यवाही होती, विद्रोहियों ने सिकंदर स्थित अकबर के मकबरे की दुर्दशा कर दी थी.

विद्रोहियों ने स्मारक से सोना, चांदी, जवाहरात, दुर्लभ कालीन और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं को लूट लिया तथा जमकर तोड़फोड़ की. यह वह समय था जब औरंगजेब के नेतृत्व में मुग़ल साम्राज्य की सब जगह तूती बोल रही थी और उसका विरोध करने का दुस्साहस किसी में नहीं था.

दरअसल, राजा राम जाट का आक्रोश दोतरफा था. एक तो वह जबरन धर्म परिवर्तन के विरुद्ध था, दुसरे वह इसी विरोध के फलस्वरूप अपने पिता गोकुल सिंह को दिए गये मृत्यु दंड का भी बदला लेना चाहता था.

विद्रोहियों ने न केवल स्मारक में लूट को अंजाम दिया, बल्कि अकबर महान की कब्र को खोदकर उनकी हड्डियों को भी निकाल लिया और उन्हें सार्वजानिक रूप से जला दिया.

जब तक जान रही, तब तक राजा राम जाट और उसके सहयोगियों ने औरंगजेब के धर्मांतरण के प्रयासों का जोरदार विरोध जारी रखा. बाद में औरंगजेब ने उसे गिरफ्तार करने में कामयाबी पाई और उसके पिता की तरह सन १६८८ में उसे मृत्युदंड दिया.

ख़ास बात यह थी कि औरंगजेब की दिलचस्पी अपने पड़ दादा के स्मारक को उसके गौरवपूर्ण रूप में लाने की नहीं रही, वह केवल सोने, चांदी और गहनों की बरामदगी और अपने प्रभुत्व को कायम रखने में दिलचस्पी रखता था. वैसे भी औरंगजेब ने वास्तुकला तथा विशाल निर्माणों को अपनी प्राथमिकता कभी नहीं माना. इसी कारण अकबर महान का यह खूबसूरत स्मारक सैकड़ों साल बदहाली की स्थिति में रहा. इसकी वृहद् मरम्मत तथा पुनर्निर्माण करने का श्रेय ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लार्ड कर्ज़न को जाता है.

इतिहास का वह पन्ना…

कभी आगरा के किले में जाइए, जो उत्तर भारत की सत्ता का केंद्र हुआ करता था, तो आज भी उसकी दरो-दीवारें, हर ओर मुगलिया वास्तुकला की निशानी लाल पत्थर… कुछ सफेद संगमरमर में जडित रंगीन नगीने, और नक्काशियां, खूबसूरत पर अब थोडा वीरान से हो गये फव्वारे, सैर के लिए बाग़, सहेजी हुई पर काफी खंडहर-सी होती हुई न जाने कितनी इमारतें— जैसे एक-एक चीज़ बात करता हुआ इतिहास का एक पन्ना हो. वो इतिहास जो कभी मुस्कुराता है, गुनगुनाता है, कभी डराता है और कभी आक्रोशित करता है. पर, सत्ता या राजनीति गौरवान्वित नहीं करती हम जैसे लोगों को, न तब करती थी, न अब करती है.

किले के दीवान-ए-ख़ास में शाही दरबार लगा था. इत्र की महक से सभा खुशनुमा थी. पारिजात, गुलाब और गेदें की पंखुड़ियों से सजावट भी हुई थी, जिनकी खुशबू अलग ही महसूस की जा सकती थी. बिन मौसम के इन फूलों का इंतजाम न जाने कैसे किया गया होगा. जिस रास्ते से शाही सवारी को आना था, उस पर सुर्ख लाल रंग के कालीन बिछे थे. तब मुग़ल साम्राज्य में ईरान और अफगानिस्तान के नायाब गलीचे पसंद किये जाते थे. कुछ तो वहाँ के शाही खानदान से तोहफों में आते थे, और कुछ बड़े व्यापारी विक्रय करने लाते थे. कई बार उन्हें उनकी जायज कीमत के साथ मुंह माँगा ईनाम भी बख्शीश में मिल जाता था.

