पिछले कुछ महीनों से गाडी पर निर्भरता काफी बढ़ गई थी. यूँ तो मेरे पास दुरुस्त हालत में बजाज पल्सर की बाइक है, जो बेसमेंट में गाडी के ठीक बगल में खड़ी रहती है, बाइक चलने का रोमांच अलग ही है, परन्तु सर्दियों में बाइक चलाना कतई भी अच्छा नहीं लगता, भले ही १०० मीटर दूर ही क्यूँ न जाना हो. सर्द हवा के झोंकों, और हाड़ कंपाती ठण्ड के मौसम में बाइक का उपयोग करना, और वह भी जब कि आपके पास फोर व्हीलर मौजूद हो, कोई अक्लमंदी का विकल्प तो है नहीं.

खैर, सर्दी अच्छी खासी थी. तीन दिन बाद मेरठ और नॉएडा के अपने सफ़र से आज शाम लौट आया हूँ. सरकारी काम के लिये तो चौबीस घंटों सरकारी गाडी व् ड्राईवर की सुविधा है. अगर व्यक्तिगत काम से कहीं अकेले जाना हो तो मुझे ट्रेन से भी बेहतर वॉल्वो में सफ़र करना सुहाता है. सही टाइम टेबल और सही स्थान से हर मौसम में लग्जरी बस जितनी सुगमता से आपको मिल सकती है, ट्रेन के विषय में, खासकर सर्दियों में तो ऐसा सोचना अकल्पनीय सा है. पुश बैक सीट पर थोडा आगे-पीछे फैलने की भी गुंजाईश होती है और कुशनिंग भी इतनी होती है कि उसे ए सी के चेयर कार की सीट से तो बेहतर ही कहा जा सकता है. उस पर कोहरा-धुंध तो ट्रेन के विलम्ब से चलने या रद्द होने का साल-दर-साल में सीजन भर का एक रटा-रटाया बहाना बन गया है रेलवे के लिये. मेरा घर आगरा के अन्तर्राज्यीय बस टर्मिनस के दो किलोमीटर के दायरे में होना भी स्टेशन के एक घंटे के मुकाबले पांच मिनट में पहुँचने की गारंटी की तरह है, क्यूंकि या तो ऑटो उस दिशा में जा रहे होते हैं या वाहन उधर से आ रहे होते हैं.

ऑटो से घर पहुंचकर फ्लैट की उस एक्स्ट्रा चाभी को लगाकर दरवाज़ा खोला, जो अक्सर मेरे पास रहती है. ड्राइंग रूम से ही दिख गया कि पत्नी बेडरूम में सिरहाने तकिया लगाकर रजाई में बैठी, कई रंगों के अधूरे स्वेटर की बुनाई के लिये ऊन तथा सलाइयों से जूझ रही है. यह स्वेटर वह अपने पडोसी मिसेस दुबे की पुत्रवधू के अजन्मे शिशु के लिये बना रही है. पिछले कई वर्षों के अंतराल के बाद पत्नी के हाथ ऊन और सलाइयाँ लगी हैं, और वह अपना पसंददीदा जूनून पूरी शिद्दत के साथ उतारने में जुटी है, यह जानते हुए भी कि उसकी स्लिप डिस्क की बीमारी में शरीर को जैसा आराम चाहिये वैसा वह उसे दे नहीं पा रही है. मुझे याद था कि कल उसका डॉक्टर से भी अपॉइंटमेंट था. कल, जो बीत गया है. उसने मुझे जाने से पहले बताया भी था और मैंने कहा भी था कि, ‘देखते हैं !’. क्या करूं, जाना भी जरूरी था, नहीं तो पता नहीं कौन सी और बड़ी मुसीबत मोल पड़ जाती.

