कभी मंद-मंद,
कभी तेज़,
और कभी मद्धिम
दिलकश हवायें,
बारिश की चंद बूँदें,
जो जज़्बा रखती हैं,
समुन्द्र में तूफ़ान सा,
और सौंधी मिटटी,
तैरते हुये अहसास उनमें,
एक रोमांच,
तुम्हारे अँगुलियों और,
पोरों के स्पर्श मात्र से,
सुहाना है न सब,
इस अमलतास और,
गुलमोहर के वृक्ष,
और उनकी छाया में,
गड़गड़ाहट,
विद्युत सी,
चिड़ियों का कलरव,
कोयल की कूक,
कभी-कभी,
मौसम होता है ऐसा,
थम क्यूँ नहीं जाता यह,
कम से कम तब तक,
जब तक तुम साथ हो मेरे !

–राजगोपाल सिंह वर्मा

Advertisements