उस रात,
तुमको देखा मैंने,
शांत,
उदास,
उस खिड़की के पास,
जहाँ तुम थी,
और तुम्हारी छाया,
निश्चेत,
पर प्रतीक्षारत,
बाट जोहती,
किसी संवाद,
या फिर,
एक सन्देश मात्र की,
पर नैराश्य के बादल,
लगता है कि,
अभी छंटे नहीं,
क्यूंकि,
खिड़की के पट,
अभी भी खुले हैं,
और तुम्हारी छाया,
दिख रही है,
तुम्हारी ओट को,
ओढ़े हुये,
इस भोर को भी,
बीती रात की ही तरह !

–राजगोपाल सिंह वर्मा 

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