(१)

दिल और दिमाग,
दोनों का द्वन्द,
पुराना है,
चला आ रहा है,
अनादि काल से,
जबसे विकसित हुआ,
मस्तिष्क मनुष्य का,
और हुई सोच विस्तृत,
पर,
दिमाग घूमता है,
शब्दों के जाल में,
सीखता है,
परखता है,
बहुत कुछ,
इस मकडजाल से,
मंथन,
मंथर गति,
संदेह,
और दूरदृष्टि,
लाभ-हानि का गणित,
सबका उसका आकलन,
है पूरा और सटीक,
कहता कुछ यूँ वह,
“सतर्क रहो,
सिर्फ मैं, और मैं”,
शेष सब गौण हैं ,
है यही मूल मन्त्र उसका,
बन तर्क शक्ति का उपासक,
भावना शून्य,
निष्णात यद्यपि स्वयं में.

(२)
….और प्रेम,
निश्छल,
शिशु मन सा,
निर्मल,
जैसे पावन नदी,
और बहाव उसके जल का,
जो कहता,
“बह जाने दो मुझे,
बस यूँ ही,
कृतज्ञ हूँ मैं तो”,
टकराऊंगा गर,
चट्टानों से,
“चोट लगे,
तो मुझे लगे,
सह जाऊं सब दर्द,
उससे उपजे प्रेम से,
मिट जाये चाहे,
यह अस्तित्व मेरा”.
“…क्या पता जन्मे कोई मोती,
मेरे बिखरे हुये अंशों से,
या सहेजे कुछ लम्हों से,
और कर जाये सफल,
किसी अनचीन्हे से,
और निश्छल प्रेम के,
एक अनजाने से रिश्ते को”.
प्रेम ही प्रारब्ध है,
प्रेम ही उपासना,
शेष सब मायावी यहाँ !

–राजगोपाल सिंह वर्मा 

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