उदासियों के साये,
जो अभी तक थे,
हावी मुझपर,
मंडरा रहे थे,
न जाने कब से,
मेरे मन में,
और देते थे दुविधा मुझे,
तोड़ दी है हिम्मत उनकी,
मैंने भी अंततः,
अपने इरादों से,
एक दृढ इच्छाशक्ति से,
कभी मुस्कुराहटों,
और कभी कुछ कहकहों से,
बेखबर हैं वह अभी यूँ तो,
कि इन मुस्कुराहटों और,
कहकहों के पीछे,
छिपा था एक दर्द गहरा सा,
सहता था जिसे हर रोज,
और जीता था फिर भी मैं,
अब मुझे पता है कि
जिन्दगी जीनी है मुझे भी,
अपनी शर्तों पर,
क्यूँ अतीत को स्मरण करूं,
क्यूँ मैं यादों के घेरों में घिर-घिर जाऊं,
चक्रवात से निकला हूँ मैं अब,
एक नया अध्याय जीने के लिये,
जहाँ मुझे अब सिर्फ,
मुस्कुराना है,
हंसना है और,
यूँ ही रहना है बिंदास,
पल-पल, हर पल !

–राजगोपाल सिंह वर्मा

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