हाँ,
यह सच है,
कि मैंने तुम्हें प्यार किया,
दरकिनार कर,
सभी बंधनों को,
माना तुम्हें,
अपने अन्तर्मन से,
ख्वाब भी देखे बहुत,
प्यार में जरूरी तो नहीं पर,
कि तन से नाता हो जरूरी,
मन से मन का मिलन,
क्या पर्याप्त नहीं,
तन तो पूजा है,
मंदिर है तुम्हारा,
पूज्य है वह मेरे लिये भी,
मेरा रोमांस तो,
तुम्हारी आत्मा से है,
छूना चाहता हूँ मैं,
तुम्हारे इस खूबसूरत,
अंतर्मन को,
महसूस करना है,
उसकी खुशबुओं को,
और बहती बयार को भी,
बस,
था शाश्वत, रहेगा भी,
यह प्रेम,
यूँ ही सदा,
निर्बाध,
स्वच्छ, निर्मल
जैसा बहता पानी,
किसी नैसर्गिक जल स्रोत का !

–राजगोपाल सिंह वर्मा 

Advertisements