शब्द वाहक हैं,

अर्थ नहीं हैं स्वयं,

क्यूँ  गढ़ना  चाहते हैं,

हमको वह,

या  शब्दों को नहीं समझते हम,

तीर से ज्यादा घातक,

और मिसाइल से विनाशक,

स्नेह संबंधों के पालक, पर

अनजाने में,

कुछ रिश्तों में बाधक,

शब्दों के कुछ उलझे-से,

और अनचीन्हे रिश्ते भी दिखे,

शब्दों को हँसते,

कभी  चीखते,

खिलखिलाते,

रोते भी देखा है मैंने.

कैसे मान करूं उन  शब्दों का,

अवसाद मिला जिनसे गहरा,

रुदन मिला मुझको,

खूबसूरत-से कुछ रिश्तों को,

गुमनामी का फिर सिला मिला.

शब्द जड़ हैं,

हैं स्थिर वहीँ,

और रहेंगे,

कल, आज, और कल,

संबंधों की बात अलग है,

क्षणभंगुर हैं,

जुड़ना जितना कठिन है,

सरल बहुत है टूटन,

कौन जाने कहाँ टिके,

यह रिश्तों की डोर महीन,

कैसे मैं समझाऊं  तुमको,

कुछ मिथ्याबोध अवधारणा,

और अधकचरे सिद्धांत,

जिनसे उलझता यह संसार,

तुम तो तुम हो,

हो तुम बिलकुल अलग,

नाजुक सी मजबूती,

और अंतर्दृष्टि विलक्षण,

हो तुम एक गर्व महान,

समझो मन से,

मन का नाता,

क्या हैं यह रिश्ते शाश्वत,

या शब्दजाल,

अनजाना सा,

सोचो तुम भी,

कुछ तुम भी पहचानो,

आहत मन को दो विश्राम !

–राजगोपाल सिंह वर्मा 

Advertisements