आज लगातार तीन दिन हो चुके थे, अपनी आदत के विपरीत रामकिशोर को बिना किसी पूर्व सूचना के अनुपस्थित रहे हुये. पहले दिन जरूर उसकी पत्नी का फोन आया था कि वह वाइरल से पीड़ित हैं, और आज नहीं आ सकेंगे. अगले दिन मैंने अपने अर्दली से जानकारी लेने को कहा तो पता चला कि मोबाइल स्विच ऑफ है.  उसके बाद भी वह ऑफिस नहीं आया तो मुझे चिंता हुई. तब तक चौकीदार हारून जीवित था, और अकसर वह भी ड्राईवर की ड्यूटी करने को बेझिझक तैयार रहता था. वैसे भी ऑफिस के कर्मचारी ना तो रामकिशोर के घर कभी आना-जाना रखते थे, और ना ही वह किसी से ऐसे सम्बन्ध निर्वहन की अपेक्षा रखता था. बस, केवल हारुन ही था, जो उसका घर जानता था.

तो, दोपहर के बाद लगभग ४.३० बजे हारून को लेकर मैं रामकिशोर के घर की ओर रवाना हुआ. उसका घर ऑफिस के ठीक विपरीत दिशा में उत्तर में था जबकि कार्यालय आगरा जैसे व्यस्त नगर में दक्षिण के छोर पर स्थित था. संकरे रास्तों से पार करते हुए हम लोग अंततः खटीक मोहल्ले के उस छोर पर पहुँचने में सफल हो गये जो जयपुर की ओर जाने वाली रेलवे लाइन के समानांतर चलते हुए बीच-बीच में ऊबड़-खाबड़ तथा और भी संकरा  भी हो जाता था. रामकिशोर के घर के नजदीक गली में मुड़ने तक रास्ते की कूड़े की दुर्गन्ध नथुनों में अधिक प्रवाह से चढ़ने लगी थी. मन खराब सा हो रहा था, कोई दुर्बल मन का व्यक्ति होता तो अब तक इरादा बदल चुका होता, परन्तु मैं अपने निश्चय पर दृढ था. अब मंजिल भी नजदीक थी, इसलिये भी हिम्मत खोने का खतरा लेना मूर्खता होती.

ड्राईवर का कोई अपना नाम भी होता है, यह बहुत कम लोग जानते हैं, या जानना नहीं चाहते क्यूंकि वे स्वयं, उनके परिजन, बच्चे या मित्र भी उसे ड्राईवर के नाम से ही संबोधित करना अपना धर्म समझते हैं. इसके विपरीत, बचपन की एक घटना ने मेरे मन पर ऐसा प्रभाव डाला कि मैं अपने ड्राईवर के साथ-साथ किसी टैक्सी या अन्य दूसरे ड्राईवर के साथ कहीं यात्रा करने से पूर्व उसका नाम पूछना नहीं भूलता, और बाद में उसे उसी नाम से संबोधित करता हूँ. बात उन दिनों की है जब मैं अपने पिता के साथ उनके एक मित्र अधिकारी के घर गया था. उन्होंने जैसे ही अपने ड्राईवर को चलने के लिये आवाज लगाई तो वह गाडी की चाभी का गुच्छा उनकी मेज पर रखकर हाथ जोड़कर बोला, “सर, बहुत हुआ, अब हम नौकरी नहीं कर पायेंगे. आप हमें इन्सान नहीं कुछ और ही समझते हैं. जब हमारी पहचान ही नहीं बन पा रही, तो ऐसी नौकरी की रोटी कैसे हज़म करें. फिर हमारा नाम इतना बुरा भी नहीं”. चौबे जी की समझ में बात आ गई, और उसके बाद वह उस ड्राईवर को हमेशा विनोद के नाम से ही पुकारते पाये गये. दरअसल आपका नाम जो भी हो, वह नाम दूसरे किसे व्यक्ति के मुंह से जब लिया जाता है तो उस व्यक्ति के कानों में संगीत का सा काम करता है, ऐसा मेरा मानना है, और मेरी इस सोच के कई बार मुझे अद्भुत परिणाम मिले हैं.