डॉ वशिष्ठ अस्थि रोग के जाने-माने विशेषज्ञ हैं शहर में. पास में, नेशनल हॉस्पिटल में वह सप्ताह के केवल मंगलवार के दिन ही ओ पी डी में पेशेंट्स देखते हैं. मंगलवार का अपॉइंटमेंट तो मिस हो गया, अब लगभग १० किलोमीटर दूर सदर बाज़ार के निकट उनके आवास पर ही दिखाना पड़ेगा. मैंने सुबह ही पत्नी को तैयार रहने के लिए बोल दिया था. १०.३० बजे सुबह हम दोनों घर से निकल कर डॉक्टर के पास जाने के लिये नीचे उतरे. मैंने पत्नी को बगल की सीट पर बिठाया और इग्निशन स्टार्ट किया. …उफ्फ, यह क्या? इग्निशन घुर्र घुर्र की आवाज़ के साथ बंद हो गया. दो बार और कोशिश की पर वही स्थिति थी.

पत्नी ने उस समय जिस दृष्टि से मुझे घूरा, उसका वर्णन करने के लिये फिलहाल मेरे पास उपयुक्त शब्द नहीं हैं पर वह मुझे गुस्सा, तिरस्कार और हेय सा साबित करती नज़र का मिश्रण व अंदाज़ था उनका. उनका यह गुस्सा भी जायज लग रहा था. उधर, मुझे स्वप्न में भी यह अंदेशा नहीं था कि गाडी स्टार्ट ही नहीं हो पाएगी. कोई सवा साल ही तो हुए हैं, इसे लिये हुए. अर्थात मैं भी पूरी तरह से इस प्रकरण में निर्दोष ही था. यह निश्चित था कि बाइक पर मैडम के जाने का कोई चांस नहीं था. ऑटो उस रूट तक प्रतिबंधित हैं. वैसे ही उनको आम तौर पर भी बाइक पर बैठना अच्छा नहीं लगता, अब तो कमर का दर्द, जो हल्के से गड्ढे या टूटी-फूटी सड़क और स्पीड ब्रेकर पर असहनीय हो जाता था, के कारण मैं भी अब उन्हें बाइक पर नहीं ले जाना चाहता था.

मैंने कुछ क्षण सोचा, फिर स्टीयरिंग पर टेक लगाये हुये ही कंपनी के सर्विस सेंटर पर फोन मिलाया. सौभाग्य से मेरी गाडी के साथ सम्बद्ध एग्जीक्यूटिव भान सिंह से फोन मिला गया. “जी, मैं समझ रहा हूँ कि यह बेट्री की प्रॉब्लम हो सकती है, पर आपको गाडी तो यहाँ लानी पडेगी, तभी तो हम चेक कर पायेंगे”, यह कह कर वह अपना पल्ला झाड़ते नज़र आ रहे थे. अब उन्हें कैसे समझायें कि स्टार्ट हुए बिना गाडी को वर्कशॉप ले जाना कितना दुरूह कार्य हो सकता है. मेरी तमाम तरह की कोशिशों, या कहें मिन्नतों के बावजूद उसने इस काम में मेरी मदद करने में असमर्थता व्यक्त कर दी.

पत्नी का मूड उखड चुका था. उसने अपना पर्स, डॉक्टर के पर्चों और रिपोर्ट्स वाली पालीथीन की थैली को समेटा और बुदबुदाते हुए पहली मंजिल पर घर जाने के लिये जीने की और चल दी. मैं अभी भी गाडी के स्टीयरिंग व्हील पर ही था, मैंने एक प्रयास और किया, परन्तु इस बार बैटरी बिलकुल फुस्स हो गई लगती थी, क्यूंकि अब घुर्र-घुर्र की आवाज़ भी नहीं निकल रही थी.

