सोचता हूँ

सोचता हूँ,
हर रोज़,
लिखूंगा एक ख़त तुम्हें,
बताऊंगा कुछ राज,
बातें ऐसी,
जिनसे हो तुम अनजान,
और कुछ ऐसे किस्से,
जिन्हें जानना है जरूरी,
तुम्हारे लिये,
पर,
यह हो ना सका,
क्यूंकि,
सुबह होती है,
तो गुजर जाती है,
खूबसूरत सी,
उन इन्द्रधनुषी किरणों को,
निहारने में,
पंछियों के कलरव और,
मंद हवा के झोंकों में,
चूमने में,
उन लटों को,
जो आ जाती हैं बार-बार,
मेरे पास,
रहकर भी बंधी,
अपनी ही जड़ों से,
दिन में,
क्या माहौल बना,
कुछ लिखने का कभी,
या कुछ हुआ सृजन कहीं,
जिन्दगी की व्यर्थ सी,
भागदौड़ में,
और,
शाम होती है तो,
कुछ ख़ुशी,
कुछ गम के साये,
साथ होते हैं,
जो तेरी यादों को,
धुंधला करना चाहते हैं,
या जीना चाहते हैं,
चुनिन्दा खूबसूरत लम्हे,
क्या आसां है अनदेखी करना,
उनकी धृष्टता को,
और यूँ ही बस,
रात होती है,
तेरा साथ,
और तन्हाइयाँ,
मैं बुनता जाता हूँ,
स्वप्न कुछ खूबसूरत से,
झरोखे खट्टी-मीठी सी,
कुछ यादों के,
और रात का एक-एक लम्हा,
तेरे साथ होने का,
अहसास देता है.
जब मुझे,
तब,
मैं भूल जाता हूँ,
स्वयं को भी !

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क्या इस औरंगजेब को आप भी जानते हैं ?

अबुल मुज़फ्फर मुहिउद्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब आलमगीर जिसे आमतौर पर औरंगज़ेब या आलमगीर (स्वंय को दिया हुआ शाही नाम जिसका अर्थ होता है विश्व विजेता) के नाम से जाना जाता था भारत पर राज्य करने वाला छठा मुग़ल शासक था।

औरंगज़ेब के शासन में मुग़ल साम्राज्य अपने विस्तार के चरमोत्कर्ष पर पहुंचा। वो अपने समय का शायद सबसे धनी और शक्तिशाली व्यक्ति था जिसने अपने जीवनकाल में दक्षिण भारत में प्राप्त विजयों के जरिये मुग़ल साम्राज्य को साढ़े बारह लाख वर्ग मील में फैलाया और १५ करोड़ लोगों पर शासन किया जो की दुनिया की आबादी का १/४ था. उसका शासन १६५८ से लेकर १७०७ में उसकी मृत्यु होने तक चला। औरंगज़ेब ने भारतीय उपमहाद्वीप पर आधी सदी से भी ज्यादा समय तक राज्य किया। वो अकबर के बाद सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाला मुग़ल शासक था। अपने जीवनकाल में उसने दक्षिणी भारत में मुग़ल साम्राज्य का विस्तार करने का भरसक प्रयास किया पर उसकी मृत्यु के पश्चात मुग़ल साम्राज्य सिकुड़ने लगा।

Aurangzebऔरंगजेब पवित्र जीवन व्यतीत करता था। अपने व्यक्तिगत जीवन में वह एक आदर्श व्यक्ति था। वह उन सब दुर्गुणों से सर्वत्र मुक्त था, जो एशिया के राजाओं में सामन्यतः थे। वह यति-जीवन जीता था। खाने-पीने, वेश-भूषा और जीवन की अन्य सभी-सुविधाओं में वह संयम बरतता था। प्रशासन के भारी काम में व्यस्त रहते हुए भी वह अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए क़ुरान की नकल करके और टोपियाँ सीकर कुछ पैसा कमाने का समय निकाल लेता था। उस समय कुछ प्रभावशाली हिन्दू राज्यों की स्थिति औरंगज़ेब के मज़हबी तानाशाही से मुक्त थी, अत: ब्रज के अनेक धर्माचार्य एवं भक्तजन अपने परिवार के साथ वहाँ जा कर बसने लगे। उस अभूतपूर्व धार्मिक निष्क्रमण के फलस्वरूप ब्रज में गोवर्धन और गोकुल जैसे समृद्धिशाली धर्मस्थान उजड़ गये और वृन्दावन शोभाहीन हो गया था।

औरंगज़ेब के शासन में ब्रज की जैसी बर्बादी हुई, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। औरंगज़ेब के अत्याचारों से मथुरा की जनता अपने पैतृक आवासों को छोड़ कर निकटवर्ती हिन्दू राजाओं के राज्यों में जाकर बसने लगी थी। जो रह गये थे, वे बड़ी कठिन परिस्थिति में अपने जीवन बिता रहे थे। उस समय में मथुरा का कोई महत्त्व नहीं था। उसकी धार्मिकता के साथ ही साथ उसकी भौतिक समृद्धि भी समाप्त हो गई थी। प्रशासन की दृष्टि से उस समय में मथुरा से अधिक महावन, सहार और सादाबाद का महत्त्व था, वहाँ मुसलमानों की संख्या भी अपेक्षाकृत अधिक थी।

यदि आपको इतिहास या विशेष रूप से मुगलकालीन इतिहास एवं औरंगजेब के शासन काल के सम्बन्ध में कोई रुचि है तो आप यह अवश्य जानते होंगे कि औरंगजेब अपने कार्यकाल में घोर सामंतवादी, कट्टर मुस्लिम, घोर-हिन्दू विरोधी तथा खूंखार शासक के रूप में जाना जाता था. आप जब आगरा के किले में जायेंगे तो गाइड औरंगजेब के अत्याचारों के किस्सों को आपके समक्ष इस तरह से पेश करेंगे, मानो उससे दुष्ट शासक विश्व भर में कोई दूसरा नहीं हुआ हो. उसके अत्याचारों की कहानियों से आगरा तथा उत्तर भारत के मुग़ल स्मारक अभी भी कराह रहे हैं, और इतिहास की पुस्तकें उसके कारनामों से भरी पड़ी हैं.

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ऑड्रे ट्रूस्क नामक एक महिला इतिहासकार ने अपनी हाल में रिलीज पुस्तक में औरंगजेब को उन पर लगाये गये लगभग सभी आरोपों से मुक्त करते हुए अपने शोध में दावा किया है कि वह एक दयालु, धार्मिक व सहिष्णु शासक था जो हिन्दू धर्म के प्रति अत्यंत आदर भाव रखता था. लेखिका का कहना है कि वह सहिष्णु होने के साथ ही अपने शासन में सभी धर्मों को बराबर सम्मान व आदर भाव की भावना से  देखता था और धार्मिक सवतंत्रता का पक्षधर था.

अपनी पुस्तक “औरंगजेब: द मैन एंड द मिथ” में मुग़ल सम्राट के उन सभी पहलुओं को चुनौती दी गई है जो उसे एक खतरनाक आततायी सम्राट के रूप में प्रस्तुत करते आ रहे हैं. लेखिका का कहना है कि यह सही है कि औरंगजेब ने कुछ फैसले ऐसे अवश्य लिये जो विवादास्पद रहे, परन्तु पूरे शासनकाल में कुछ ऐसे फैसलों के कारण मात्र से उस पर कट्टरता तथा अत्याचारी का लेबल लगाना कतई न्यायोचित नहीं है. इससे पूर्व प्रसिद्ध लेखक व तत्कालीन राज्यपाल प्रो. बी. एन पाण्डेय, ने अपनी पुस्तक ‘‘इतिहास के साथ यह अन्याय” में भी औरंगजेब को बहुत सहिष्णु सम्राट बताया था.

लेखिका ने अपने दावे के समर्थन में भारतीय इतिहास के दो महापुरुषों शिवाजी और राणा प्रताप सहित कई अन्य हिन्दू राजाओं को इंगित किया है जिन्हें केवल इसलिये महान माना जाता है, क्यूंकि वह मुग़ल शासकों से युद्धरत रहे थे. अगर हम अस्पर्श्यता तथा सती प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों पर उनके विचार और कर्मों को भी उनके आकलन में सम्मिलित करें, तो संभवतः उन्हें भारतीय इतिहास में वह सम्मानजनक स्थान ना मिल पाये जो आज उन्हें प्राप्त है. कहा जाता है कि इतिहास के साथ यह चुनींदा छेड़छाड़ भारत में औपनिवेशिक शासन के हस्तक्षेप के कारण हुई है. इस अनैतिक तथा दुर्भावनापूर्व आकलन का सर्वाधिक असर भारत के दो प्रमुख शासकों पर पड़ा—औरंगजेब और टीपू सुलतान.

बताते हैं कि औरंगज़ेब ने पूरे साम्राज्य पर फतवा-ए-आलमगीरी (शरियत या इस्लामी कानून पर आधारित) लागू किया और कुछ समय के लिए गैर-मुस्लिमो पर अतिरिक्त कर भी लगाया। गैर-मुसलमान जनता पर शरियत लागू करने वाला वो पहला मुसलमान शासक था। उसने अनेक हिन्दू धार्मिक स्थलों को नष्ट किया और गुरु तेग बहादुर की हत्या करवा दी।इतिहास में इस तथ्य की अनदेखी की जाती है की औरंगजेब के शासनकाल में उसके राज्यों में हिन्दू विशिष्टजनों की संख्या का प्रतिशत ५० तक बढ़ गया था जो इससे पूर्व काफी कम था. इसी तरह मुग़ल शासन में उसके हिन्दू दरबारियों की संख्या ३१.६ प्रतिशत तक पहुँच गई थी, जो इससे पूर्व कभी भी और किसी भी मुग़ल शासनकाल में इस स्तर तक नहीं पहुँच पाई थी.