जी,  रामकिशोर मेरा ड्राईवर था. वह मुझे सरकारी ओहदे के कारण मिला हुआ था, जिसकी अलिखित ड्यूटी में अघोषित समय तक मेरे साथ रहना, और आवश्यकतानुसार छुट्टियों तथा देर समय तक भी अपनी ड्यूटी को निभाना शामिल था, जिसके लिये उसे अलग से पारिश्रमिक भी मिलता था. गाडी की पार्किंग कार्यालय परिसर में होती थी, इसलिये या तो एक दिन पूर्व वह बताये समय पर मेरे घर की डोरबेल को अपनी चिर परिचित लम्बी घंटी के रूप में  पुश करता था, या ऑफिस में समय से पहुँच कर मेरी कॉल की प्रतीक्षा करता, और १० मिनट के भीतर घर के गेट पर खड़ा होता था. लोग बताते हैं कि वह १० बजे के समय से काफी पूर्व, आमतौर पर ८.३० बजे सुबह ही अपनी साइकिल से कार्यालय पहुँच जाता और एक घंटे तक मनोयोग से गाडी की सफाई करता. पता नहीं ऐसी सफाई की कुछ जरूरत भी होती है या बस यूँ ही. भरी सर्दियों और बारिश या आंधी-तूफ़ान में भी वह अपना रूटीन परिवर्तित करता हो, ऐसा मेरी जानकारी में नहीं था. वैसे रामकिशोर का घर कार्यालय से लगभग १२ किलोमीटर दूर था. यानि उसे कार्यालय आने और जाने में २४ किलोमीटर प्रतिदिन की साइकिलिंग तथा दो घंटे अतिरिक श्रम करना पड़ता था. शायद इसी कारण वह अपने रिटायरमेंट से मात्र दो वर्ष पूर्व तक भी अपनी काया को छरहरा बनाये रखने में सफल दिखता था.

मीटिंग्स तथा भ्रमण कार्यक्रमों में ले जाने के अलावा उसे बाकी का समय ऑफिस में ही गुजारना पड़ता था. वह दिन भर हाल में आराम से बैठा रहता. दोपहर में नियत समय पर गाडी से निकालकर अपना टिफिन लाता और एक कोने में बैठकर अकेले अपना खाना खा लेता. गाडी में टिफिन रखने का लाभ यह था कि वह आवश्यता पड़ने पर बाहर भी अपना भोजन समय से कर सकता था. इस बीच अगर कभी मुझे भी किसी जरूरी काम से कहीं जाना होता तो भी वह बेपरवाह बन कर उसी गति से भोजन करता, जिससे पहले से करता आ रहा था. हारकर, मैंने स्वयं आदत डाल ली थी कि वह आराम से भोजन कर निवृत हो जाये तभी चलने की बात सोची जा सकती थी, भले ही कोई इमरजेंसी क्यूँ न हो ! यदि किसी समारोह में, या शादी जैसे कार्यक्रमों में मुझे सरकारी गाडी से जाना पड़ता तो भी वह अपने टिफ़िन से ही भोजन करता, कई बार तो आयोजकों के बहुत अनुनय-विनय पर भी वह टस से मस नहीं हुआ, और मैंने उसे फिर भोजन के लिये पूछना भी छोड़ दिया. उसने इस नियम को कभी भी नहीं तोडा, हाँ, नगर से बाहर की बात अन्यथा थी, वहां इस आदत को वह छोड़ देता.

रामकिशोर दिन में भोजन के अलावा दो बार चाय जरूर पीता, पर वह चाय ऑफिस में कभी पीते नहीं देखा गया. उसका शौक था कि अपने किसी साथी चपरासी या अन्य कर्मचारी को चाय वाले की दुकान पर ले जाता जहाँ वे एक-एक कप चाय पीते और आपस में तथा अन्य ग्राहकों से दुनिया-जहाँ के मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखते. इसके लिये उसे कम से कम ४५ मिनट का समय देना जरूरी था. वह चाय पीने जब भी जाता धीरे से मेरे कक्ष का आधा दरवाजा खोलता, और पूछ कर जाता. अगर उसे कहा जाता कि आधे घंटे में आ जाना, चलना है कहीं, तो वह असमंजस में पड़ जाता, और बोलता कि ठीक है सर, बाद में पी लेंगे चाय, आप चलिये.