मैंने बिना समय खोये किसी बैटरी मैकेनिक को ढूँढने की ठानी. नजदीक ही ट्रांसपोर्ट नगर के अव्यवस्थित से और ऊबड़-खाबड़ सड़कों में आड़े-टेढ़े खड़े ट्रकों के बीच एक दुकान मिल गई जो केवल वाहनों की बैटरी के विक्रय का ही काम करता था. दूकानदार पहले ही तीन ग्राहकों से जूझ रहा था जिनमें से एक सरदारजी उसकी दी हुई बैटरी की शिकायत कर रहे थे और वह उन्हीं की गलती सिद्ध करने में अपनी पूरी ऊर्जा जाया कर रहा था. उसने मुझे एक बार देखा जरूर, पर फिर से सरदारजी से बहस में नईं ऊर्जा के साथ जुट गया. मैंने उसे टोकने की कोशिश की, तो उसने मुझे हाथ के इशारे से रोकते हुए सरदारजी से अपना मल्ल युद्ध जारी रखा. बहस से ध्यान हटाने के लिये अंततः उसने मुझसे अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिये पूछ ही लिया, “हाँ जी, कौन सी बैटरी चाहिए आपको?”. मेरे बताने पर कि मुझे फिलहाल कोई बैटरी नहीं चाहिये, और, कि समस्या क्या है, उसने गर्दन हिलाकर संकेत बनाते हुये, लगभग ६० डिग्री एंगल पर मुंह फेरते हुये दूसरे ग्राहक से बात करनी शुरू कर दी, हालाँकि सरदारजी की समस्या भी अभी हल नहीं हुई थी, लेकिन वह अब जोर-जोर से बोलने के बजाय बुदबुदा रहे थे, और दुकानदार भी अन्य ग्राहक को एक्सआइड की बैटरी की क्वालिटी और अन्य ब्रांड्स के रेट में अंतर के गणित को समझा रहा था. मैं अभी भी उसकी दुकान के बाहर बने ढाई फुट के प्लेटफार्म पर अपने पैर और काउंटर पर एक कुहनी टिकाये उसे आशा भरी नज़रों से देख रहा था.

दो मिनट के लगभग होने को आये, तब उसने फिर मेरी और ध्यान दिया और बोला, “यहाँ आपको टाइम वेस्ट करने का कोई फायदा नहीं है. यहाँ तो आपको नई बैटरी ही मिल सकती है, आप एक काम करें कि कंपनी चले जायें, वो कुछ न कुछ इंतज़ाम जरूर कर देंगे….” मैंने उसे शून्य में देखा. पर वह मेरी और से बेपरवाह होकर अपने काम में जुट गया था. अब मैं उसे कैसे बताऊँ कि कंपनी में तो सबसे पहले ही बात की थी मैंने ! फिर भी, मैंने दुकानदार को धन्यवाद ज्ञापित किया और न जाने क्या सोचकर कंपनी के वर्कशॉप की राह पकड़ ली, जो ट्रांसपोर्ट नगर के ठीक विपरीत निर्भय नगर में स्थित था. लगभग साढ़े चार मिनट में मैं हाईवे के भयावह रूप से चीखते से बेतरतीब ट्रैफिक और चौराहे को क्रॉस कर मुख्य मार्ग से होता हुआ फोर्ड के वर्कशॉप पहुँच गया. गेट के बाहर मैंने दीवार के सहारे बाइक खड़ी की. अन्दर जाकर मेरी निगाहें भान सिंह को खोजने लगी. वह निश्चित रूप से वहां नहीं दिख रहा था. एक मैकेनिक ने बताया कि वह शायद बॉडी शॉप में है, जहाँ गाड़ियों के डेंटिंग और पेंटिंग का काम किया जाता है. मैं वहां पहुंचा, तो भान सिंह निश्चिंत होकर एक स्टूल पर बैठे, अपने सहयोगी के साथ सिगरेट के धुवें का खेल कर रहे थे.

मुझे देखकर भान सिंह ने अपनी व्यस्तता कुछ कम की. बोले, “सर, मैंने तो आपको बताया था कि यहाँ से कुछ नहीं हो पायेगा. दरअसल, आपने व्हीकल-टो फैसिलिटी के लिये भी तो अपना रजिस्ट्रेशन नहीं कराया हुआ है”. मेरे याद दिलाने पर कि उन्हीं के सुझाव पर मैंने कंपनी के माध्यम से ही लगभग एक महीना पहले ही कम्प्रीहेंसिव बीमा कराया था, जिसके लिए खर्च किये गए १८,९२० रूपये का दर्द मुझे अभी तक महसूस हो रहा था, तो उन्होंने तत्काल मेरा ज्ञानवर्धन किया, कि “सर, बीमे में बैटरी, टायर, प्लास्टिक पार्ट और टोइंग की सुविधा शामिल नहीं होती है”.