इतिहास से यह भी प्रमाणित होता है कि औरंगजेब ने बनारस के विश्वनाथ मन्दिर और गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद को ढा देने का आदेश दिया था, परन्तु इसका कारण कुछ और ही था। विश्वनाथ मन्दिर के सिलसिले में घटनाक्रम यह बयान किया जाता है कि जब औरंगज़ेब बंगाल जाते हुए बनारस के पास से गुज़र रहा था, तो उसके काफिले में शामिल हिन्दू राजाओं ने बादशाह से निवेदन किया कि वहा। क़ाफ़िला एक दिन ठहर जाए तो उनकी रानियां बनारस जा कर गंगा दनी में स्नान कर लेंगी और विश्वनाथ जी के मन्दिर में श्रद्धा सुमन भी अर्पित कर आएँगी।औरंगज़ेब ने तुरंत ही यह निवेदन स्वीकार कर लिया और क़ाफिले के पडाव से बनारस तक पांच मील के रास्ते पर फ़ौजी पहरा बैठा दिया। रानियां पालकियों में सवार होकर गईं और स्नान एवं पूजा के बाद वापस आ गईं, परन्तु एक रानी (कच्छ की महारानी) वापस नहीं आई, तो उनकी बडी तलाश हुई, लेकिन पता नहीं चल सका। जब औरंगजै़ब को मालूम हुआ तो उसे बहुत गुस्सा आया और उसने अपने फ़ौज के बड़े-बड़े अफ़सरों को तलाश के लिए भेजा। आखिर में उन अफ़सरों ने देखा कि गणेश की मूर्ति जो दीवार में जड़ी हुई है, हिलती है। उन्होंने मूर्ति हटवा कर देख तो तहखाने की सीढी मिली और गुमशुदा रानी उसी में पड़ी रो रही थी। उसकी इज़्ज़त भी लूटी गई थी और उसके आभूषण भी छीन लिए गए थे। यह तहखाना विश्वनाथ जी की मूर्ति के ठीक नीचे था। राजाओं ने इस हरकत पर अपनी नाराज़गी जताई और विरोघ प्रकट किया। चूंकि यह बहुत घिनौना अपराध था, इसलिए उन्होंने कड़ी से कड़ी कार्रवाई कने की मांग की। उनकी मांग पर औरंगज़ेब ने आदेश दिया कि चूंकि पवित्र-स्थल को अपवित्र किया जा चुका है। अतः विश्नाथ जी की मूर्ति को कहीं और लेजा कर स्थापित कर दिया जाए और मन्दिर को गिरा कर ज़मीन को बराबर कर दिया जाय और महंत को मिरफतर कर लिया जाए। डाक्टर पट्ठाभि सीता रमैया ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द फ़ेदर्स एण्ड द स्टोन्स’ मे इस घटना को दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणित किया है। पटना म्यूज़ियम के पूर्व क्यूरेटर डा. पी. एल. गुप्ता ने भी इस घटना की पुष्टि की है।

गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद की घटना यह है कि वहां के राजा जो तानाशाह के नाम से प्रसिद्ध थे, रियासत की मालगुज़ारी वसूल करने के बाद दिल्ली के नाम से प्रसिद्ध थे, रियासत की मालुगज़ारी वसूल करने के बाद दिल्ली का हिस्सा नहीं भेजते थे। कुछ ही वर्षों में यह रक़म करोड़ों की हो गई। तानाशाह न यह ख़ज़ाना एक जगह ज़मीन में गाड़ कर उस पर मस्जिद बनवा दी। जब औरंज़ेब को इसका पता चला तो उसने आदेश दे दिया कि यह मस्जिद गिरा दी जाए। अतः गड़ा हुआ खज़ाना निकाल कर उसे जन-कल्याण के कामों में व्यय किया गया। ये दोनों उदाहरण यह समझने के लिए पर्याप्त हैं कि औरंगज़ेब न्याय के मामले में मन्दिर और मस्जिद में कोई फ़र्क़ नहीं समझता था। दुर्भाग्य से मध्यकाल और आधुनिक काल के भारतीय इतिहास की घटनाओं एवं चरित्रों को इस प्रकार तोड़-मरोड़ कर मनगढंत अंदाज़ में पेश किया जाता रहा है कि झूठ ही ईश्वरीय आदेश की सच्चाई की तरह स्वीकार किया जाने लगा, और उन लोगों को दोषी ठहराया जाने लगा जो तथ्य और पनगढंत बातों में अन्तर करते हैं। आज भी साम्प्रदायिक एवं स्वार्थी तत्व इतिहास को तोड़ने-मरोडने और उसे ग़लत रंग देने में लगे हुए हैं।

यह प्रमाणित तथ्य है कि इतिहासकारों ने उसके सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, वह पक्षपात पर आधारित है और इससे उसकी तस्वीर का एक ही रूख सामने लाया गया है। भारत एक विशाल देश है, जिसमें हज़ारों मन्दिर चारों ओर फैले हुए हैं। यदि सही ढ़ंग से खोजबीन की जाए तो बहुत-से ऐसे उदाहरण मिल जाऐंगे जिनसे औरंगज़ेब का गै़र-मुस्लिमों के प्रति उदार व्यवहार का पता चलेगा।

औरंगज़ेब, जिसे पक्षपाती इतिहासकारों ने भारत में मुस्लिम आततायी सम्राट का प्रतीक मान रखा है, उसके बारें में ‘शिबली’ जैसे इतिहास गवेषी कवि को कहना पड़ाः

तुम्हें ले-दे के सारी दास्तां में याद है इतना।
कि औरंगज़ेब हिन्दू-कुश था, ज़ालिम था, सितमगर था।।

औरंगज़ेब पर हिन्दू-दुश्मनी के आरोप के सम्बन्ध में जिस फरमान को बहुत उछाला गया है, वह ‘फ़रमाने-बनारस’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह फ़रमान बनारस के मुहल्ला गौरी के एक ब्राहमण परिवार से संबंधित है। 1905 ई. में इसे गोपी उपाघ्याय के नवासे मंगल पाण्डेय ने सिटि मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया था। एसे पहली बार ‘एसियाटिक- सोसाइटी’ बंगाल के जर्नल (पत्रिका) ने 1911 ई. में प्रकाशित किया था। फलस्वरूप रिसर्च करनेवालों का ध्यान इधर गया। तब से इतिहासकार प्रायः इसका हवाला देते आ रहे हैं और वे इसके आधार पर औरंगज़ेब पर आरोप लगाते हैं कि उसने हिन्दू मन्दिरों के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया था, जबकि इस फ़रमान का वास्तविक महत्व उनकी निगाहों से आझल रह जाता है। यह लिखित फ़रमान औरंगज़ेब ने 15 जुमादुल-अव्वल 1065 हि. (10 मार्च 1659 ई.) को बनारस के स्थानिय अधिकारी के नाम भेजा था जो एक ब्राहम्ण की शिकायत के सिलसिले में जारी किया गया था। वह ब्राहमण एक मन्दिर का महंत था और कुछ लोग उसे परेशान कर रहे थे।

फ़रमान में कहा गया हैः ‘‘अबुल हसन को हमारी शाही उदारता का क़ायल रहते हुए यह जानना चाहिए कि हमारी स्वाभाविक दयालुता और प्राकृतिक न्याय के अनुसार हमारा सारा अनथक संघर्ष और न्यायप्रिय इरादों का उद्देश्य जन-कल्याण को अढ़ावा देना है और प्रत्येक उच्च एवं निम्न वर्गों के हालात को बेहतर बनाना है। अपने पवित्र कानून के अनुसार हमने फैसला किया है कि प्राचीन मन्दिरों को तबाह और बरबाद नहीं किया जाय, अलबत्ता नए मन्दिर न बनाए जाएँ। हमारे इस न्याय पर आधारित काल में हमारे प्रतिष्ठित एवं पवित्र दरबार में यह सूचना पहुंची है कि कुछ लोग बनारस शहर और उसके आस-पास के हिन्दू नागरिकों और मन्दिरों के ब्राहम्णों-पुरोहितों को परेशान कर रहे हैं तथा उनके मामलों में दख़ल दे रहे हैं, जबकि ये प्राचीन मन्दिर उन्हीं की देख-रेख में हैं। इसके अतिरिक्त वे चाहते हैं कि इन ब्राहम्णों को इनके पुराने पदों से हटा दें। यह दखलंदाज़ी इस समुदाय के लिए परेशानी का कारण है। इसलिए यह हमारा फ़रमान है कि हमारा शाही हुक्म पहुंचते ही तुम हिदायत जारी कर दो कि कोई भी व्यक्ति ग़ैर-कानूनी रूप से दखलंदाजी न करे और न उन स्थानों के ब्राहम्णों एवं अन्य हिन्दु नागरिकों को परेशान करे। ताकि पहले की तरह उनका क़ब्ज़ा बरक़रार रहे और पूरे मनोयोग से वे हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के लिए प्रार्थना करते रहें। इस हुक्म को तुरन्त लागू किया जाये।’’

इस फरमान से स्पष्ट है कि औरंगज़ेब ने नए मन्दिरों के निर्माण के विरुद्ध कोई नया हुक्म जारी नहीं किया, बल्कि उसने केवल पहले से चली आ रही परम्परा का हवाला दिया और उस परम्परा की पाबन्दी पर ज़ोर दिया। पहले से मौजूद मन्दिरों को ध्वस्त करने का उसने कठोरता से विरोध किया। इस फ़रमान से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वह हिन्दू प्रजा को सुख-शान्ति से जीवन व्यतीत करने का अवसर देने का इच्छुक था। यह अपने जैसा केवल एक ही फरमान नहीं है। बनारस में ही एक और फरमान मिलता है, जिससे स्पष्ट होता है कि औरंगज़ेब वास्तव में चाहता था कि हिन्दू सुख-शान्ति के साथ जीवन व्यतीत कर सकें। यह फरमान इस प्रकार हैः ‘‘रामनगर (बनारस) के महाराजाधिराज राजा रामसिंह ने हमारे दरबार में अर्ज़ी पेश की है कि उनके पिता ने गंगा नदी के किनारे अपने धार्मिक गुरू भगवत गोसाईं के निवास के लिए एक मकान बनवाया था। अब कुछ लोग गोसाईं को परेशान कर रहे हैं। अतः यह शाही फ़रमान जारी किया जाता है कि इस फरमान के पहुंचते ही सभी वर्तमान एवं आने वाले अधिकारी इस बात का पूरा ध्यान रखें कि कोई भी व्यक्ति गोसाईं को परेशान एवं डरा-धमका न सके, और न उनके मामलें में हस्तक्षेप करे, ताकि वे पूरे मनोयोग के साथ हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए प्रार्थना करते रहें। इस फरमान पर तुरंत अमल किया जाए ।

