–राजगोपाल सिंह वर्मा 

तुम छोड़ गए तो क्या,
फूलों ने पल्लवित होना,
छोड़ा नहीं है अभी,
और खुशबुयें भी हैं,
बरक़रार उनमें,
फैलाते हैं सुगंध अपनी,
चहुँ ओर,
स्वच्छन्द,
बिना भेद किसी,
उसी ताज़गी,
उसी उमंग के संग,
हैं संबल हमारी,
वह आशाओं के,
प्रतीक हैं जीवन के,
जीवंतता के…
और हम,
करते हैं व्यापार,
इन मुस्कुराते फूलों का भी,
रखते हिसाब,
एक-एक कली का,
विचित्र है न बहुत,
पर,
मैंने सहेज रखे हैं,
कुछ सूखे फूल,
और उनके अवयव,
अपनी किताबों में,
जिनसे महकती है,
अभी भी,
यह जिंदगी मेरी,
कैसे मैं उऋण हो पाऊं,
तुम्हारी इस मसीही,
दृष्टि से,
दूर रहकर भी,
बाँट रहे हो खुशबुएँ
सभी को !

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