अब समझ में आया है,
एक रहस्य मुझे,
क्यूँ रोमांचित करती थी,
कोरे कागज़ की गंध,
क्यूँ पेन से होता था रोमांच मुझे,
मुझको रचना था कुछ,
जो तुमको पढना था,
बस, यही बात थी,
रूमानी सी वह,
जो बसी है,
इस मन में,
आज भी,
और उकेरता हूँ,
मन को अपने,
कुछ पन्नों पर !

–राजगोपाल सिंह वर्मा

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