सम्राट नूरुद्दीन के सभा में आगमन की खबर आई. सब अपने-अपने स्थान से उठ खड़े हुए. दोनों हाथ पीछे बांधे दरबारियों की कतारें शाही सेना के अनुशासन को भी शर्मिंदा करने को आमादा थी. जनता में से बिना किसी कड़े पैमाने के चयन किये हुए यह दरबारी, जिनका सीना कुछ घमंड और कुछ अभिमान से तना रहता था, अपने राजा के समक्ष झुक कर सलाम बजा रहे थे. स्वाभिमान की कीमत कौड़ियों की थी वहां, सब जानते थे. और कोई चुनौती क्यूँ दे! वह अलग बात है कि हुज़ूर नुरुद्दीन या तो उन अदब से झुके हुए राजदरबारियों की तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहे थे, या वह इस स्थिति में ही नहीं थे कि उनकी संज्ञाएँ उन्हें मौके पर दिखने वाले भावों से भर सकें.

आठ खूबसूरत सेविकाएँ अगवानी कर रही थी उनकी. वह धीमे-धीमे चल रहे थे. ख़ास काले सिंहासन को और बेहतर ढंग से सजाया गया था. श्वेत-धवल मसनद और गद्दे हर तरह से अनुकूल दिखते थे. पर जैसे दिखते थे, उससे शायद कहीं बेहतर रहे होंगे. कोई भी उन पर बैठकर सुकून का अनुभव तो आसानी से कर ही सकता था… यह समझा जाना कोई कठिन नहीं था. पर, यह क्या, इतने नर्म स्थान और नाजुक रेशमी लचीले गद्दों पर मसनदों का सहारा लेने के समय भी बीते हुए कल का शहजादा सलीम खुद को संभाल नहीं पा रहा था. बैठने से पहले सम्राट दो बार लडखडाते दिखे. शाही अंगरक्षकों ने उहें सहारा देकर संभाला. जाहिर है कि उनकी स्थिति सामान्य तो नहीं ही थी.

“हुजूर की इजाजत हो तो आज की कार्यवाही शुरू की जाए!”, प्रधानमंत्री ने उनके व्यवस्थित रूप से बैठने के बाद स्वागत करते हुए कहा.

सम्राट ने हाथ के इशारे से इजाजत दी.

“सम्राट नुरुद्दीन उर्फ़ शेखू साहब के दरबार में यह प्रस्ताव रखा जाता है कि चूँकि आज शराब की आदत हमारे राज्य में एक खतरनाक नशा बन चुकी है, जिससे घर बर्बाद हो रहे हैं, और लोगों को हरामखोरी और नशे की आदत पड़ती जा रही है, इस लिए आज से, अभी से, पूरे देश की सीमाओं के दायरे में किसी भी तरह की शराब के बनाने, बिक्री और सेवन पर पूरी तरह से रोक लगाई जाती है….” किसी को कोई मशवरा देना हो तो बेशक दे सकता है, कहा उन्होंने.

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सभा में सन्नाटा पसर गया था. कुछ दरबारी सम्राट की आँखों के भावों को समझने का प्रयास कर रहे थे, और जो नजरों से थोडा दूर थे, वह अपने नजदीकी सिपहसालारों से फुसफुसाहट कर इस प्रस्ताव के निहितार्थ समझने की कोशिश कर रहे थे. यूँ ऊपरी तौर पर सबकी मौन सहमति दिख रही थी. प्रधानमंत्री ने आँखों-आँखों में पूरी सभा का जायजा लिया, उन्होंने एक बार फिर दोहराया,

