मैंने भी एक दिन,
तलाशी ली,
अपनी उम्रदराज़,
जंग लगी,
उस अलमारी की,
जिसकी चाभियाँ,
खो चुकी थीं कब की,
और स्टोर कक्ष के,
एक अँधेरे कोने में,
थी जगह मुक़र्रर,
यूँ ही, स्थिर,
न जाने कबसे;
पुरानी डायरी,
के पन्नों के बीच,
रखे फूल,
कुछ पत्तियां,
मुरझा गये थे सब जरूर,
पर,
पहले प्यार की यादें,
कुम्हलाई नहीं थी,
कुछ खुशबू भी,
शेष थी अभी,
उस रूमाल में,
जिसके कोने में अब भी,
लिखा था पहला अक्षर,
मेरे नाम का,
और ख़त तुम्हारे,
जो मैंने तुमसे,
झूठ बोला था,
कि जला दिये थे मैंने,
मौजूद थे,
पर उदास बहुत,
पाया उनको,
झुर्रियां थी अब उनपर,
अकेलेपन को सहते,
एक हवा का झोंका
जो आया आज,
लगा है कि
मुस्कुराने लगे,
फिर से वह,
तुम्हारा चेहरा लगाकर,
उसी अंदाज में,
लगता है वाकई,
जवां हो गया है,
यह चंचल मन,
तुम-सी बावरी के लिये,
शायद एक बार फिर !

–राजगोपाल सिंह वर्मा 

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