Aurangzed 6जंगमबाड़ी मठ के महंत के पास मौजूद कुछ फरमानों से पता चलता है कि औरंगज़ेब कभी यह सहन नहीं करता था कि उसकी प्रजा के अधिकार किसी प्रकार से भी छीने जाएँ, चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान। वह अपराधियों के साथ सख़्ती से पेश आता था। इन फरमानों में एक जंगम लोंगों (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) की ओर से एक मुसलमान नागरिक के दरबार में लाया गया, जिस पर शाही हुक्म दिया गया कि बनारस सूबा इलाहाबाद के अफ़सरों को सूचित किया जाता है कि पुराना बनारस के नागरिकों अर्जुनमल और जंगमियों ने शिकायत की है कि बनारस के एक नागरिक नज़ीर बेग ने क़स्बा बनारस में उनकी पांच हवेलियों पर क़ब्जा कर लिया है। उन्हें हुक्म दिया जाता है कि यदि शिकायत सच्ची पाई जाए और जायदा की मिल्कियत का अधिकार प्रमाणित हो जाए तो नज़ीर बेग को उन हवेलियों में दाखि़ल न होने दिया जाए, ताकि जंगमियों को भविष्य में अपनी शिकायत दूर करवाने के लिए हमारे दरबार में ने आना पडे।

इस फ़रमान पर 11 शाबान, 13 जुलूस (1672 ई.) की तारीख़ दर्ज है। इसी मठ के पास मौजूद एक-दूसरे फ़रमान में जिस पर पहली नबीउल-अव्वल 1078 हि. की तारीख दर्ज़ है, यह उल्लेख है कि ज़मीन का क़ब्ज़ा जंगमियों को दिया गया। फ़रमान में है- ‘‘परगना हवेली बनारस के सभी वर्तमान और भावी जागीरदारों एवं करोडियों को सूचित किया जाता है कि शहंशाह के हुक्म से 178 बीघा ज़मीन जंगमियों (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) को दी गई। पुराने अफसरों ने इसकी पुष्टि की थी और उस समय के परगना के मालिक की मुहर के साथ यह सबूत पेश किया है कि ज़मीन पर उन्हीं का हक़ है। अतः शहंशाह की जान के सदक़े के रूप में यह ज़मीन उन्हें दे दी गई। ख़रीफ की फसल के प्रारम्भ से ज़मीन पर उनका क़ब्ज़ा बहाल किया जाय और फिर किसीप्रकार की दखलंदाज़ी न होने दी जाए, ताकि जंगमी लोग(शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) उसकी आमदनी से अपने देख-रेख कर सकें।’’

इस फ़रमान से केवल यही पता नहीं चलता कि औरंगज़ेब स्वभाव से न्यायप्रिय था, बल्कि यह भी साफ़ नज़र आता है कि वह इस तरह की जायदादों के बंटवारे में हिन्दू धार्मिक सेवकों के साथ कोई भेदभा व नहीं बरता था। जंगमियों को 178 बीघा ज़मीन संभवतः स्वयं औरंगज़ेब ही ने  की प्रदान की थी, क्योंकि एक दूसरे फ़रमान (तिथि 5 रमज़ान, 1071 हि.) में इसका स्पष्टीकरण किया गया है कि यह ज़मीन मालगुज़ारी मुक्त है।

औरंगज़ेब ने एक दूसरे फरमान (1098 हि.) के द्वारा एक-दूसरी हिन्दू धार्मिक संस्था को भी जागीर प्रदान की। फ़रमान में कहा गया हैः ‘‘बनारस में गंगा नदी के किनारे बेनी-माधो घाट पर दो प्लाट खाली हैं– एक मर्क़जी मस्जिद के किनारे रामजीवन गोसाईं के घर के सामने और दूसरा उससे पहले। ये प्लाट बैतुल-माल की मिल्कियत है। हमने यह प्लाट रामजीवन गोसाईं और उनके लड़के को ‘‘इनाम’ के रूप में प्रदान किया, ताकि उक्त प्लाटों पर ब्राह्मणों  एवं फ़क़ीरों के लिए रिहायशी मकान बनाने के बाद वे खुदा की इबादत और हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए दुआ और प्रार्थना करने में लग जाएं। हमारे बेटों, वज़ीरों, अमीरों, उच्च पदाधिकारियों, दरोग़ा और वर्तमान एवं भावी कोतवालों के अनिवार्य है कि वे इस आदेश के पालन का ध्यान रखें और उक्त प्लाट, उपर्युक्त व्यक्ति और उसके वारिसों के क़ब्ज़े ही में रहने दें और उनसे न कोई मालगुज़ारी या टैक्स लिया जाए और न उनसे हर साल नई सनद मांगी जाए।’’ इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि औरंगज़ेब को अपनी प्रजा की धार्मिक भावनाओं के सम्मान का बहुत अधिक ध्यान रहता था।

औरंगज़ेब का एक फ़रमान (2 सफ़र, 9 जुलूस) है जो असम के शह गोहाटी के उमानन्द मन्दिर के पुजारी सुदामन ब्राह्मण के नाम है। असम के हिन्दू राजाओं की ओर से इस मन्दिर और उसके पुजारी को ज़मीन का एक टुकड़ा और कुछ जंगलों की आमदनी जागीर के रूप में दी गई थी, ताकि भोग का खर्च पूरा किया जा सके और पुजारी की आजीविका चल सके। जब यह प्रांत औरंगजेब के शासन-क्षेत्र में आया, तो उसने तुरंत ही एक फरमान के द्वारा इस जागीर को यथावत रखने का आदेश दिया। हिन्दुओं और उनके धर्म के साथ औरंगज़ेब की सहिष्ण्ता और उदारता का एक और सबूत उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर के पुजारियों से मिलता है। यह शिवजी के प्रमुख मन्दिरों में से एक है, जहां दिन-रात दीप प्रज्वलित रहता है। इसके लिए काफ़ी दिनों से पतिदिन चार सेर घी वहां की सरकार की ओर से उपलब्ध कराया जाथा था और पुजारी कहते हैं कि यह सिलसिला मुगल काल में भी जारी रहा। औरंगजेब ने भी इस परम्परा का सम्मान किया। इस सिलसिले में पुजारियों के पास दुर्भाग्य से कोई फ़रमान तो उपलब्ध नहीं है, परन्तु एक आदेश की नक़ल ज़रूर है जो औरंगज़ब के काल में शहज़ादा मुराद बख़्श की तरफ से जारी किया गया था। (5 शव्वाल 1061 हि. को यह आदेश शहंशाह की ओर से शहज़ादा ने मन्दिर के पुजारी देव नारायण के एक आवेदन पर जारी किया था। वास्तविकता की पुष्टि के बाद इस आदेश में कहा गया हैं कि मन्दिर के दीप के लिए चबूतरा कोतवाल के तहसीलदार चार सेर (अकबरी घी प्रतिदिन के हिसाब से उपल्ब्ध कराएँ। इसकी नक़ल मूल आदेश के जारी होने के 93 साल बाद (1153 हिजरी) में मुहम्मद सअदुल्लाह ने पुनः जारी की। साधारणतः इतिहासकार इसका बहुत उल्लेख करते हैं कि अहमदाबाद में नागर सेठ के बनवाए हुए चिन्तामणि मन्दिर को ध्वस्त किया गया, परन्तु इस वास्तविकता पर पर्दा डाल देते हैं कि उसी औरंगज़ेब ने उसी नागर सेठ के बनवाए हुए शत्रुन्जया और आबू मन्दिरों को काफ़ी बड़ी जागीरें प्रदान कीं ।

लोगों ने चित्रकूट में औरंगजेब द्वारा बनवाया बालाजी का भव्य मंदिर देख लिया होता तो वह धर्म के नाम पर लोगों को आपस में लड़वाने पर मजबूर न करते । मूर्तिभंजक शासक के नाम से कुख्यात सम्राट औरंगजेब ने चित्रकूट में रामघाट के पास हिन्दू संत रामदास के कहने से एक बालाजी का मंदिर बनवाया था जो आज भी वहां हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बनकर खडा है ।

–राजगोपाल सिंह वर्मा

किसने की थी अकबर महान के स्मारक की दुर्दशा ?

आगरा के सिकंदरा इलाके में स्थित है मुग़ल सम्राट अकबर महान का मकबरा जो तात्कालीन वास्तुकला का एक नायाब नमूना भी है, लेकिन बहुत काम लोग इस तथ्य को जानते हैं कि इस मकबरे में अकबर महान के अवशेष मौजूद नहीं हैं. न ही वहां तत्कालीन समय में मौजूद रत्नजड़ित पत्थरों, आभूषण तथा नायब बहुमूल्य कालीनों में से कुछ शेष बचा है.

अकबर महान ने अपने स्मारक का स्थल अपने जीते जी स्वयं चयनित किया था. उनके बेटे जहाँगीर ने पूरी तन्मयता से उनके शानदार मकबरे को तैयार कराया और उसे ऐसा भव्य रूप दिया कि दूर-दूर तक उसकी चर्चा होने लगी. तब तक ताजमहल का कोई नामोनिशान नहीं था, इसलिए लोग इस मकबरे की भव्यता से ही अभिभूत हो जाते थे.

Akbar (1)

औरंगजेब की धार्मिक असहिष्णुता तथा आक्रामकता की नीति ने मुग़लों की साख खराब करनी आरम्भ कर दी थी. ऐसे में, उसकी नीति का विरोध करने के लिए निकटवर्ती मथुरा के जाटों ने विद्रोह कर दिया. वे सिनसिनी (जो बाद में भरतपुर रियासत बनी) के स्थानीय जागीरदार राजा राम जाट के नेतृत्व में एकजुट हो गये. और मुग़ल साम्राज्य के गौरव अकबर के स्मारक को निशाना बनाने की ठानी.

विद्रोहियों के मन में औरंगजेब के प्रति इनता आक्रोश था कि उन्होंने उनके पड दादा के मसोलियम की ईट से ईट बजा दी.औरंगजेब की गुप्तचर सेवा लोगों में पनप रहे आक्रोश को भांपने में असफल रही. जब तक औरंगजेब की ओर से कोई कार्यवाही होती, विद्रोहियों ने सिकंदर स्थित अकबर के मकबरे की दुर्दशा कर दी थी.

विद्रोहियों ने स्मारक से सोना, चांदी, जवाहरात, दुर्लभ कालीन और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं को लूट लिया तथा जमकर तोड़फोड़ की. यह वह समय था जब औरंगजेब के नेतृत्व में मुग़ल साम्राज्य की सब जगह तूती बोल रही थी और उसका विरोध करने का दुस्साहस किसी में नहीं था.

दरअसल, राजा राम जाट का आक्रोश दोतरफा था. एक तो वह जबरन धर्म परिवर्तन के विरुद्ध था, दुसरे वह इसी विरोध के फलस्वरूप अपने पिता गोकुल सिंह को दिए गये मृत्यु दंड का भी बदला लेना चाहता था.

