मैंने भी की थी कभी जिद,
चाँद को छूने की,
और झुलस गये थे,
हाथ मेरे,
उस तपन से,
तब, क्या पता था
कि आग सूरज से अधिक,
चाँद में कहीं ज्यादा है,
और,
दाग भले ही हो,
पर वह तो टीका है,
ताकि कोई निगाह,
ऐसी ना पड़ जाये,
कि चाँद पर क़यामत आ जाये,
कोई आशिक कहीं,
यकीनन,
अपनी महबूबा के,
क़दमों में न बिछा दे,
इस खूबसूरत चाँद को,
गर हुआ ऐसा,
तो कितने दिल टूटेंगे,
किस्से बनेंगे,
बिगड़ेंगे,
क्या जुड़ पायेंगे,
उन अहसासों के साथ,
बिताये थे जो पल बस,
तुम्हारी ही गवाही में,
ऐ चाँद,
हर चांदनी रात !

–राजगोपाल सिंह वर्मा 

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