मैंने बिना कुछ वापिस जाने में ही उचित समझा, क्यूंकि उसका मेरी सहायता करने का कुछ मूड या मन दिख ही नहीं रहा था. बहस कर के अपना मन भी ख़राब करो, और काम वहीँ का वहीँ. क्या करूं…किसी प्राइवेट गेराज में… या कुछ और… समझ ही नहीं आ रहा था. अब यह समस्या पत्नी की बीमारी से भी बड़ी होती दिख रही थी.

मैं वर्कशॉप के गेट से बाहर आ गया. मोटरसाइकिल अपनी जगह खड़ी थी.  मैंने उसे स्टैंड से नीचे उतारा, सीट पर बैठा और स्टार्ट करने से पहले मनन किया. मुझे आईडिया आया— क्यूँ न खंदारी वाले पंडित जी की मदद ली जाये ! पंडित जी की तो छोटी सी कार एक्सेसरीज की दुकान है…क्या वो मेरी कोई मदद कर पायेंगे बैटरी को ठीक कर, गाडी को चलाने में ? पता नहीं, मुझे लगा कि हो न हो, वह कोई रास्ता जरूर निकाल देंगे… मेरा अंतर्मन कह रहा था कि अब तक मुझे यह विचार क्यूँ नहीं आया..और, मैंने फोन करने की बजाय उत्साह में उनकी दुकान की तरफ अपनी बाइक का रुख मोड़ दिया.

पंडित जी की आगरा विश्वविद्यालय के खंदारी कैंपस के पास एक छोटी सी, कामचलाऊ कार साज-सामान की दुकान थी, लेकिन वो स्वयं एक बेहतर कार इलेक्ट्रीशियन और ए सी मैकेनिक ज्यादा थे. जब लोगों की समस्या कंपनी के वर्कशॉप में भी दूर नहीं हो पाती थी तो पंडित जी का नाम लिया जाता था. और कोई गाडी हो, कोई मॉडल हो, पंडित जी के दिमाग में कंप्यूटर की तरह सबके इलेक्ट्रिक डायग्राम का जाल बीचा हुआ था. ऐसा कभी नहीं हुआ होगा, कि किसी गाडी की इलेक्ट्रिक फिटिंग की समस्या पंडित जी ने दूर न कर दी हो. और खर्चा ? एक बार मुझे अपनी गाडी के पिछले वाइपर को सुचारू करना था, तो कंपनी ने जो खर्चा बताया वह मशीन बदलने में रु. ९८०० का था, और पंडित जी ने उसे मात्र १५० रु. में ऐसा चालू किया कि आज तक कोई असुविधा नहीं हुई. कोई मशीन नहीं बदली गई, केवल कुछ कनेक्शन ठीक किये उन्होंने. उसपर उनकी जुबान की गारंटी कि कभी भी चले आना, निस्संकोच अगर कभी काम ना करे वो वाईपर ! पर, वैसी नौबत तो आई ही नहीं कभी. मोबाइल चार्जिंग के लिये यू एस बी पोर्ट के तो उन्होंने मुझसे पैसे ही नहीं लिये एक बार, मेरे बार-बार आग्रह के बावजूद. वो अक्सर मुझे अपनी सबसे प्रिय चेयर को झाड-पोंछ कर उसपर आग्रहपूर्वक बिठा देते और तल्लीनता के साथ भरी धूप में गाडी के साथ अपने काम में व्यस्त हो जाते.  एक छोटा सा कूलर भी था दूकान में, जिसको वे उस समय ऑन करना नहीं भूलते गर्मियों में. न जाने कितनी बार उन्होंने मुझे कुल्हड़ की स्पेशल लस्सी पिलाई होगी, और कभी कोई फल काटकर…सेब, केला, चीकू खिलाया या फिर चाय. मेरे ऊपर उनकी कुछ विशेष कृपा रही हो, ऐसा भी नहीं, वह सामान्य रूप से ऐसे ही व्यवहार के लिये जाने जाते थे. देखने में वह जितने दुर्बल लगते थे, काम करने में उतनी ही स्फूर्ति ेतथा ऊर्जा के धनी थे.