विद्रोहियों ने न केवल स्मारक में लूट को अंजाम दिया, बल्कि अकबर महान की कब्र को खोदकर उनकी हड्डियों को भी निकाल लिया और उन्हें सार्वजानिक रूप से जला दिया.

जब तक जान रही, तब तक राजा राम जाट और उसके सहयोगियों ने औरंगजेब के धर्मांतरण के प्रयासों का जोरदार विरोध जारी रखा. बाद में औरंगजेब ने उसे गिरफ्तार करने में कामयाबी पाई और उसके पिता की तरह सन १६८८ में उसे मृत्युदंड दिया.

ख़ास बात यह थी कि औरंगजेब की दिलचस्पी अपने पड़ दादा के स्मारक को उसके गौरवपूर्ण रूप में लाने की नहीं रही, वह केवल सोने, चांदी और गहनों की बरामदगी और अपने प्रभुत्व को कायम रखने में दिलचस्पी रखता था. वैसे भी औरंगजेब ने वास्तुकला तथा विशाल निर्माणों को अपनी प्राथमिकता कभी नहीं माना. इसी कारण अकबर महान का यह खूबसूरत स्मारक सैकड़ों साल बदहाली की स्थिति में रहा. इसकी वृहद् मरम्मत तथा पुनर्निर्माण करने का श्रेय ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लार्ड कर्ज़न को जाता है.

एक स्वप्न की मौत

मैं सुनिधि को अधिक नहीं जानता. वह सुरभि से मेरी आखिरी मुलाकात के समय लगभग आठ साल की रही होगी. हाँ, उसकी माँ सुरभि को सालों से जानता था. आज सुनिधि का नाम जब अन्तरराष्ट्रीय लघु फिल्म समारोह में उसकी फिल्म को पुरस्कृत किये जाने के समाचार में पढ़ा तो सुरभि की याद में आँखें छलछला आईं.

…हम लोग दिल्ली की कालिंदी  विहार कॉलोनी में रहते थे. ऑफिस हमारा कोई नज़दीक नहीं था, मेरा जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के डाउन कैंपस यानि मुनीरका से सटा हुआ, और उसका उससे भी दूर, इंस्टीट्यूटशनल एरिया में क़ुतुब होटल के भी उस पार, लगभग २२ किलोमीटर दूर. मेट्रो ट्रेन की तो दिल्ली में उन दिनों कल्पना भी नहीं हुई थी. हमारी मुलाकात डी टी सी की जिस बस में होती थी, उसका नाम था पी-३२. यह ऑफिस जाने वाले लोगों के लिये चलाई जाने वाली पॉइंट-टू-पॉइंट बस सर्विस थी जो हम जैसे लोगों के लिये बेहद सुगम थी.

बहुत बिंदास थी वह. उसके चेहरे पर दिखते आत्मविश्वास से कई बार डर भी लगता था. जितनी बिंदास थी, उतनी टची भी. धीरे-धीरे पता चला कि वह जिस सरकारी ऑफिस में काम करती है, वहां उसकी भी जॉब रेस्पोंसिबिलिटी मेरे जैसी ही थी. स्वाभाविक था उसे और जानने की इच्छा होना. पर, दिन यूँ ही बीतते गए और सवेरे ८.४०, और शाम ५.५० की पी-३२ से यूँ ही आना-जाना लगा रहा– सप्ताह में पांच  दिन. एक दिन मेरे सहयोगी एक अधिकारी दयानंद परमार जी को उसके नज़दीक की सीट पर बैठने का मौका मिला. मैंने दूर से ही देखा कि परमार जी ने अपनी जेब से पढने का चश्मा निकाल कर अपनी आँखों पर लगाया, फिर उन्होंने आभा जिस किताब को पढ़ रही थी, उसमें झाँकने का प्रयास किया, या यूँ कहें उन्होंने भी उस किताब को पढने में रूचि लेनी आरम्भ की.

किताब वह झाँक रहे थे, धडकनें मेरी बढ़ रही थी. मैं असहज हो रहा था. दरअसल सुरभि को लेकर हम लोग अक्सर चर्चा करते थे, और मैंने ही अपने स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर परमार जी को बताया था कि वह भी सम्पादन के क्षेत्र से जुडी है. अब मैंने देखा, कि परमार जी ने चश्मा उतारकर वापिस कवर में रखकर जेब के हवाले कर दिया. परमार जी ने सुरभि से संवाद आरम्भ कर दिया था. मैं असहज था, और परमार जी पूरी तरह सहज. उनके लिये सहज होने का कारण उनके पूरे सफ़ेद बाल, झुर्रियां और उम्र का आखिरी पड़ाव होना था. और मैं? मैंने तो अभी नौकरी शुरू ही की थी—लगभग २४ वर्ष, यही आयु रही होगी मेरी, प्रोबेशन पीरियड था अभी मेरा. सुरभि मुझसे आयु में लगभग दो-चार साल बड़ी रही होगी.

खुशमिजाज़ अधिकारी थे परमार जी. वह मेरे ही साथ टेक्निकल ऑफिसर थे, और इंडियन स्टैण्डर्ड इंस्टिट्यूट की नौकरी छोड़कर लगभग छह महीने पूर्व ही आये थे. परमार जी का स्टॉप मेरे स्टॉप से एक स्टॉप पूर्व ही पड़ता था. सो, वह पहले ही उतर गये. इस बीच में मैं उन्हें कनखियों से सुरभि से काफी विस्तार में बात करते बार-बार देखने का मोह संवरण नहीं कर पाता था. एक बार तो उन्होंने सुरभि को मेरी और इंगित कर कुछ बताया, और उसने गर्दन घुमा कर दूर बैठे मुझे देखा तो, लगा कि मेरे प्राण सूख गए हों, मैंने ऐसा करते हुए देख लिया था, सो मेरी निगाह खुद ही खिड़की की ओर घूम गई थी. मैं असहज तो था ही, अब विचलित भी हो गया था, और परमार जी पर झुंझलाहट हो रही थी. मेरी धड़कनें कानों तक पहुँच रही थी. पर, कुछ विशेष चिंता की बात नहीं लगी, क्यूंकि विदा लेते समय परमार जी को सुरभि ने बहुत सहज ढंग से विदा किया था.

मुझे ठीक से याद नहीं कि इस घटना के कितने दिन बाद सुरभि ने एक बार लौटते समय एक सौम्य मुस्कान के साथ अभिवादन कर, पी-३२ बस में मुझे आग्रहपूर्वक अपने निकट की सीट पर बिठाया था. हाँ, इससे पहले परमार जी मुझे उस दिन की घटनाक्रम का विवरण अवश्य दे चुके थे. उन्होंने मेरे विषय में, मेरे लेखन, और साहित्यिक संबंधों के बारे में वह जो भी जानते थे, उसका बखूबी मक्खन के साथ सुरभि के सामने प्रस्तुतिकरण कर दिया था. इस संक्षिप्त सी पहली मुलाकात में सुरभि ने कुछ विषयों पर हमारी लाइब्रेरी में पुस्तकों की उपलब्धता पर कुछ जानकारी ली, और कुछ मेरी पृष्ठभूमि की. तब तक हमारा स्टॉप भी आ गया था. उसके फ्लैट तथा मेरे फ्लैट की दूरी लगभग आधा किलोमीटर होगी. वह सेक्टर तीन में रहती थी, और मैं सेक्टर चार में. हमने एक दूसरे से विदा ली. उसके बाद भी कभी-कभी हम लोगों में अभिवादन तथा छोटी-मोती बातों की रस्म अदायगी हो जाती थी.

एक दिन देर शाम लगभग ७.४५ बजे, घर की डोर बैल बजी. देखा तो, सुरभि सामने थी. तीसरी मंजिल का फ्लैट और लगभग हांफती हुई आभा, बोली, “चलिए, घर चलिए, चाय गैस पर चढ़ा कर आई हूँ, मुझे लगा कि आपका घर बिल्कुल पास ही होगा, अनन्त भी आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं”. पत्नी से यह पहली मुलाकात थी उसकी. हमने उसे आश्वस्त किया कि अभी आते हैं आधे घंटे में, तब जाकर वह वापिस लौटी, उसी तरह.  रुकना उसे था नहीं, सो नहीं रुकी. जल्दी इतनी थी कि पानी भी नहीं पिया उसने.

आप सोच रहे होंगे कि मेरा यह कैसा आकर्षण था सुरभि में?  कैसी दिखती होगी वह?  तो सुनिये– सुरभि एक साधारण शरीर की, कुछ ओवरवेट, स्वयं अपने और ज़माने से बेपरवाह सी लड़की थी, जो न तो अपने कपड़ों पर ध्यान देती थी, न अपने लुक या ज्वेलरी पर ! उसका आईसाईट  के चश्मे का फ्रेम भी उसी की तरह बहुत साधारण था. कभी-कभी वह खादी का कुरता और सलवार भी पहन आती थी, पैरों में चप्पल और कंधे पर लटकता था एक थैला. थैले में और तो पता नहीं, पर कुछेक अच्छी किताबें और उसकी डायरी जरूर होती थी. इस साधारण लुक के बावजूद एक बात अवश्य थी जो मुझे हमेशा उसकी ओर आकर्षित करती थी— उसका भरपूर आत्म विश्वास, और बाद में जब मैंने उसे जाना, तब मैं उसके दृष्टिकोण और विचारों की तार्किक दृढ़ता से भी प्रभावित हुआ. वह बॉटनी में परास्नातक थी पर उसे प्राचीन व मुगलकालीन भारतीय इतिहास रोमांचित करता था. उसे जितनी रूचि इस विषय में थी उतनी इतिहास में अपनी परास्नातक की शिक्षा के बावजूद मुझे शायद न रही हो. वह हिंदी और अंग्रेजी भाषा की  जानी मानी लेखिका थी– उसकी कई कहानियां चर्चित रहीं जो उस समय धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान और हंस सरीखी पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित होती रहती थी. उसने दूरदर्शन के कई प्रमुख कार्यक्रमों की स्क्रिप्ट भी लिखी और सामाजिक मुद्दों को भी उठाने का साहस दिखाया. निजी चैनल का जमाना तब तक अजन्मा था.