“यह सभा जानना चाहती है कि क्या इस प्रस्ताव के सम्बन्ध में आप में से कोई अपनी राय या सुझाव या विरोध दर्ज करना चाहेगा? अगर हाँ तो बेशक अपना हाथ उठाये. यहाँ सबकी बात सुनी जायेगी”

यूँ प्रस्ताव अच्छा था पर सुझाव या विरोध का कोई स्वर नहीं उभरा. जैसे गूंगों- भरों की सभा हो तभी सम्राट की आवाज गूंजी,

“शराब से खराब कोई लत नहीं. न जाने इसने क्या-क्या गुल खिलाये हैं. हम खुद इसके शिकार रहे हैं. सोलह साल की उम्र से पीना शुरू किया, और यह जालिम आज तक हमें छोडती ही नहीं, या कहो तो हम ही नहीं छोड़ना चाहते इसे. बस बड़ी बात यह है कि हर रोज़ बीस प्याले की खुराख से घटाकर हम छह प्याले पर तो आ गये हैं… पर…”,

कहकर शहंशाह ने एक विराम लिया. प्रधानमंत्री ने अपलक देखा पर उनकी सुर्ख आँखों में कोई विशेष भाव न दिखा. उन्होंने गुनगुनाया,

“बेमुर्रव्त गर तुम हुए तो क्या…वो तुम थे,
हम भला भूल जाएँ तुमको…यह कैसे हो!”

“हुकुम में एक जगह दुरुस्त करना जरूरी है!”, शाही हुक्म जारी हुआ.

“जी हुजूर, हुक्म!”,

प्रधानमंत्री ने झुक कर समझना चाहा. दरबारी भी निगाह लगाए थे.

“जरूरत भर का निर्माण होते रहना चाहिए इस दवा का, जिसे न जाने क्या-क्या कहते हैं इसके चाहने वाले… सोचो, अगर यह न हो तो कुछ लोग जियेंगे कैसे! हम भी तो उन्हीं में से हैं. बाखुदा उसकी याद भर से ही सुरूर होने लगता है हमें तो. हमारे लिए तो यह दोहरी तलवार है”,

..और अपने ख़ास सेवक को इशारा किया उन्होंने. उसने सजी हुई चांदी की थाली में नक्काशीदार काम की धातु की सुराही और उसी तरह के चमकते गिलास में सम्राट का जाम बना कर उनके दरबार में हाज़िर कर दिया.

“सुनो…और जो बिना इजाजत के शराब या शराब-आसा पीते दिखे दिखे, उसे हुकुमउदूली में कम से कम पचास कोड़े मारकर हवालात में डालने और मुनासिब जुर्माने का भी मुकम्मिल इंतजाम रखा जाए”,

आदेश देते हुए उन्होंने शराब के खूबसूरत गिलास से एक और घूँट भरी. यूँ भी यह दूसरा ही गिलास था उनका.

सभा बर्खास्त हुई. दरबारी कमर के पीछे दोनों हाथ बाँधने की मुद्रा में आ गये थे. ठीक वैसे ही जैसे उनके आगमन के समय हुए थे.

…कल के मुगल वंश के चराग शहजादा सलीम, और आज के सम्राट नुरुद्दीन सलीम जहाँगीर की शाही हरम की ओर रवानगी की इत्तिला की जा रही थी.

अशोक महान और चन्द्रगुप्त मौर्य की परिकल्पना हैं ‘कोस मीनार’ !