खैर, मैं लगभग छः-सात मिनट में पंडित जी की दुकान पर पहुँच गया था. बाइक खड़ी कर मैं ऊपर दुकान पर देखा तो दुकान तो खुली थी पर वहां कोई नहीं था. यह कोई ख़ास बात नहीं थी, अक्सर ऐसा होता था. फोन करने पर वह कहीं से प्रकट हो जाते या क्षमा मांग लेते, तुरंत ना आ पाने के लिये.  मैंने दुकान पर खड़े-खड़े ही उनको फोन लगाया. कुछ देर बाद पंडित जी ने कॉल पिक की. उन्होंने अभिवादन के बाद काम पूछा. ट्रैफिक की आवाजों से स्पष्ट था कि वह रास्ते में हैं. मैंने उन्हें अपनी समस्या बताते हुये कुछ अर्जेंट व्यवस्था के लिए अनुरोध किया. उन्होंने कुछ क्षण सोचा, और कहा, “ठीक है सर, आप घर पहुँचो. मैं नजदीक पहुँच कर आपको फोन करता हूँ. हो जाएगा आपका काम !”

मुझे इतनी प्रसन्नता हुई कि मैं व्यक्त नहीं कर पा रहा हूँ, पर मुझे अपनी मूर्खता पर पश्चाताप हो रहा था कि पंडित जी से संपर्क करने का विचार मुझे पहले क्यूँ नहीं आया. इस भागदौड़ में लगभग पौने दो घंटे बीत चुके थे. मैं तत्काल घर लौट आया और मुंह-हाथ धोकर फोन की प्रतीक्षा करने लगा पंडित जी के. पत्नी समझ चुकी थी कि आज की डेट में तो डॉक्टर के पास जाना संभव नहीं हो पायेगा, इसलिए वह अपने कपडे बदलकर टीवी पर दिन में ही अपने किसी पसंदीदा कार्यक्रम को देख रही थी, या देखने का उपक्रम कर रही थी. मैंने उसे स्थिति से अपडेट कराना चाहा, परन्तु उसने कोई रूचि न लेकर टीवी का वॉल्यूम बढा दिया. अब मैं कैसे समझाऊँ कि इस सब में मेरा कोई दोष नहीं.

मोबाइल की घंटी बजी. एक निगाह घडी पर डाली तो समझ में आ गया कि मुझे वापिस लौटे मात्र १७ मिनट ही हुए होंगे. पंडित जी की कॉल थी, वह घर के पास ही, पोस्ट ऑफिस के सामने खड़े थे, वही पॉइंट जो मैंने उन्हें समझाया था. मैंने उन्हें रास्ता बताया और तेज़ी से स्वयं भी जीना उतर कर घर के बाहर आ गया. ३० सेकंड नहीं हुये होंगे कि पंडित जी अपने पुराने वेस्पा स्कूटर पर एक साथी और एक स्टैंड-बाई बैटरी के साथ मौजूद थे.

इस पौने दो, या दो घंटों की भागदौड़ में मैं इस सीमा तक निराश हो चुका था कि मुझे पंडित जी का आना एक अद्भुद घटना लग रही थी. ऐसा लग रहा था कि वह मुझे मेरे जीवन की सबसे बड़ी समस्या से उबारने के लिये ईश्वरीय दूत बनकर प्रकट हुये हैं.

पंडित जी ने बिना समय व्यय किये, गाडी का बोनट खोला. उनके साथ आये व्यक्ति ने बैटरी को गाडी में लगी बैटरी के पॉइंट्स को अपनी बैटरी से एक लीड से टच कर मुझे इग्निशन लगाने का निर्देश दिया. वाह ! एक ही सेल्फ में गाडी चमत्कार की तरह स्टार्ट हो गई. मेरा दिल प्रसन्नता से भर आया और पंडित जी का आभार व्यक्त करते हुये मैं भावुक हो उठा. मैंने पंडित जी से इस सबके लिए खर्चा पूछा, तो उन्होंने हंस कर मना कर दिया. उनके शब्दों में, “सर, मेरी इसमें कोई लागत थोड़े ही आई है, जो मैं आपसे खर्चा लूँगा. बस, मैं कहीं रास्ते में था, वहां कल चला जाऊंगा.” मुझे पंडित जी की सह्रदयता ने निरुत्तर कर दिया. कम से कम आने-जाने में रु. ५० का पेट्रोल तो लगा ही होगा. और फिर इन कामों में तो हुनर का खर्च देय होता है, वह तो उनका बनता ही था. पर, उन्हें पैसे नहीं लेने थे, सो उन्होंने नहीं लिये, मुझे दृढ़ता से मना कर दिया.

