अंधियारे ने गहराई,
अपनी स्याह चादर,
छाया सन्नाटा,
बस सब ओर,
अस्त हुई अंततः,
खूबसूरती,
सुनहरी लालिमाओं की,
और चुक गया,
उनका तेज़,
पर,
कब तह यह अँधियारा,
लड़ पायेगा स्वयं से,
अंधकार में कभी,
पनपा जीवन कोई,
स्पंदन भी,
कोई नहीं,
विराम चाहती हैं,
धड़कनें यह
कुछ तो उजियारा,
मांगती है,
यह निस्तेज सी जिन्दगी,
हवायें भी हैं रुष्ट,
और पत्तों ने भी,
ली है चुप्पी साध,
दीप ज्वलित हो रहे,
मंदिर में,
और नमन हुआ,
फिर से उजियारे को,
हो रही प्रतीक्षा,
एक नयी आशा,
और किरणों के संग,
विश्वास की,
कल फिर आएगा,
फिर चहकेंगे पक्षी,
और फिर महकेंगे उपवन.

–राजगोपाल सिंह वर्मा

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