अगर आप आगरा शहर में पुराने आगरा-दिल्ली मार्ग यानि मदिया कटरा से अकबर मकबरा की ओर गुजर रहे हों, और रास्ते में जिला कारागार मोड़ पर एक टावर नुमा संरचना दिखाई दे तो चौंकिए मत! यही ‘प्राचीन कोस’ मीनार है।

आज विश्व की सर्वाधिक लम्बी सडक ग्रैंड ट्रंक रोड पर एक निश्चित अंतराल पर ‘मीनारनुमा’ टावर की संरचनायें अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जूझ रही हैं। दरअसल यह संरचना शेर शाह सूरी और बाद में मुगल साम्राज्य में शाही काफिलों को दिशा तथा दूरी का ज्ञान तथा आसपास विश्राम के साधन मुहैया कराने के लिए बनाई गई थी, लेकिन वास्तविक रूप में इनकी कल्पना ईसा से तीन सौ वर्ष पूर्व सम्राट अशोक महान और चन्द्रगुप्त मौर्य ने कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना के रूप में की थी, लेकिन निर्माण की अविकसित तकनीक के कारण वह अधिक टिकाऊ नहीं हो सकीं।

भारत में अभी भी ‘कोस’ को दूरी नापने की एक माप (ईकाई) की मान्यता है, अर्थात अभी भी ग्रामीण इलाकों में बुजुर्ग लोग दूरी के लिये कोस का प्रयोग करते हुए मिल जाते हैं। प्राचीनकाल में यह चार हज़ार हाथ, अथवा किसी-किसी के मत से आठ हजार हाथ की दूरी का नाम था। आजकल यह दो मील (लगभग ३.२५ किलोमीटर) का माना जाता है। प्राचीन समय में किलोमीटर या मील से नहीं, कोस से मार्ग की दूरी मापी जाती थी।

आज के “कोस मीनार” शेर शाह सूरी के जी टी रोड पर बने वे स्तंभ हैं जो नीचे ज़मीन से नौ फुट ऊंचे अष्टकोणीय कोर्नीश और सत्रह फुट गोलाई लिए हुए हैं। कोस मीनार की कुल ऊंचाई २६ फुट और ऊपर की ओर गोलाई कम होते हुए दस फुट की गोलाई में कोर्नीश के साथ गोलाकार लिए बंद हो जाती है। नीचे से चौड़ी, चौकोर और मज़बूत आधार वाली कोस मीनार चूने और सुरखी में बनायी गयी छोटी ईंटों से बनी हुई हैं। कोस मीनारों की ऊंचाई लगभग पांच मीटर होती है। कोस मीनारों का गोलाकार २७ फुट के लगभग होता है। इन मीनारों पर चारों ओर थोड़ी थोड़ी दूरी पर चौकोर आले (खाने) बने हुए हैं। इन आलों की संख्या २४ है जो तीन पायदानों पर हैं। हर पायदान पर आठ चौकोर आले हैं। यह चौकोर आले कोस मीनारों की मरम्मत करने के लिए छोड़े जाते थे जिससे मीनारों में बार-बार छेद करने से बचाया जा सके। मरम्मत और रख्रखाव के समय मीनारों पर नीचे से ऊपर तक चौकोर आलों में लकड़ी की पेटी लगाकर बल्लियों को खड़ा कर, आपस में रस्सी से बांधकर, मचान बनाकर मीनारों की मरम्मत या पुताई का कार्य पूर्ण किया जाता रहा है।

कोस मीनारों के अष्टाकार भाग के नीचे 2×2 फुट के चौकोर और दो इंच गहरे आठ चौखाने निर्मित हैं, जिनमें रात्रि के समय प्रकाश व्यवस्था के लिए मशाल जला कर रखी जाती थी। इतिहास में उल्लेख है कि १५५६ से सन १७०७ तक अकबर औऱ उसके बाद जहांगीर व शाहजहां ने इस नेटवर्क को बढ़ाने का कार्य किया। मुग़ल शासकों ने लगभग एक हज़ार कोस मीनारों का निर्माण करवाया था। अकबरनामा में भी कोस मीनारों का उल्लेख है। कोस मीनारें मुख्यत: अविभाजित भारत, यानि बांग्लादेश, बंगाल के गांव सोनार से प्रारंभ होकर आगरा, मथुरा, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब के क्षेत्रों से होते हुए पाकिस्तान के पेशावर शहर तक बने हुए हैं। इन कोस मीनारों से यात्रियों को रास्ता पहचानने व दूरी नापने में मदद मिलती थी।

