शुक्रिया;

जगाने के लिये,

मेरे वह अहसास,

जो हो गये थे सुषुप्त-से,

पर जिनसे है वजूद यह,

और हैं जो संबल,

जीवन्तता के;

तुम्हारा स्नेह,

अनमोल है मेरे लिये,

तुम्हारी अभिव्यक्ति,

और उसके प्रतीक शब्द,

प्रतिध्वनि हैं,

मेरी अंतरात्मा की,

अपार शक्ति है उनमें,

प्रदत्त ऊर्जा की,

मिलती  है हिम्मत मुझे,

इन संचित अहसासों को,

परिवर्तित करने में,

एक खूबसूरत से जूनून में;

तुम्हारी सोच भी,

देती है बल मुझे,

असाधारण,

और अद्भुत,

मेरे दुविधा के पलों में;

पता है मुझे,

यह भी,

कि अदृश्य होकर भी,

तुम बिल्कुल पास खड़े हो मेरे,

यहीं कहीं,

और,

वक्त आने पर,

संभाल लोगे मुझे,

नि:स्संकोच,

गिरने से,

फिसलने से,

या लड़खड़ाने से भी…

क्यूंकि,

तुम्हें विश्वास है कि,

मैं भी भरोसा हूँ तुम्हारा.

निश्छल, निष्कपट,

और निष्काम,

जैसे अनुकृति तुम्हारी  !

— राजगोपाल सिंह वर्मा

Advertisements