खैर, मैं सुरभि के आग्रह पर पत्नी के साथ उसके घर पहुंचा जहाँ उसके पति अनन्त भी हमारी ही प्रतीक्षा कर रहे थे. उनके कोई बच्चा नहीं था तब. तमाम औपचारिक बातों और परिचय के बाद उसने मेरी पत्नी से कहा, “जानती हैं आप, वर्मा जी का रिश्ता लेकर आये थे परमार जी, मेरे पास!”, मैं सकपका गया था, परन्तु उसने अपने पति और मेरी पत्नी के सामने बताना जारी रखा, “परमार जी ने मुझे इनके बारे में ऐसे बताया जैसे कोई व्यक्ति किसी लड़की को लड़के के गुणों के बारे में बताता है…”, और यह कहकर उसकी जोरदार, उन्मुक्त खिलखिलाहट वातावरण में फ़ैल गई. अब सब सामान्य हो गया था. हम सब एक दूसरे से काफी घुल-मिल गए थे और समय-समय पर एक दूसरे के घर या बाहर मुलाकातें होती होती रहती थी.

समय बीतता गया, सुरभि  की जिन्दगी के पन्ने खुलते गए. अब अमिय से भी मुलाकातें होती थी जो सुरभि  के पति का मित्र था, और लखनऊ से दिल्ली आकर किसी बड़े समूह के साथ खोजी पत्रकारिता में जुडा था. वह भी सुरभि के घर पर रुका था. यूँ तो सामान्य तौर पर सब कुछ अच्छा दिखता था पर एक दिन पता चला कि सुरभि ने अपना घर छोड़ दिया है. पता नहीं यह उसकी जिन्दगी के प्रति उदासीनता थी या फिर उसके इरादों की मजबूती– जब तक उसने स्वयं नहीं बताया, मैं कभी सुरभि और अनन्त के संबंधों की वितृष्णा महसूस नहीं कर पाया. गंभीर बातों को भी मजाक में उडा देने की प्रवृति जो थी उसकी. बाद में जरूर उसने मुझे बताया था कि किस प्रकार एक-एक दिन उसके सब सपने मर रहे थे. वह जीना चाहती थी अपनी एक विस्तृत, मायावी और परीलोक की सी जिन्दगी में, पर अनन्त चाहता था कि वह नौकरी करे और वहां से लौटकर चूल्हा-चौका संभाले. जैसे-तैसे लगभग पांच साल तक उसने जी भी यह जिन्दगी. और अनन्त? वह पत्रकार था और स्वयं न जाने कितनी नौकरी बदलता था. टिकना उसकी फितरत में नहीं था– और नौकरी छोड़ने के लिये उसके पास प्रबंधतंत्र के विरुद्ध  कोई न कोई सैद्धांतिक मतभेद का बहाना जरूर हाज़िर रहता. साथ में, वह जब भी बिहार के अपने पैत्रक घर से अपनी मां को बुला लेता तो बच्चा न जन्मने के खोट से उपजी कुंठा और उसके रूखे व्यवहार से जो अवसाद मिलता उससे व्यथित हो वह अक्सर लम्बे समय तक ऐसी हो जाती  जैसे नदी के किसी  बंजर किनारे पर पड़े रेत के ढेर जैसी ही उसकी भी नियति हो, सिर्फ भावनाशून्य !

अब, वह नयी दिल्ली के ग्रीनपार्क इलाके में एक वर्किंग वीमेन हॉस्टल में शिफ्ट हो गई थी. उसने एक बार मुझे वहां फोन कर बुलाया भी. वहां की जिन्दगी भी उसके जीवन में रंग नहीं भर पा रही थी. दरअसल, वह उसकी जिन्दगी का ठौर नहीं था, वह उसका संक्रमण काल था. तब उसने अपनी जिन्दगी के वह पन्ने भी मेरे साथ साझा किये जिनसे मैं अनजान था. सुरभि पश्चिम उत्तर प्रदेश के हाथरस जनपद के एक अनजान से कस्बे में पली-बढ़ी थी, जबकि उसका पति बिहार के चंपारण जिले के किसी जमींदार का बेटा था जो वैसे तो एक पत्रकार था, पर मूलरूप से विद्रोही स्वभाव का था. मैट्रिमोनियल विज्ञापन के माध्यम से उनकी शादी तय हुई थी, पर उनके विचार और जिन्दगी में ठहराव सात साल के दाम्पत्य जीवन में शायद कभी नहीं हो पाया. बीच में उससे मिलना जुलना नहीं हो पाता था. उन दिनों मोबाइल फोन नहीं थे, और लैंडलाइन तब एक स्टेटस सिंबल मात्र था, जो हम दोनों के पास नहीं था, इसलिए बातें कम ही हो पाती थी. फिर, वह अपनी भागदौड़ और प्राथमिकताओं की जटिलताओं में अकसर ऑफिस भी मिस कर देती थी, जहाँ जाकर कभी-कभार उसके पास बैठ कर बातें करना हो जाया करता था.

एक दिन हर बार की ही तरह अचानक स्वयं ही हाज़िर हुई सुरभि, उसी खिलखिलाती बेबाक हंसी के साथ. उसने बताया कि वह अनन्त  से अलग हो रही है. मेरे और वैदेही के चेहरे के उड़ते रंग को भांप कर वह आगे बोली–“अलग तो बरसों से थे ही, बस अब अलग-अलग छत के नीचे रहेंगे”. वह शायद कुछ और भी कहना चाहती थी पर जल्दी से चाय का अंतिम घूँट लेकर पुनः आने का आश्वासन दे उठ खड़ी हुई. मैं और वैदेही अभी भी असमंजस में ही थे. वह दरवाजे तक पहंच चुकी थी जब वैदेही ने कहा—“सुरभि ! कोई भी मदद चाहिए हो तो बताना !”, वह बस मुस्कुराते हुये सीढियां उतरती चली गई.

बाद में पता चला की सुरभि और अमिय साथ रहने लगे हैं. उन्होंने कालिंदी विहार के ही सेक्टर-४ के निकट ही एक फ्लैट खरीद लिया था. उसके गृह प्रवेश के समय उन्होंने अपने सभी मित्रों को आमंत्रित किया था. सुरभि के सरल व्यवहार और लेखन की दुनिया में नाम के कारण यूं भी उसके मित्रों की सूची लंबी थी. टी वी तथा पत्रकारिता की दुनिया की कई चर्चित हस्तियों से भी आभा ने मेरा वहां परिचय कराया.

सुरभि की दुनिया में बदलाव अब साफ दिखने लगा था. यह सुरभि मेरे लिए कई मायने में नई थी. उसे देखकर यकीन किया जा सकता था कि सच्चा प्रेम निश्चय ही स्त्री को सहज सौंदर्य प्रदान कर देता है. सुरभि के चेहरे की दमक उसके प्रभामंडल की कहानी स्वयं बयां कर रही थी. अनन्त की निरन्तर उपेक्षा तथा उसकी अपनी अन्मस्यक जटिलताओं ने जहाँ सुरभि जैसी आत्मविश्वासी लड़की को अपने परिधान और लुक तक के लिए उदासीन बना दिया था वहीं अमिय के उसमें विश्वास तथा नैसर्गिक सहयोग ने उसकी जिन्दगी को यकीनन नये आयाम दिये थे. लगता था कि उसे ऊँची उडान के लिए पंख मिल गये हों ! मेहमानों से फुरसत मिलते ही वह मेरे  सामने आ खड़ी हुई, “बताओ कैसी लग रही हूं?“ मैं उसके बदले हुये स्वरूप को यूँ ही निहार रहा था और उसके अचानक प्रश्न से मुझे लगा जैसे मेरी चोरी पकड़ी गई. मेरे जवाब का इन्तज़ार किये बगैर ही वह मेरी बांह पकड़कर बोली – “अरे, लेंस लगाये हूँ. पुरानी यादों के साथ वह पुराना चश्मा भी दफन कर दिया जिससे सब स्याह ही दिखता था”, और फिर वही खिलखिलाहट भरी उन्मुक्त हंसी का झोंका !

अब सुरभि को नवीनतम परिधानों, ज्वेलरी तथा घर की साज सज्जा में भी बहुत आनंद मिलने लगा था. वह समय-समय पर हम लोगों को घर पर भोजन के लिये आमंत्रित करती और मन से अच्छी-अच्छी डिश बनाकर सर्व करती, घर के  इंटीरियर के बारे में सलाह भी लेती. अमिय और वह दोनों बहुत प्रसन्न थे. उन्हें सुनिधि के रूप में जब बेटी की प्राप्ति हुई तो दोनों ने बहुत शानदार पार्टी दी. उसने निकट ही एक और फ्लैट लेकर उसे फिल्म स्टूडियो में बदल दिया था और दोनों मिलकर बेहतरीन डाक्यूमेंट्री, सीरियल्स, लघु फिल्म्स तथा एड फिल्म्स बनाने लगे. सामजिक मुद्दों पर जागरूक करती लघु फिल्मों से समाज को झकझोरना उसका सपना था. पर, गंभीरता के साथ ही परिहास की उसकी आदत बदस्तूर जारी थी. एक बार उसने मेरे घर फोन किया. बेटी ने फोन उठाकर जानना चाहा तो उसका जवाब था, “बेटा, मैं तुम्हारे पापा की गर्लफ्रेंड बोल रही हूँ, बात कराओ उनसे!”.

बेटी को कुछ समझ नही आया. उसे असमंजस में रिसीवर हाथ में लिए खडा देख मैंने पूछा – “कौन है?”

वह बोली—“आपकी गर्लफ्रैंड”.

वैदेही  ने कहा– “सुरभि के अलावा और कोई हो ही नही सकती”.

…इस बीच मेरा चयन लखनऊ में हो गया था. मेरा कोई ख़ास परिचय नहीं था वहां. अमिय के पापा तब लखनऊ में पुलिस विभाग के जाँच प्रकोष्ठ में वरिष्ठ अधिकारी थे, जिन्हें वहां पुलिस लाइन में सरकारी आवास मिला हुआ था. पुलिस के दंद-फंद से दूर सात्विक प्रवृति थी उनकी. सुरभि  ने अपना भी प्रोग्राम बनाया और रिजर्वेशन कराया लखनऊ के लिये. मैं और वह लखनऊ मेल से दिल्ली के लिये रवाना हुये. सुनिधि लगभग दो साल की रही होगी. टिकट दो थे, और रिजर्वेशन केवल एक सीट का कन्फर्म हुआ था. मैंने सुरभि  को सीट दे दी. वह सुनिधि  को लेकर निचली सीट पर सोने के लिए तैयारी के साथ लेट गई. मैं कभी इधर बैठता, कभी उधर. अन्ततः मध्यरात्रि के आसपास टिकट चेकर ने टिकट चेक किये और सुझाव दिया कि कोई सीट खाली नहीं है, क्यूँ न आप दोनों इसी सीट पर एडजस्ट हो जायें…! सुरभि ने मेरी तरफ देखा, और मैंने सुरभि  की तरफ…फिर सुरभि उसी स्फूर्त हंसी के साथ खिलखिला पड़ी जो उसका ट्रेडमार्क थी. टी टी महोदय अपने कंधे उचककर आगे निकल लिये थे.

