इस आग-सी,
तपन में भी,
क्यूँ जिन्दा हैं,
वही अरमान,
पिघलते हिमशिखर,
और,
तूफानी बारिश,
या स्वच्छंद हवाओं के,
मौसम-में थे जैसे,
असमंजस गहरा है,
यद्यपि,
इस अनजाने
और स्नेहिल,
रिश्ते के,
प्रारब्ध से,
जिद भी है मेरी,
पर,
निभाने की,
अंजाम तक !

–राजगोपाल सिंह वर्मा

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