सड़क

इन सड़कों पर/
गुजरती हैं अनगिनत मशीनें/
ढो रही हैं इंसानों को/
सामानों को/
और कुछेक वेदनाओं को/
यहाँ से वहां और/
वहां से यहां/
पर इस भीड़ में भी/
वीरान सा लगता है
मेरा शहर/
जो मर रहा है/
एक अप्राकृतिक मौत/
लिजलिजी सी रेंगती गाड़ियां/
बेतरतीब दौड़ते लोग/
धुवें के बादल/
वह बेजार-सी मशीनें/
चिमनियों के श्वेत-स्याह गुबार/
खारिज किये हुये उदासीन कण/
जो निष्प्रयोज्य हैं यूँ तो,
पर दे रहे परिचय अपना/
कि हम प्रतीक हैं/
निस्तेज जीवन के/
और डस रहे हैं/
मानवता के साथ/
हर जिन्दा वजूद को/
निर्ममता से/
सिलसिला जारी है/
इस हनन का/
यथावत उसी तरह से/
मैं चुप हूँ/
हमेशा की तरह.
क्यूंकि/
अभी मरा नहीं है शहर/
थोड़ी-थोड़ी संवेदनायें/
शेष हैं अभी/
कुछ मामूली से लोगों में/
जो नहीं हो पाये हैं अभिभूत/
नये ज़माने से/
नई सभ्यताओं व संस्कृति से/
और/
कुछ बदले-से माहौल से/
सो रहे हैं लोग/
सिर्फ/
अपने वजूद को बचाने के लिये/
हम भी सो जायेंगे/
एकदिन/
यूँ ही/
सदा के लिये/
और टूट जाएगा/
एक तिलिस्म/
जीवन का भी/
उसी खामोशी में.

— राजगोपाल सिंह वर्मा 

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