स्नेह की अभिलाषा,
है मेरे भीतर,
भटक रहा हूँ,
सच्चे प्यार को,
तभी तो,
दूर करना है मुझे,
उन कंटकों को,
अपने स्वयं के भीतर,
जो रोकते हैं,
नैसर्गिक और
निर्मल सोच को,
और मैं,
बन जाता हूँ गुलाम,
अपने दिमाग का,
छिटक जाता है,
दिल मेरा,
दूर कहीं,
नेपथ्य में.

किसी कल्पनालोक में,
कैसे पा सकूंगा,
प्रेम-भाव,
उस सीमित सोच में,
तौलते जिसको तुम,
अपने ही मापदंडों पर,
तोड़ देना है मुझे,
उन बाधाओं को,
जो विचलित करती रही,
झाँकने में,
प्यार की गहराईयां
और,
कभी नाप ही नहीं सके,
यह गहराई,
अँधेरा हो चाहे कितना गहन,
अदृश्य हो जाये सब कुछ,

फिर भी,
क्या आत्मा हुई कभी अदृश्य,
मन की आँखों,

और कुछ अपने से भावों से,
फिर हम,
क्यूँ न भरें उड़ान,
उन्मुक्त हो,
इस जिन्दगी से,

रेंगती-सी चल रही है जो,
और आत्मिक प्यार,

वह तो है ऐसा,
जैसे बहता हो कोई दरिया,
निर्बाध,
स्वयं के भीतर,
प्रेम सम्पूर्ण है,

प्रेम ही जीवन है,
हम हैं बस,
टुकड़े,
कुछ सुख,
कुछ दुःख,
कुछ भौतिकता के !

–राजगोपाल सिंह वर्मा 

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