(1)

चिनार के दरख़्त,
टूट कर बिखरते,
झरते पत्ते,
जैसे सिमट रही हों,
स्नेह की आकांक्षाएं,
इस आँचल में,
या फिर,
बिछ रही होे,
एक चादर खूबसूरत,
सुनहरी यादों की,
परत दर परत,
सूखे पत्ते,
बिना किसी सिद्धान्त के,
अभी भी गिर रहे हैं,
बेतरतीब,
और,
लाल-गुलाबी-सुनहरी;
खुशबुएँ,
बता रही हैं कि,
अहसास हैं जवां अभी;
मिलने की,
हसरतें,
ले रही हैं अंगड़ाइयां.

xx

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(2)

तुमने बात की है कभी,
इन हवा के झोंखों से,
या महसूस किया,
मुस्कुराना,
मंद-मंद इन पत्तियों का,
झूमना शाखाओं का,
शांत हैं यह जटाएं अभी,
छू रही हैं जो जड़ों को,
पर क्यूँ,
छाल पर दिया घाव,
मेरा ही नाम,
खुरच कर मेरे जख्मों को,
कहता था जो,
एक दीवाना खुद को,
हैरां हूं मैं,
इस अंदाज़ पर,
जो बता रहा है कि,
सूखे पत्तों को भी,
हुआ है इश्क,
बहती हवाओं,
और झूमती हुई,
इन शाखाओं,
और उनकी,
शोख अदाओं से !

–राजगोपाल सिंह वर्मा

 

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