–राजगोपाल सिंह वर्मा 

सूरज की,
अंतिम किरणों की,
विदाई की है बेला अभी,
और सुनहरी,
कुछ गुलाबी,
लालिमायें,
खो रही हैं वह,
शनै:शनै:,
अपने आप से,
तज रही है वह,
उस अंधियारे को,
जिसका कोई नहीं,
न भूत,
और न भविष्य,
बस कालिमा एक,
स्याह रात की,
चारों ओर,
दूर-दूर तक;
फैलाया प्रकाश,
उदत्त जीवन,
और मुस्कान,
दी हैं सबको,
एक समान
विलीन होना,
स्वीकार है,
जानती हैं वह,
कि जीवन है इतना ही,
न कम न ज्यादा,
फैलायें चाहे वह,
उजियारा ,
चाहे जितना !

 

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