चूँकि वह पहली बार मेरे घर आये थे, अतः मैंने उनसे ऊपर चलकर एक कप चाय पीने का आग्रह किया. लेकिन उन्होंने विनम्रता से अस्वीकार कर दिया और हाथ जोड़कर वापिस हो लिये. मैं उन्हें लगभग दो दशक पुराने वेस्पा स्कूटर पर जाते हुये देखता रहा जो अजीब सी आवाजों के साथ-साथ सफ़ेद धुवें के गुबार छोड़ता चला जा रहा था.

किस्सा अभी खत्म नहीं हुआ है.

चूँकि डॉक्टर साहब प्रातः १० से दोपहर १ बजे तक ही बैठते थे, तो, आज का दिन तो मिस हो गया उन्हें दिखाने का. अगले दिन फिर डॉक्टर साहब के पास जाने का उपक्रम दोहराया जाना था. मैंने पंडित जी के निर्देशानुसार गाडी को १० मिनट तक स्टार्ट रखा. आज पत्नी को गाडी में बिठाने से पूर्व ही सावधानीवश मैं गाडी पहले ही स्टार्ट कर देख आया था. मैंने पत्नी को आवाज लगाई और वह अपने पर्स व पर्चों के साथ गाडी में आकर बैठ गई.

लगभग १५ मिनट बाद हम डॉक्टर वशिष्ठ के क्लिनिक पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके थे. आज हमारा अपॉइंटमेंट नहीं था इसलिये यूँ भी पेशेंट्स की भीड़ कुछ ज्यादा दिख रही थी. रिसेप्शन पर नाम लिखा कर हम लाउन्ज में बैठ गये, जहाँ लगभग १८-२० लोग पहले से अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे. हम भी  डॉक्टर साहब के केबिन की तरफ टकटकी लगाये देख रहे थे. यकायक डॉक्टर साहब के केबिन से घंटी बजी, जो इस बात का संकेत था, कि अगले मरीज़ का नंबर आ चुका है… चर्र की आवाज से उनका दरवाज़ा खुलते ही मैंने जो देखा, उस पर मैं यकायक यकीन नहीं कर सका. पर, यकीनन मैं जो देख रहा था, वही सच था.

पंडित जी एक हमउम्र महिला को एक ओर से सहारा देते हुये बाहर ला रहे थे. उसकी पीड़ा चेहरे पर साफ़ दिख रही थी. दूसरी ओर से उस स्त्री को एक लगभग १५ वर्ष के बच्चे ने संभाल रखा था, जो संभवतः उनका बेटा था. महिला के उदर के भाग पर खाकी रंग की चौड़ी पट्टी वाली वह बेल्ट कस कर बंधी थी जो स्लिप डिस्क के गंभीर रोगियों को बाँधने की सलाह दी जाती है.

मेरे कदम कब पंडित जी के पास पहुँचने की लगभग १५ फुट की दूरी नाप चुके थे, मुझे स्वयं ही पता नहीं चला. तब तक पंडित जी ने भी मुझे देख लिया था. वह चेहरे पर अपनी चिरपरिचित मुस्कुराहट ओढने की कोशिश करते दिख रहे थे. मैंने नजदीक जाकर उनका हाथ अपने हाथ में ले लिया. “क्या हुआ पंडित जी ?”, मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि कई वर्षों से उनकी पत्नी स्लिप डिस्क से गंभीर रूप से पीड़ित है. कल भी वह पत्नी को दिखाने के लिये ही निकल चुके थे, तभी मेरा फोन आ गया, और बात करने के बाद उन्होंने अपना प्रोग्राम टाल कर मेरी मदद करने का फैसला लिया था.