सुरभि  के साथ बिताए वह दिन मेरी स्मृति में जस के तस कैद हैं. न केवल उसने मुझे लखनऊ की प्रमुख जगह दिखाई वरन दो दिन में ही कई लोगों से मेरी मुलाकात भी कराई. ऐसे लोग जो आज भी मेरी जीवन यात्रा में मेरे लिए संबल बने हैं.  मैं लगभग दो सप्ताह सुरभि  की ससुराल में रहा. उनके श्वसुर बेहतरीन इंसान थे और सास बहुत ममत्वपूर्ण. बिलकुल घर की तरह बीत गए वह दिन मेरे. बाद में भी, उनके रिटायरमेंट तक, उनसे मिलना-जुलना लगातार बना रहा और उनका वही स्नेह भी लगातार मुझे मिलता रहा.

मैं जब भी दिल्ली जाता सुरभि  से मुलाकात जरूर होती. वह अपनी व्यस्तता के बावजूद मेरे लिये समय निकालती और हम सब मिलकर कुछ अदद मिली-जुली यादों में उलझ जाते. सुनिधि ने सुरभि को अपना प्यार और ममता उड़ेलने का एक और जरिया प्रदान कर दिया था. वह अपनी व्यस्तताओं के बावजूद सुनिधि के बचपन को भी पूरी शिद्दत के साथ जी रही थी. सुरभि  ने अपनी सरकारी नौकरी को अलविदा कह दिया था. या, बकौल सुरभि, उसने एक दिन यूँ ही ऑफिस जाना बंद कर दिया, न कोई इस्तीफ़ा, न कोई हिसाब किसी तनख्वाह या फण्ड का. बस, छोड़ दी नौकरी !

आज, फिर से, यह सब यादें मेरी आँखों के सामने तैर रही हैं. लेकिन अंतर यह है कि आज मेरा मन अन्दर से रुदन कर रहा है. अंतिम बार गौतम बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली सारनाथ पर पर्यटन विभाग के लिये निर्मित्त लघु फिल्म उसने मुझे बहुत मन से दिखा कर उसके निर्माण की बारीकियों के सम्बन्ध में भी समझाया था. अभी भी याद है मुझे वह खूबसूरत फिल्म. उसके फेड इन, और फेड आउट इफ़ेक्ट, साथ ही बेहतरीन कल्पनाशील स्क्रिप्ट ! बिहार सरकार ने पर्यटन संबंधी कई परियोजनाओं पर विचार-विमर्श के लिये उन्हें आमंत्रित भी किया था. उनकी अगली फिल्म तमिलनाडु के शिवाकासी में पटाखा उद्योग की दशा पर प्लांड थी…और फिर एक सुबह, मैंने लखनऊ में अखबार में खबर पढ़ी— “प्रसिद्ध लघु फिल्म निर्माता पति-पत्नी की आग में घिरकर मौत” !

सुरभि  से मेरा कोई रक्त का सम्बन्ध नहीं था, पर कुछ कमतर भी नहीं था. एकबारगी मुझे लगा कि यह नहीं हो सकता. उस संक्षिप्त समाचार को फिर मैंने अन्य समाचारपत्रों में भी पढ़ा. मेरी आँखों के सामने अँधेरा छा रहा था. लगा, कि मेरा दिल बैठा जा रहा है. उससे जो रिश्ता था वह ऐसे कैसे विलीन हो सकता था? ईश्वर इतना निर्दयी कैसे हो सकता है ? अभी तो उसकी जिन्दगी के बेहतर दिनों का आगाज़ हुये मात्र चंद साल ही बीते थे. कितनी प्रसन्न दिखती थी वह. पर, खबर सच थी. बाद में पता चला कि सुरभि और अमिय ने वह रात अगर किसी अच्छे होटल में गुजारी होती तो शायद वह दोनों आज हमारे बीच होते. पर, उन्हें तो जूनून था. काम में जब तक वह दोनों अपना दिल-दिमाग और शरीर सब कुछ नहीं झोंक देते थे, उन्हें मजा नहीं आता था. बाद में पता चला कि उन्होंने स्वयं यह निर्णय लिया था कि वह पटाखों के विशाल गोदाम के ऊपर बने कमरे में ही रात्रि विश्राम करेंगे ताकि सवेरे भोर से ही शूटिंग की जा सके. शार्ट सर्किट से उठी आग की लपटों से कम, दम घुटना उनकी मौत का कारण अधिक बना. कहें तो उनका काम के प्रति जूनून ही उनकी मौत का कारण बना.

….आज, सुनिधि को पुरस्कार मिलने की खबर से पुनः मेरी आँखें नम हो आई. पर, आज यह आंसू ख़ुशी के थे. सुरभि के स्वप्न को जो जिया था सुनिधि ने, उसके अधूरे काम को बेहतरीन ढंग से पूरा कर. फिल्म थी “शिवाकासी—एक स्वप्न की मौत”, जो वहाँ के असंगठित पटाखा उद्योग में लगे हजारों बाल श्रमिकों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिति के दोहन तथा सरकारी उपेक्षा पर एक बेहतरीन रिपोर्ताज थी ! …कम से कम सुरभि  और अमिय का यूँ अचानक अखबार के पन्ने में एक खबर में सिमट जाने का आशीर्वाद सुनिधि को मिल गया था. क्या सपने मरते हैं भला कभी ?

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–राजगोपाल सिंह वर्मा 

संबल

तुम्हारे कुछ लम्हे,
कुछ नाजुक से वह पल,
जो मेरे अहसासों को जीते हैं,
तुम में,
और कुछ यादें,
जो तुम्हें,
देती हैं सुकूं,
चुराना चाहता हूँ,
मैं भी,
ताकि पढ़ सकूं,
मन की बातें,
और खुल सकें,
तुम्हारे खूबसूरत-से,
इस अंतर्मन के राज,
जिनसे हूँ मैं अभिभूत,
और जो देते है सम्मान तुम्हें,
तुम्हारी सोच को,
और बनते हैं,
मेरा भी संबल,
बना जाते हैं,
खूबसूरत,
खुशबुओं से अपनी,
इस जिन्दगी को भी.

रामकिशोर

आज लगातार तीन दिन हो चुके थे, अपनी आदत के विपरीत रामकिशोर को बिना किसी पूर्व सूचना के अनुपस्थित रहे हुये. पहले दिन जरूर उसकी पत्नी का फोन आया था कि वह वाइरल से पीड़ित हैं, और आज नहीं आ सकेंगे. अगले दिन मैंने अपने अर्दली से जानकारी लेने को कहा तो पता चला कि मोबाइल स्विच ऑफ है.  उसके बाद भी वह ऑफिस नहीं आया तो मुझे चिंता हुई. तब तक चौकीदार हारून जीवित था, और अकसर वह भी ड्राईवर की ड्यूटी करने को बेझिझक तैयार रहता था. वैसे भी ऑफिस के कर्मचारी ना तो रामकिशोर के घर कभी आना-जाना रखते थे, और ना ही वह किसी से ऐसे सम्बन्ध निर्वहन की अपेक्षा रखता था. बस, केवल हारुन ही था, जो उसका घर जानता था.

तो, दोपहर के बाद लगभग ४.३० बजे हारून को लेकर मैं रामकिशोर के घर की ओर रवाना हुआ. उसका घर ऑफिस के ठीक विपरीत दिशा में उत्तर में था जबकि कार्यालय आगरा जैसे व्यस्त नगर में दक्षिण के छोर पर स्थित था. संकरे रास्तों से पार करते हुए हम लोग अंततः खटीक मोहल्ले के उस छोर पर पहुँचने में सफल हो गये जो जयपुर की ओर जाने वाली रेलवे लाइन के समानांतर चलते हुए बीच-बीच में ऊबड़-खाबड़ तथा और भी संकरा  भी हो जाता था. रामकिशोर के घर के नजदीक गली में मुड़ने तक रास्ते की कूड़े की दुर्गन्ध नथुनों में अधिक प्रवाह से चढ़ने लगी थी. मन खराब सा हो रहा था, कोई दुर्बल मन का व्यक्ति होता तो अब तक इरादा बदल चुका होता, परन्तु मैं अपने निश्चय पर दृढ था. अब मंजिल भी नजदीक थी, इसलिये भी हिम्मत खोने का खतरा लेना मूर्खता होती.

ड्राईवर का कोई अपना नाम भी होता है, यह बहुत कम लोग जानते हैं, या जानना नहीं चाहते क्यूंकि वे स्वयं, उनके परिजन, बच्चे या मित्र भी उसे ड्राईवर के नाम से ही संबोधित करना अपना धर्म समझते हैं. इसके विपरीत, बचपन की एक घटना ने मेरे मन पर ऐसा प्रभाव डाला कि मैं अपने ड्राईवर के साथ-साथ किसी टैक्सी या अन्य दूसरे ड्राईवर के साथ कहीं यात्रा करने से पूर्व उसका नाम पूछना नहीं भूलता, और बाद में उसे उसी नाम से संबोधित करता हूँ. बात उन दिनों की है जब मैं अपने पिता के साथ उनके एक मित्र अधिकारी के घर गया था. उन्होंने जैसे ही अपने ड्राईवर को चलने के लिये आवाज लगाई तो वह गाडी की चाभी का गुच्छा उनकी मेज पर रखकर हाथ जोड़कर बोला, “सर, बहुत हुआ, अब हम नौकरी नहीं कर पायेंगे. आप हमें इन्सान नहीं कुछ और ही समझते हैं. जब हमारी पहचान ही नहीं बन पा रही, तो ऐसी नौकरी की रोटी कैसे हज़म करें. फिर हमारा नाम इतना बुरा भी नहीं”. चौबे जी की समझ में बात आ गई, और उसके बाद वह उस ड्राईवर को हमेशा विनोद के नाम से ही पुकारते पाये गये. दरअसल आपका नाम जो भी हो, वह नाम दूसरे किसे व्यक्ति के मुंह से जब लिया जाता है तो उस व्यक्ति के कानों में संगीत का सा काम करता है, ऐसा मेरा मानना है, और मेरी इस सोच के कई बार मुझे अद्भुत परिणाम मिले हैं.

