बात पिछले सप्ताह की है। हम लोग ताज महोत्सव में स्टाल पर कुछ खरीददारी कर रहे थे। खूबसूरत पेंटिंग्स सुन्दर से फ्रेम में हमें अपने ड्राइंग रूप में उपयुक्त स्थान पर लगाने के लिये बहुत अच्छी लगी। कीमत थी रु 650 प्रति, और दो पेंटिंग्स क्रय करनी थी।

दुकानदार से सौदेबाजी की कोशिश तो करना हम लोगों का स्वाभाविक गुण है। भीड़ भी काफ़ी थी, और उसकी बिक्री भी धड़ल्ले से हो रही थी। उसने रु 50 के डिस्काउंट यानि रु 600 से नीचे पेंटिंग देने से स्पष्ट इंकार कर दिया। हम पति-पत्नी ने एक दूसरे की आँखों में देखा और चूँकि पेंटिंग अच्छी थी अतः मूक सहमति बन गई। रेट को लेकर दुकानदार से थोड़ी झिक-झिक और की, लेकिन उसने कोई भाव नहीं दिया।

1

अंततः मैंने जेब से रु 500 के दो तथा दो सौ के दो, यानि कुल रु 1200 उसे थमा, मनपसंद पेंटिंग्स पैक करा ली। इस प्रक्रिया में लगभग पांच मिनट और लगे होंगे। मैं पैकेट लेकर दो कदम ही बढ़ा था कि दुकानदार ने मुझे आवाज लगाई, “ऐ भाईसाहब, सुनिये”, पहले मैंने ध्यान नहीं दिया और एक -दो कदम और बढ़ा चुका था, लेकिन दूसरी आवाज से समझ आ गया कि उसकी पुकार मेरे लिये ही थी। मुझे थोड़ी झुंझलाहट हुई, लगा कि वह शायद फिर से रु 650 के रेट से शेष रु 100 की और मांग न कर बैठे। मैं थोड़ा नाराज़गी के भाव से उसके पास पहुंचा तो उसने मुझे मेरे दिये हुये रु 100 के दोनों नोट यानि कुल रु 200 वापिस करते हुये कहा कि, “सर, इनकी कीमत रु 500-500 ही है। बढे हुए रेट तो हमने बार्गेनिंग के लिये रखे हैं, आपने जोरदार बार्गेनिंग नहीं की, सो आपको अधिक पैसे देने पड़े। पर हम गलत कीमत नहीं लेते हैं, जो जायज है वही लेंगे।”

अब मुझे कैसा लग रहा था, मैं क्या बताऊँ। मैं क्या सोच कर उसके पास वापिस गया था और उसने मुझे क्या उपहार दिया…😊

Advertisements