इन कोस मीनारों पर प्रशासन की ओर से एक अश्वारोही संदेशवाहक और शाही सैनिकों की नियुक्ति होती थी जो शाही संदेश और पत्र को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने का कार्य करते थे। कहते हैं कि भारत में पत्र भेजने की व्यवस्था इसी समय से और मीनारों के माध्यम से प्रारंभ हुई थी। इतिहास में इस तथ्य का उल्लेख है कि रास्ता भटके मुसाफिरों को पहले कोस मीनार को खोजना पड़ता था, तभी वह अपने गंतव्य की यात्रा फिर से जारी रख पाते थे।

कोस मीनारों में एक बड़ा नगाड़ा भी रखा जाता था जो प्रत्येक घंटे की समाप्ति पर बजाया जाता था। कोस मीनारों के पास स्थित सराय पर यात्री विश्राम कर अपनी थकान दूर किया करते थे। इन मीनारों को देखकर ही राजसी परिवार के लोग यह तय करते थे कि उनकी मंज़िल अभी और कितनी दूर है। बताते हैं कि ऐसी कुछ मीनारों के पास एक कुआं या बावड़ी होती थी, जहां पर कुछ देर बैठकर आराम किया जा सके और पानी पीकर प्यास बुझाई जा सके। मीनार के पास हरे-भरे पेड़ भी होते थे, जिससे छाया में बैठकर राहगीर आराम कर सकें। इन मीनारों पर राज्य की ओर से प्रबंधक नियुक्त होते थे जो दिन में लोगों की सेवा करते थे और रात में मीनार के ऊपर रोशनी करते थे, जिससे रात में भटके राहगीर को रास्ता मिल जाए। ईंट व चूने-गारे से बनी ये कोस मीनार हालांकि अपने अनुमानित समय से अधिक जी चुकी हैं, लेकिन रख-रखाव के अभाव में वह आज अपने अस्तित्व खतरे के लिए जूझ रही हैं।

यह भी कहा जाता था कि इस रास्ते में मूल रूप से लगभग ६०० मीनारें बनाई गई थी, लेकिन वर्तमान में कुल ११० कोस मीनार ही उपलब्ध हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार हरियाणा में ४९ कोस मीनारें हैं जिनमें से फरीदाबाद में १७, सोनीपत में सात, पानीपत में पांच, करनाल में दस, कुरुक्षेत्र में नौ हैं। ये कोस मीनार मुख्यत: दिल्ली, सोनीपत, पानीपत, कुरुक्षेत्र, अंबाला, लुधियाना, जालंधर, अमृतसर से पेशावर (पाकिस्तान) तक व दिल्ली – आगरा राजमार्ग पर फतेहपुर सीकरी, आगरा, और मथुरा में स्थापित हैं। आगरा और दिल्ली की मुख्य सड़कों के किनारे कोस मीनारें आज भी अस्तित्व में हैं। राजस्थान में भी जयपुर, बयाना और खानवा, जहां बाबर और राणा सांगा का युद्ध हुआ था, ये मीनारें इतिहास की गवाही देती हैं। अजमेर में जाकर भी यह रास्ता दिखाती हैं, वह बात अलग है कि नए हाइवे बनाने की प्रक्रिया में कुछ मीनारें मुख्य रास्ते से अलग सुनसान जगह या खेतों में कट गई हैं।

कुछ वर्ष पहले ही दिल्ली उच्च न्यायालय के एक आदेश से प्रशासन ने इन कोस मीनारों के पास से अतिक्रमण को हटाया है। यद्यपि भारतीय पुरातत्त्व विभाग ने इन कोस मीनारों को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया है तथा अधिनियम 1958 (24) के अनुसार इन्हें हानि पहुंचाना दंडनीय अपराध है |

-Raj Gopal Singh Verma