हाँ, एक बात और. वह सवेरे चींटियों को आटा और खाना खाने के बाद चिड़ियों को दाना, और रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े पूरे नियम से जरूर डालता. इसके लिये उसने ऑफिस की चारदीवारी की एक मुंडेर की जगह निर्धारित की हुई थी. वहां गर्मियों में पक्षियों के लिये बाजरा और मिटटी के बर्तन में पानी की व्यवस्था की भी उसने जिम्मेदारी खुद ही ओढ़ी हुई थी. आसपास मंडराने वाले कुत्तों को भी वह कुछ न कुछ प्यार से खाने का भी इंतज़ाम करता रहता. वह सब निरीह बनकर पूँछ हिलाते हुये उसके आसपास मंडराते दिख जाना आम बात थी.

इस सबके बावजूद, रामकिशोर के बारे में मशहूर था कि वह एक नंबर का कंजूस था. वह चाय की दुकान पर जाता जरूर था, लेकिन किसी न किसी का साथ लेने का मतलब चाय के पैसे उससे दिलवाना होता था. अगर कभी मजबूरी में चाय पीने के लिये कोई और पैसे न निकलता तो बस अपनी चाय के पैसे भरने तक ही उदारता रहती उसके मन में. लोग बताते थे कि उसका काफी पैसा ब्याज पर भी चलता है, और उसने दो गाड़ियाँ टैक्सी में भी चलवा रखी हैं, वगैरह, वगैरह. ऑफिस के सब कर्मचारियों के बारे में सब एक दूसरे को जानते थे कि कौन किस किस्म के नशे के चंगुल में हैं, परन्तु मैं तो आज तक नहीं जान पाया कि रामकिशोर कौन सा नशा करता था. गाडी चलने में वह पूरा अलर्ट रहता, नशे में तो मैंने उसे कभी नहीं देखा. शहर से बाहर या यूँ कहें कि अनजान रास्तों पर उसका आत्मविश्वास जवाब दे जाता, विशेष रूप से जब भी दिल्ली या नॉयडा जाना होता. “अब किधर, अब किधर”, “साहब बाएं या दायें”, “जी, किधर”, बस ये ही उसके शब्द होते. कई बार झुन्झुलाहट भी होती, मैंने एक दो बार बोला भी कि भई, ड्राईवर कौन है, आप या मैं, पर मैं धीरे-धीरे समझ गया, और मैं अब  समय पड़ने पर उसका जीपीएस ट्रैकर का रोल करने में बुरा नहीं मानता था.

अभिवादन के अलावा पिछले लगभग पांच साल में उसका-मेरा कोई संवाद हुआ हो, ऐसा मुझे स्मरण नहीं पड़ता. हाँ, उसको आब्ज़र्व करते हुये ही मेरे पास इतने किस्से इकट्ठे हो गये थे कि उस पर एक पूरा उपन्यास लिखा जा सकता था. उसकी एक आदत मुझे बहुत पसंद थी, इशारों को समझकर काम को अंजाम देना. अगर चलती गाडी में मेरी कोई महत्वपूर्ण कॉल आ जाती तो वह हल्की सी तिरछी निगाहों से मुझे देखता और सड़क के किनारे गाडी लगाकर, गाडी से कुछ दूर इस प्रकार खड़ा हो जाता कि वार्तालाप का कोई अंश उसके कानों में न पड़ जाये. मैंने उसे न तो कभी अपने बारे में कुछ कहते सुना और न ही किसी की शिकायत करते.

