— राजगोपाल सिंह वर्मा 

प्रेम एक है,
पर परिभाषाएँ अनेक,
न कोई शास्त्र,
न दर्शन कोई,
ग्रन्थ कोई न देता ज्ञान,

प्रेम का,
पुरुष खोजता प्रेम,
स्त्री की आँखों में,
और स्त्री खोज रही उसको,
एक सरल हृदय में,
निश्छल, निर्मल सा रूप लिये आँखों में,
पुरुष मानता अधिकार जिसे,
और अपेक्षा समर्पण की,
स्त्री का मन चाहे,
एक बच्चों से उपवन की !
अस्तित्व विलीन हो जाये उसके पौरुष में,
और सिमट जाये बन अंश मात्र उसके मन का,
ऐसी अभिलाषा क्या प्रेम नहीं है,
एकाकार हो जाएँ भले ही,
अस्तित्व क्यूँ मिट जाये किसी का,

कितना उत्सर्ग किया,
उत्कर्ष प्रेम का पाने को,
परस्पर सुख अर्जन में भागी तो,
दोनों ही हैं न,
प्रेम नहीं कोई शर्त है,
न बंधन किसी संस्कार का,
मन को मन से राह मिले,
तो ही बस प्रेम कहलाये,
और बंधन में स्वयं बंध जाये.

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