…बिंदास

उदासियों के साये, जो अभी तक थे, हावी मुझपर, मंडरा रहे थे, न जाने कब से, मेरे मन में, और देते थे दुविधा मुझे, तोड़ दी है हिम्मत उनकी, मैंने भी अंततः, अपने इरादों से, ......

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शब्द

शब्द वाहक हैं, अर्थ नहीं हैं स्वयं, क्यूँ गढ़ना चाहते हैं, हमको वह, या शब्दों को नहीं समझते हम, तीर से ज्यादा घातक, और मिसाइल से विनाशक,

पंडित जी !

डॉ वशिष्ठ अस्थि रोग के जाने-माने विशेषज्ञ हैं शहर में. पास में, नेशनल हॉस्पिटल में वह सप्ताह के केवल मंगलवार के दिन ही ओ पी डी में पेशेंट्स देखते हैं. मंगलवार का अपॉइंटमेंट तो मिस हो गया, अब लगभग १० किलोमीटर दूर सदर बाज़ार के निकट उनके आवास पर ही दिखाना पड़ेगा....

रहस्य

अब समझ में आया है, एक रहस्य मुझे, क्यूँ रोमांचित करती थी, कोरे कागज़ की गंध, क्यूँ पेन से होता था रोमांच मुझे, मुझको रचना था कुछ, जो तुमको पढना था, बस, यही बात थी, रूमानी सी वह,