एक और किस्सा. मेरे निर्देश थे कि यदि मैं अन्यथा न बताऊँ तो उसे सवेरे ठीक १० बजे गाडी लेकर घर पर उपस्थित हो जाना है. अगर मुझे कोई परिवर्तन करना होता तो मैं या तो उसे एक दिन पूर्व ही बता देता या फोन पर निर्देश दे देता. भीषण ठण्ड का समय था वह. मेरा मन बहुत आलस्य से भरा था. कोई विशेष काम भी नहीं था ऑफिस में. मैंने पत्नी को सुबह ही बता दिया था कि आज मैं बस अपनी नींद पूरी करूंगा, न ऑफिस जाना और न कुछ और. मुझे याद ही नहीं रहा कि अगर रामकिशोर को मना नहीं किया तो वह अपने समय पर हाज़िर हो जाएगा. खैर, मैंने रजाई तानकर सोने की अपनी इच्छा को मन भर पूरा किया. बारह बजे के आसपास उठकर स्नान कर, ब्रेकफास्ट किया, और फिर बिस्तर में घुस गया. मोबाइल मैंने अपना स्विच ऑफ कर लिया था. जानता था कि यदि कोई बहुत ही जरूरी काम होगा तो सरकारी लैंडलाइन पर कॉल आ ही जायेगी. लगभग चार बजे फिर से कुछ भूख लगी तो उठ बैठा और कुछ हल्का भोजन लेकर मैं लॉन में टहलने आ गया. सरकारी मकान काफी बड़ा था. लगभग छः हज़ार वर्ग फुट का तो लॉन ही होगा, उसके बाद फिर खुला एरिया और चारदीवारी के बाद प्राइवेट रोड़ जो महात्मागांधी मार्ग की मुख्य सड़क पर खुलता था. अचानक मुझे घर के बाहर चारदीवारी के पार अपनी सरकारी गाड़ी खड़ी होने का आभास हुआ. मैंने गौर से देखा, हाँ, यह तो सरकारी टाटा स्पेसियो थी. मैंने कौतुहलवश नजदीक आकर देखा तो रामकिशोर बाहर एक छोटे से चबूतरे पर बैठा हुआ ऊंघ रहा था. मैंने नजदीक जाकर पूछा, “तुम कब आये यहाँ”, वह हडबडाकर खड़ा हो गया, और बोला, “जी, सुबह १० बजे”.

…उफ़, मुझे बहुत ग्लानि हुई. यह सही था कि मुझे याद ही नहीं रहा उसको मना करना, न ही कोई फोन किया; और वह हमेशा की तरह अपने समय पर आ बैठा. यही नहीं, वह पिछले छह घंटों से कडकती ठण्ड में बाहर बैठा अपनी ड्यूटी निभा रहा है, और मैं नींद की विलासिता में डूबा हुआ, अपने पद के दुरुपयोग में संलिप्त हूँ. मैंने उससे अपने अक्षम्य-से अपराध के लिये क्षमा मांगी और उसे मुक्त किया. उसने केवल एक मुस्कान में मुझे प्रतिउत्तर दिया, और अभिवादन कर वापिस चला गया. पर, मेरी ग्लानि ने काफी समय तक मुझे बहुत कष्ट दिया.

अगर रामकिशोर का हुलिया आपको बताया जाये तो मेरे सहित कुछ लोगों की राय थी कि वह अपने समय में तमिलनाडु के कुख्यात दस्यु सम्राट वीरप्पन का मिनी रूप लगता था, खास तौर से अपनी विशिष्ट घनी व् घुमावदार मूंछों के कारण, जो हालाँकि मेरी राय में उसके अपेक्षाकृत कमजोर हड्डियों के ढांचे वाले शरीर पर जंचने के बजाय उसे कार्टून का रूप अधिक प्रदान करती थी, पर कुछ लोग बिना किसी परवाह के अपना लुक बनाये रखने में ही शान समझते हैं—वह उनमे से ही एक था. जब हँसता तो उसके आगे के सिर्फ दो ही दांत दिखाई पड़ते, जो उसकी हंसी को विद्रूपता में बदल देते. उसके साथी कहते कि साहब यह जो पक्षियों और कुत्तों को रोटी के टुकड़े डालता है, उसका कारण रोटी के कड़े किनारों का उसके जबड़ों से न चबाया जाना है, न कि उसका प्रेम भाव.