जी,  रामकिशोर मेरा ड्राईवर था. वह मुझे सरकारी ओहदे के कारण मिला हुआ था, जिसकी अलिखित ड्यूटी में अघोषित समय तक मेरे साथ रहना, और आवश्यकतानुसार छुट्टियों तथा देर समय तक भी अपनी ड्यूटी को निभाना शामिल था, जिसके लिये उसे अलग से पारिश्रमिक भी मिलता था. गाडी की पार्किंग कार्यालय परिसर में होती थी, इसलिये या तो एक दिन पूर्व वह बताये समय पर मेरे घर की डोरबेल को अपनी चिर परिचित लम्बी घंटी के रूप में  पुश करता था, या ऑफिस में समय से पहुँच कर मेरी कॉल की प्रतीक्षा करता, और १० मिनट के भीतर घर के गेट पर खड़ा होता था. लोग बताते हैं कि वह १० बजे के समय से काफी पूर्व, आमतौर पर ८.३० बजे सुबह ही अपनी साइकिल से कार्यालय पहुँच जाता और एक घंटे तक मनोयोग से गाडी की सफाई करता. पता नहीं ऐसी सफाई की कुछ जरूरत भी होती है या बस यूँ ही. भरी सर्दियों और बारिश या आंधी-तूफ़ान में भी वह अपना रूटीन परिवर्तित करता हो, ऐसा मेरी जानकारी में नहीं था. वैसे रामकिशोर का घर कार्यालय से लगभग १२ किलोमीटर दूर था. यानि उसे कार्यालय आने और जाने में २४ किलोमीटर प्रतिदिन की साइकिलिंग तथा दो घंटे अतिरिक श्रम करना पड़ता था. शायद इसी कारण वह अपने रिटायरमेंट से मात्र दो वर्ष पूर्व तक भी अपनी काया को छरहरा बनाये रखने में सफल दिखता था.

मीटिंग्स तथा भ्रमण कार्यक्रमों में ले जाने के अलावा उसे बाकी का समय ऑफिस में ही गुजारना पड़ता था. वह दिन भर हाल में आराम से बैठा रहता. दोपहर में नियत समय पर गाडी से निकालकर अपना टिफिन लाता और एक कोने में बैठकर अकेले अपना खाना खा लेता. गाडी में टिफिन रखने का लाभ यह था कि वह आवश्यता पड़ने पर बाहर भी अपना भोजन समय से कर सकता था. इस बीच अगर कभी मुझे भी किसी जरूरी काम से कहीं जाना होता तो भी वह बेपरवाह बन कर उसी गति से भोजन करता, जिससे पहले से करता आ रहा था. हारकर, मैंने स्वयं आदत डाल ली थी कि वह आराम से भोजन कर निवृत हो जाये तभी चलने की बात सोची जा सकती थी, भले ही कोई इमरजेंसी क्यूँ न हो ! यदि किसी समारोह में, या शादी जैसे कार्यक्रमों में मुझे सरकारी गाडी से जाना पड़ता तो भी वह अपने टिफ़िन से ही भोजन करता, कई बार तो आयोजकों के बहुत अनुनय-विनय पर भी वह टस से मस नहीं हुआ, और मैंने उसे फिर भोजन के लिये पूछना भी छोड़ दिया. उसने इस नियम को कभी भी नहीं तोडा, हाँ, नगर से बाहर की बात अन्यथा थी, वहां इस आदत को वह छोड़ देता.

रामकिशोर दिन में भोजन के अलावा दो बार चाय जरूर पीता, पर वह चाय ऑफिस में कभी पीते नहीं देखा गया. उसका शौक था कि अपने किसी साथी चपरासी या अन्य कर्मचारी को चाय वाले की दुकान पर ले जाता जहाँ वे एक-एक कप चाय पीते और आपस में तथा अन्य ग्राहकों से दुनिया-जहाँ के मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखते. इसके लिये उसे कम से कम ४५ मिनट का समय देना जरूरी था. वह चाय पीने जब भी जाता धीरे से मेरे कक्ष का आधा दरवाजा खोलता, और पूछ कर जाता. अगर उसे कहा जाता कि आधे घंटे में आ जाना, चलना है कहीं, तो वह असमंजस में पड़ जाता, और बोलता कि ठीक है सर, बाद में पी लेंगे चाय, आप चलिये.

हाँ, एक बात और. वह सवेरे चींटियों को आटा और खाना खाने के बाद चिड़ियों को दाना, और रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े पूरे नियम से जरूर डालता. इसके लिये उसने ऑफिस की चारदीवारी की एक मुंडेर की जगह निर्धारित की हुई थी. वहां गर्मियों में पक्षियों के लिये बाजरा और मिटटी के बर्तन में पानी की व्यवस्था की भी उसने जिम्मेदारी खुद ही ओढ़ी हुई थी. आसपास मंडराने वाले कुत्तों को भी वह कुछ न कुछ प्यार से खाने का भी इंतज़ाम करता रहता. वह सब निरीह बनकर पूँछ हिलाते हुये उसके आसपास मंडराते दिख जाना आम बात थी.

इस सबके बावजूद, रामकिशोर के बारे में मशहूर था कि वह एक नंबर का कंजूस था. वह चाय की दुकान पर जाता जरूर था, लेकिन किसी न किसी का साथ लेने का मतलब चाय के पैसे उससे दिलवाना होता था. अगर कभी मजबूरी में चाय पीने के लिये कोई और पैसे न निकलता तो बस अपनी चाय के पैसे भरने तक ही उदारता रहती उसके मन में. लोग बताते थे कि उसका काफी पैसा ब्याज पर भी चलता है, और उसने दो गाड़ियाँ टैक्सी में भी चलवा रखी हैं, वगैरह, वगैरह. ऑफिस के सब कर्मचारियों के बारे में सब एक दूसरे को जानते थे कि कौन किस किस्म के नशे के चंगुल में हैं, परन्तु मैं तो आज तक नहीं जान पाया कि रामकिशोर कौन सा नशा करता था. गाडी चलने में वह पूरा अलर्ट रहता, नशे में तो मैंने उसे कभी नहीं देखा. शहर से बाहर या यूँ कहें कि अनजान रास्तों पर उसका आत्मविश्वास जवाब दे जाता, विशेष रूप से जब भी दिल्ली या नॉयडा जाना होता. “अब किधर, अब किधर”, “साहब बाएं या दायें”, “जी, किधर”, बस ये ही उसके शब्द होते. कई बार झुन्झुलाहट भी होती, मैंने एक दो बार बोला भी कि भई, ड्राईवर कौन है, आप या मैं, पर मैं धीरे-धीरे समझ गया, और मैं अब  समय पड़ने पर उसका जीपीएस ट्रैकर का रोल करने में बुरा नहीं मानता था.

अभिवादन के अलावा पिछले लगभग पांच साल में उसका-मेरा कोई संवाद हुआ हो, ऐसा मुझे स्मरण नहीं पड़ता. हाँ, उसको आब्ज़र्व करते हुये ही मेरे पास इतने किस्से इकट्ठे हो गये थे कि उस पर एक पूरा उपन्यास लिखा जा सकता था. उसकी एक आदत मुझे बहुत पसंद थी, इशारों को समझकर काम को अंजाम देना. अगर चलती गाडी में मेरी कोई महत्वपूर्ण कॉल आ जाती तो वह हल्की सी तिरछी निगाहों से मुझे देखता और सड़क के किनारे गाडी लगाकर, गाडी से कुछ दूर इस प्रकार खड़ा हो जाता कि वार्तालाप का कोई अंश उसके कानों में न पड़ जाये. मैंने उसे न तो कभी अपने बारे में कुछ कहते सुना और न ही किसी की शिकायत करते.

एक और किस्सा. मेरे निर्देश थे कि यदि मैं अन्यथा न बताऊँ तो उसे सवेरे ठीक १० बजे गाडी लेकर घर पर उपस्थित हो जाना है. अगर मुझे कोई परिवर्तन करना होता तो मैं या तो उसे एक दिन पूर्व ही बता देता या फोन पर निर्देश दे देता. भीषण ठण्ड का समय था वह. मेरा मन बहुत आलस्य से भरा था. कोई विशेष काम भी नहीं था ऑफिस में. मैंने पत्नी को सुबह ही बता दिया था कि आज मैं बस अपनी नींद पूरी करूंगा, न ऑफिस जाना और न कुछ और. मुझे याद ही नहीं रहा कि अगर रामकिशोर को मना नहीं किया तो वह अपने समय पर हाज़िर हो जाएगा. खैर, मैंने रजाई तानकर सोने की अपनी इच्छा को मन भर पूरा किया. बारह बजे के आसपास उठकर स्नान कर, ब्रेकफास्ट किया, और फिर बिस्तर में घुस गया. मोबाइल मैंने अपना स्विच ऑफ कर लिया था. जानता था कि यदि कोई बहुत ही जरूरी काम होगा तो सरकारी लैंडलाइन पर कॉल आ ही जायेगी. लगभग चार बजे फिर से कुछ भूख लगी तो उठ बैठा और कुछ हल्का भोजन लेकर मैं लॉन में टहलने आ गया. सरकारी मकान काफी बड़ा था. लगभग छः हज़ार वर्ग फुट का तो लॉन ही होगा, उसके बाद फिर खुला एरिया और चारदीवारी के बाद प्राइवेट रोड़ जो महात्मागांधी मार्ग की मुख्य सड़क पर खुलता था. अचानक मुझे घर के बाहर चारदीवारी के पार अपनी सरकारी गाड़ी खड़ी होने का आभास हुआ. मैंने गौर से देखा, हाँ, यह तो सरकारी टाटा स्पेसियो थी. मैंने कौतुहलवश नजदीक आकर देखा तो रामकिशोर बाहर एक छोटे से चबूतरे पर बैठा हुआ ऊंघ रहा था. मैंने नजदीक जाकर पूछा, “तुम कब आये यहाँ”, वह हडबडाकर खड़ा हो गया, और बोला, “जी, सुबह १० बजे”.

…उफ़, मुझे बहुत ग्लानि हुई. यह सही था कि मुझे याद ही नहीं रहा उसको मना करना, न ही कोई फोन किया; और वह हमेशा की तरह अपने समय पर आ बैठा. यही नहीं, वह पिछले छह घंटों से कडकती ठण्ड में बाहर बैठा अपनी ड्यूटी निभा रहा है, और मैं नींद की विलासिता में डूबा हुआ, अपने पद के दुरुपयोग में संलिप्त हूँ. मैंने उससे अपने अक्षम्य-से अपराध के लिये क्षमा मांगी और उसे मुक्त किया. उसने केवल एक मुस्कान में मुझे प्रतिउत्तर दिया, और अभिवादन कर वापिस चला गया. पर, मेरी ग्लानि ने काफी समय तक मुझे बहुत कष्ट दिया.

