ऊंघती रात में,
सपनों की बातें,
बेमानी हैं,
पर,
उनींदी आँखों के,
कुछ अलसाये से सपने,
अभी भी जिन्दा हैं,
बेफिक्री के साथ,
जो चाहते हैं जीना,
हसीं अहसास के साथ,
और खिलखिलाना,
मेरे साथ,
पर हैं अनजान वह भी,
कि हंसी का दर्द,
बहुत गहरा होता है,
और रात को,
उनींदेपन के पीछे,
जो फलसफा होता है,
उसे हर कोई,
नहीं समझ पाता,
सिर्फ दीवार घडी की,
टिक-टिक भंग करती है,
वह निस्तब्धता,
और नीरवता,
या दूर सड़क पर,
तेज़ टायरों की किरचती सी,
कुछ आवाजें,
भरे-पूरे परिवार के बीच,
एक अजीब से,
सन्नाटे के बीच,
सपने उनींदी आँखों के भी,
बस,
बहुत ही अपने से,
लगते हैं,
वह अलग बात है कि,
कुछ सपने जो मैं,
ओढ़ना चाहता हूँ,
और जिनका बिछौना,
बनाना है मुझे,
वह लगता है,
बहुत दूर हैं,
मुझसे अभी भी,
मेरी तमाम साधनाओं,
के भी बाद,
पर,
आस क्या मरती है कभी !

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