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…पिछले लगभग पांच सालों की इन यादों के बीच पता ही नहीं चला कि कब रामकिशोर का घर आ गया. गली का अंतिम मकान, जहाँ उसका किनारा अस्थाई दीवार, जो बीच से जगह-जगह से टूटी थी और टीन की एक चादर के टुकड़े से ढंका था, उसकी बाउंड्री का ऐलान कर रहा था. टूटी, अधूरी कुण्डी को थपथपाने से पहले ही, कौतूहलवश गाडी की आवाज को सुनकर, एक अपेक्षाकृत हष्ट-पुष्ट महिला ने आधा दरवाजा खोल कर झाँका ही था, कि वह और हारून एक दूसरे को पहचान गये. मैं तब तक दूर ही था कि हारून ने इशारे से मेरे आने की सूचना सार्वजनिक कर दी थी. वह एक कमरेनुमा आधे-अधूरे से मकान में घुस कर तेज़ी से एक कुर्सी उठा लाई और उसे एक कपडे से झाड़ने का उपक्रम करने लगी. कुर्सी लोहे की थी, और उसके हत्थों व अन्य जगहों पर जंग के पुराने निशान दृष्टिगत हो रहे थे, जिन्हें संभवतः कभी दूर करने का प्रयास नहीं किया गया था.

पत्नी ने रामकिशोर को हमारे आने की सूचना दे दी थी…पर उसे आने में थोडा समय लग रहा था. वह एक स्टील के गिलास में मुझे पानी भी दे गई थी. हारून काफी दूरी पर खड़ा था. पत्नी ने बताया कि आज उसका बुखार कुछ कम हुआ है. शायद, परसों तक कमजोरी भी दूर हो जाए, ऐसा डॉक्टर का कहना है. मैंने रामकिशोर के आने की प्रतीक्षा करने से पहले उसकी पत्नी से ही जानना चाहा कि उसका मोबाइल क्यूँ स्विच ऑफ है, जिस पर पत्नी ने बताया कि बेटे का मोबाइल कुछ खराब हो गया था, तो टेम्पररी तौर पर उसने अपने पापा के मोबाइल में अपना सिम डाल रखा है, जिससे वह स्विच ऑफ बताता है. मुझे थोडा अटपटा भी लगा यह तर्क पर मैंने मान लिया. अभी भी रामकिशोर बाहर नहीं आ पाया था. मना करने के बावजूद उसकी पत्नी चाय बनाने चली गई थी.

जिस जगह मैं बैठा था, वह वरांडा कहा जा सकता है. चूँकि कमरा एक ही प्रतीत हो रहा था, इसलिये उस वरांडे को ही ड्राइंग रूम के तौर पर प्रयुक्त किया जा रहा था. वह हालाँकि अपेक्षाकृत बड़ा एरिया था, जिसके एक भाग से बाहर का दृश्य व खुली जगह साफ़ दिखाई पड़ती थी. मैं देख पा रहा था कि उस कक्ष के बाहर दो कुत्ते बैठे थे, एक बिल्ली कई बार हमारे नज़दीक से आकर गुजरी, जिससे लगता था कि वह पालतू है. दरवाजे के बाहर दो मिट्टी के बर्तनों में पक्षियों का दाना और पानी रखा हुआ था. अभी दो तोते बेख़ौफ़ पानी पीने के बाद उसमें किलोल कर रहे थे.

तब तक रामकिशोर बाहर आ गया. दूर से ही उसने अपने हाथ जोड़ लिये थे, और मैंने भी उसी तरह उसका अभिवादन लगातार तेज़ बुखार से उसका शरीर क्षीण पद गया दिखता था. वह एक छड़ी के सहारे धीमे-धीमे पास आया और नज़दीक पड़ी चारपाई पर बैठ गया. उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और चेहरा पीला पड़ गया था. मैंने जानकारी लेनी आरम्भ की थी कि घर के बाहर बैठे दोनों कुत्ते कुछ आभास सा पाकर धीरे-धीरे उसके पास आ गये और पैरों में लगभग लोटपोट हो गये, वह उन्हें सहलाता जा रहा था और अपने इलाज़ का अपडेट भी मुझे देता जा रहा था. उधर, आसपास घूम रही बिल्ली भी अब बेखौफ रामकिशोर की गोदी में जा बैठी थी, मानो उसे कुत्तों पर प्यार प्रदर्शित करने पर अपना रोष प्रकट करना हो. बिल्ली की म्याऊं-म्याऊ तथा कुत्तों की कूं-कूं के साथ प्यार भरी हलकी भौं-भौं से वातावरण में काफी ममत्व आ गया था. इस बीच उसका एकमात्र बेटा जो इंटरमीडिएट की पढाई कर रहा था, भी आ गया था, परन्तु उसने अभिवादन के नाम पर अपनी गर्दन हल्के से झुकाने के अलावा रुकने का भी प्रयास नहीं किया और सीधे कमरे में चला गया.

