अनिंद्रा भी,
खूबसूरत बीमारी है एक,
जज्बात उभरते हैं तब,
दुनिया सो जाती है जब,
और धड़कनें,
सुन पाती हैं स्वयं को,
झांक लेते हैं हम,
अपने ही दिल में,
बेख़ौफ़ ,
दुनिया की
नज़रों से बेफिक्र
चेतन पर हावी होता
अवचेतन, और
विचार श्रृंखला
बँधती जाती किसी
सधे हुए क्रम में,
साकार हो उठते शब्द
मन संतुष्टि पा जाता
इस मानसिक श्रम में !

–राजगोपाल सिंह वर्मा 

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