मैंने सरसरी तौर से उनके पर्चे पर निगाह दौड़ाई. फिजियोथेरेपी की कई एक्सरसाइज तथा कैल्शियम के तीन महीनों का इन्जेक्टिब्ल कोर्स भी उसमे पहले ही लिखा था. कुल मिलाकर १५ से १८ हज़ार रूपये प्रतिमाह का कुल खर्चा था—वो भी लगातार तीन महीनों तक. दरअसल, वह उन्हें इसलिये दिखाने आये थे कि डॉक्टर साहब कोई सस्ता विकल्प सुझा सकें. पर डॉक्टर साहब का कहना था कि आम दवाओं से और बिना फिजियोथेरेपी कराये इस गंभीर स्थिति में कोई ख़ास लाभ नहीं होने वाला.

मुझे याद है कि लखनऊ में रहते हुये पत्नी के गार्डनिंग के शौक और भारी-भारी गमलों को सर्वेंट के साथ-साथ स्वयं उठाकर इधर-उधर रखने की जिद से उसे जब स्लिप डिस्क की परेशानी हुई थी, तो मैं तो एक बार समझ ही नहीं सका था, कि यह क्या हो गया ! उफ्फ, उस असहनीय दर्द की केवल कल्पना ही की जा सकती है. किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉक्टर शर्मा के घर जब उन्हें मैं दिखाने ले गया था, तो चाहकर भी वह गाडी से उतरकर उनके क्लीनिक तक पहुँचने की हिम्मत नहीं कर पाई थी…एक-एक कदम चलना उनके लिये दर्द का घूँट पीने जैसा था…और इनकी हालत तो और भी ख़राब दिख रही थी. ना चाहते हुये भी सारा दृश्य मेरी आँखों के सामने किसी फ़िल्मी घटना के दृश्य की तरह कौंध गया. सर्दी का मौसम था, पर मेरे माथे पर पसीने की बूँदें चुहचुहा गयी थी. पंडित जी की पत्नी की हालत और मेरे कारण कल उनके अपॉइंटमेंट मिस होने की ग्लानि से मैं हतप्रभ हो गया था. साथ ही उनकी आर्थिक स्थिति में इलाज़ की क्षीण संभावनाओं को सोचकर मैं उलझन में पड गया.

जब तक मैं कुछ सोचता, पंडित जी ने मुझसे इजाजत मांगी. मैं उन्हें छोड़ने बाहर तक आया. बाहर पंडित जी ने जतन से अपनी पत्नी को स्कूटर पर बिठाया, बेटे ने एक ओर से सहारा देकर उसी स्कूटर पर अपनी बैठने की भी जगह बनाई, उन्होंने अपना हेलमेट लगाया, और अपने चिर-परिचित जोशीले अभिवादन के लिये एक हाथ ऊपर तथा गर्दन धीरे से नीचे झुकाई, उनकी पत्नी ने भी दर्द के बावजूद एक हल्की मुस्कान चेहरे पर ओढ़ी और अभिवादन में हाथ जोड़ दिये. स्कूटर स्टार्ट हो चुका था… पंडित जी अपने गंतव्य की ओर चल निकले.

…मैं यूँ ही खड़ा रहा कुछ देर वहां ! पंडित जी की पत्नी के दर्द का तो मुझे अनुमान नहीं, लेकिन मेरे अन्दर का दर्द बढ़ गया लगता था. ग्लानि से मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था कि कल वह मेरे कितना काम आये और मैं उनके लिये किसी काम का साबित नहीं हो पा रहा हूँ. पंडित जी के सामने मैं स्वयं को बहुत बौना समझ रहा था. उनके कद तक पहुँचने में यह जीवन भी कम लग रहा था. मैं जानता था कि वह मेरी किसी भी तरह की आर्थिक सहायता के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर देंगे, इसलिये मैं ऐसे किसी प्रस्ताव को कहने का साहस भी नहीं जुटा पाया, और उन्होंने मुझसे सहज भाव से विदा भी ले ली. उनकी पत्नी की रोग की पीड़ा से कहीं अधिक उनके चेहरे पर आत्म सम्मान और संतुष्टि के भाव, और उनकी चमक दिख रही थी– ऐसी आत्म संतुष्टि, जिसके लिये हम प्रयास तो करते हैं, पर वह हमारे आस-पास भी नहीं फटकती !

–राजगोपाल सिंह वर्मा 

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