बुलाये जाने पर बेटा फिर से पास आया और न जाने क्या सोचकर उसने मेरे पैर छुए. अमित था उसका नाम. पूछे जाने पर उसने बताया कि वह पिछले साल अच्छी तैयारी न होने के कारण अपना एग्जाम नहीं दे पाया था. इस बार अच्छी से तैयारी के बाद फिर से एग्जाम देना है. उसके टाइट कपड़ों, फ़िल्मी हेयर स्टाइल और उसके आने से वातावरण में महक रहे परफ्यूम की सुगंध उसके पढाई के स्तर की चुगली कर रहे थे. बेटे से हुई संक्षिप्त वार्तालाप के दौरान रामकिशोर नीची निगाहें किये शांत बैठा रहा. इस बीच मैंने गौर किया कि एक विचित्र घटना घटी. अभी तक रामकिशोर के पैरों में लोटपोट कर रहे कुत्ते, गोदी में मचल रही बिल्ली और बाहर पानी पीते हुये तोते— सब धीरे-धीरे गायब हो गए, ऐसे, जैसे कहते हैं ना कि गधे के सर से सींग !

मैंने इस बीच चाय की घूंट खत्म कर ली थी. हारुन भी तैयार खड़ा था. रामकिशोर को अच्छे स्वास्थ की कामना के साथ उससे विदा ली, लेकिन वह बाहर मुझे गाड़ी में बिठाये बिना नहीं जाने वाला था, सो साथ चलने लगा. गेट से सटी खडी नई रॉयल-इनफील्ड क्लासिक मोटरसाइकिल के ५०० सी सी के डस्ट स्टॉर्म रंग के सबसे महंगे वर्ज़न से मेरी आँखें एकबारगी चुंधिया-सी गई. जब मैं आया तो यह बाइक कवर से ढक कर खड़ी थी, इसलिये उसकी भव्यता पर ध्यान नहीं गया. कभी मैंने भी इरादा किया था उसे लेने का पर या तो पूरे पैसे नहीं जुटा पाया, या फिर कंपनी के न्यूनतम छह माह के वेटिंग पीरियड के कारण मेरी किस्मत में वह नहीं हो पाई.

…अमित उस साफ़ मोटर साइकिल को भी शीशे की तरह चमकाने की अपनी कोशिशों में जुटा था. उसने अपने काम में जुटे हुए ही मुझे एक मुस्कुराहट युक्त अभिवादन किया !  …दोनों कुत्ते निरीह सा बन दूर से ही टकटकी लगाकर देख रहे थे, बिल्ली भी आस-पास नहीं दिख रही थी, हाँ कुछेक चिड़ियाएँ जरूर पानी के पात्र के आस-पास फुदक रही थी. गाडी में बैठने के बाद मैंने देखा कि अमित कुत्तों को कंकड़ के टुकड़े फेंक कर भगा रहा था. एक मोटा टुकड़ा उनमें से छोटे कुत्ते पर लगा और वह बिलबिलाकर भाग खड़ा हुआ. रामकिशोर ने एक बार बेटे अमित को घूरा और फिर प्यार से उस कुत्ते की और नजर डाली जो धीरे-धीरे आँखों से ओझिल हो गया था..

….और गाडी उस गली से काफी दूर निकल आई.

 

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–राजगोपाल सिंह वर्मा 

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