अगर रामकिशोर का हुलिया आपको बताया जाये तो मेरे सहित कुछ लोगों की राय थी कि वह अपने समय में तमिलनाडु के कुख्यात दस्यु सम्राट वीरप्पन का मिनी रूप लगता था, खास तौर से अपनी विशिष्ट घनी व् घुमावदार मूंछों के कारण, जो हालाँकि मेरी राय में उसके अपेक्षाकृत कमजोर हड्डियों के ढांचे वाले शरीर पर जंचने के बजाय उसे कार्टून का रूप अधिक प्रदान करती थी, पर कुछ लोग बिना किसी परवाह के अपना लुक बनाये रखने में ही शान समझते हैं—वह उनमे से ही एक था. जब हँसता तो उसके आगे के सिर्फ दो ही दांत दिखाई पड़ते, जो उसकी हंसी को विद्रूपता में बदल देते. उसके साथी कहते कि साहब यह जो पक्षियों और कुत्तों को रोटी के टुकड़े डालता है, उसका कारण रोटी के कड़े किनारों का उसके जबड़ों से न चबाया जाना है, न कि उसका प्रेम भाव.

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…पिछले लगभग पांच सालों की इन यादों के बीच पता ही नहीं चला कि कब रामकिशोर का घर आ गया. गली का अंतिम मकान, जहाँ उसका किनारा अस्थाई दीवार, जो बीच से जगह-जगह से टूटी थी और टीन की एक चादर के टुकड़े से ढंका था, उसकी बाउंड्री का ऐलान कर रहा था. टूटी, अधूरी कुण्डी को थपथपाने से पहले ही, कौतूहलवश गाडी की आवाज को सुनकर, एक अपेक्षाकृत हष्ट-पुष्ट महिला ने आधा दरवाजा खोल कर झाँका ही था, कि वह और हारून एक दूसरे को पहचान गये. मैं तब तक दूर ही था कि हारून ने इशारे से मेरे आने की सूचना सार्वजनिक कर दी थी. वह एक कमरेनुमा आधे-अधूरे से मकान में घुस कर तेज़ी से एक कुर्सी उठा लाई और उसे एक कपडे से झाड़ने का उपक्रम करने लगी. कुर्सी लोहे की थी, और उसके हत्थों व अन्य जगहों पर जंग के पुराने निशान दृष्टिगत हो रहे थे, जिन्हें संभवतः कभी दूर करने का प्रयास नहीं किया गया था.

पत्नी ने रामकिशोर को हमारे आने की सूचना दे दी थी…पर उसे आने में थोडा समय लग रहा था. वह एक स्टील के गिलास में मुझे पानी भी दे गई थी. हारून काफी दूरी पर खड़ा था. पत्नी ने बताया कि आज उसका बुखार कुछ कम हुआ है. शायद, परसों तक कमजोरी भी दूर हो जाए, ऐसा डॉक्टर का कहना है. मैंने रामकिशोर के आने की प्रतीक्षा करने से पहले उसकी पत्नी से ही जानना चाहा कि उसका मोबाइल क्यूँ स्विच ऑफ है, जिस पर पत्नी ने बताया कि बेटे का मोबाइल कुछ खराब हो गया था, तो टेम्पररी तौर पर उसने अपने पापा के मोबाइल में अपना सिम डाल रखा है, जिससे वह स्विच ऑफ बताता है. मुझे थोडा अटपटा भी लगा यह तर्क पर मैंने मान लिया. अभी भी रामकिशोर बाहर नहीं आ पाया था. मना करने के बावजूद उसकी पत्नी चाय बनाने चली गई थी.

जिस जगह मैं बैठा था, वह वरांडा कहा जा सकता है. चूँकि कमरा एक ही प्रतीत हो रहा था, इसलिये उस वरांडे को ही ड्राइंग रूम के तौर पर प्रयुक्त किया जा रहा था. वह हालाँकि अपेक्षाकृत बड़ा एरिया था, जिसके एक भाग से बाहर का दृश्य व खुली जगह साफ़ दिखाई पड़ती थी. मैं देख पा रहा था कि उस कक्ष के बाहर दो कुत्ते बैठे थे, एक बिल्ली कई बार हमारे नज़दीक से आकर गुजरी, जिससे लगता था कि वह पालतू है. दरवाजे के बाहर दो मिट्टी के बर्तनों में पक्षियों का दाना और पानी रखा हुआ था. अभी दो तोते बेख़ौफ़ पानी पीने के बाद उसमें किलोल कर रहे थे.

तब तक रामकिशोर बाहर आ गया. दूर से ही उसने अपने हाथ जोड़ लिये थे, और मैंने भी उसी तरह उसका अभिवादन लगातार तेज़ बुखार से उसका शरीर क्षीण पद गया दिखता था. वह एक छड़ी के सहारे धीमे-धीमे पास आया और नज़दीक पड़ी चारपाई पर बैठ गया. उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और चेहरा पीला पड़ गया था. मैंने जानकारी लेनी आरम्भ की थी कि घर के बाहर बैठे दोनों कुत्ते कुछ आभास सा पाकर धीरे-धीरे उसके पास आ गये और पैरों में लगभग लोटपोट हो गये, वह उन्हें सहलाता जा रहा था और अपने इलाज़ का अपडेट भी मुझे देता जा रहा था. उधर, आसपास घूम रही बिल्ली भी अब बेखौफ रामकिशोर की गोदी में जा बैठी थी, मानो उसे कुत्तों पर प्यार प्रदर्शित करने पर अपना रोष प्रकट करना हो. बिल्ली की म्याऊं-म्याऊ तथा कुत्तों की कूं-कूं के साथ प्यार भरी हलकी भौं-भौं से वातावरण में काफी ममत्व आ गया था. इस बीच उसका एकमात्र बेटा जो इंटरमीडिएट की पढाई कर रहा था, भी आ गया था, परन्तु उसने अभिवादन के नाम पर अपनी गर्दन हल्के से झुकाने के अलावा रुकने का भी प्रयास नहीं किया और सीधे कमरे में चला गया.

बुलाये जाने पर बेटा फिर से पास आया और न जाने क्या सोचकर उसने मेरे पैर छुए. अमित था उसका नाम. पूछे जाने पर उसने बताया कि वह पिछले साल अच्छी तैयारी न होने के कारण अपना एग्जाम नहीं दे पाया था. इस बार अच्छी से तैयारी के बाद फिर से एग्जाम देना है. उसके टाइट कपड़ों, फ़िल्मी हेयर स्टाइल और उसके आने से वातावरण में महक रहे परफ्यूम की सुगंध उसके पढाई के स्तर की चुगली कर रहे थे. बेटे से हुई संक्षिप्त वार्तालाप के दौरान रामकिशोर नीची निगाहें किये शांत बैठा रहा. इस बीच मैंने गौर किया कि एक विचित्र घटना घटी. अभी तक रामकिशोर के पैरों में लोटपोट कर रहे कुत्ते, गोदी में मचल रही बिल्ली और बाहर पानी पीते हुये तोते— सब धीरे-धीरे गायब हो गए, ऐसे, जैसे कहते हैं ना कि गधे के सर से सींग !

मैंने इस बीच चाय की घूंट खत्म कर ली थी. हारुन भी तैयार खड़ा था. रामकिशोर को अच्छे स्वास्थ की कामना के साथ उससे विदा ली, लेकिन वह बाहर मुझे गाड़ी में बिठाये बिना नहीं जाने वाला था, सो साथ चलने लगा. गेट से सटी खडी नई रॉयल-इनफील्ड क्लासिक मोटरसाइकिल के ५०० सी सी के डस्ट स्टॉर्म रंग के सबसे महंगे वर्ज़न से मेरी आँखें एकबारगी चुंधिया-सी गई. जब मैं आया तो यह बाइक कवर से ढक कर खड़ी थी, इसलिये उसकी भव्यता पर ध्यान नहीं गया. कभी मैंने भी इरादा किया था उसे लेने का पर या तो पूरे पैसे नहीं जुटा पाया, या फिर कंपनी के न्यूनतम छह माह के वेटिंग पीरियड के कारण मेरी किस्मत में वह नहीं हो पाई.

…अमित उस साफ़ मोटर साइकिल को भी शीशे की तरह चमकाने की अपनी कोशिशों में जुटा था. उसने अपने काम में जुटे हुए ही मुझे एक मुस्कुराहट युक्त अभिवादन किया !  …दोनों कुत्ते निरीह सा बन दूर से ही टकटकी लगाकर देख रहे थे, बिल्ली भी आस-पास नहीं दिख रही थी, हाँ कुछेक चिड़ियाएँ जरूर पानी के पात्र के आस-पास फुदक रही थी. गाडी में बैठने के बाद मैंने देखा कि अमित कुत्तों को कंकड़ के टुकड़े फेंक कर भगा रहा था. एक मोटा टुकड़ा उनमें से छोटे कुत्ते पर लगा और वह बिलबिलाकर भाग खड़ा हुआ. रामकिशोर ने एक बार बेटे अमित को घूरा और फिर प्यार से उस कुत्ते की और नजर डाली जो धीरे-धीरे आँखों से ओझिल हो गया था..

….और गाडी उस गली से काफी दूर निकल आई.

 

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–राजगोपाल सिंह वर्मा 

…तुम साथ हो !

कभी मंद-मंद,
कभी तेज़,
और कभी मद्धिम
दिलकश हवायें,
बारिश की चंद बूँदें,
जो जज़्बा रखती हैं,
समुन्द्र में तूफ़ान सा,
और सौंधी मिटटी,
तैरते हुये अहसास उनमें,
एक रोमांच,
तुम्हारे अँगुलियों और,
पोरों के स्पर्श मात्र से,
सुहाना है न सब,
इस अमलतास और,
गुलमोहर के वृक्ष,
और उनकी छाया में,
गड़गड़ाहट,
विद्युत सी,
चिड़ियों का कलरव,
कोयल की कूक,
कभी-कभी,
मौसम होता है ऐसा,
थम क्यूँ नहीं जाता यह,
कम से कम तब तक,
जब तक तुम साथ हो मेरे !

–राजगोपाल सिंह वर्मा