मैं सुनिधि को अधिक नहीं जानता. वह सुरभि से मेरी आखिरी मुलाकात के समय लगभग आठ साल की रही होगी. हाँ, उसकी माँ सुरभि को सालों से जानता था. आज सुनिधि का नाम जब अन्तरराष्ट्रीय लघु फिल्म समारोह में उसकी फिल्म को पुरस्कृत किये जाने के समाचार में पढ़ा तो सुरभि की याद में आँखें छलछला आईं.

…हम लोग दिल्ली की कालिंदी  विहार कॉलोनी में रहते थे. ऑफिस हमारा कोई नज़दीक नहीं था, मेरा जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के डाउन कैंपस यानि मुनीरका से सटा हुआ, और उसका उससे भी दूर, इंस्टीट्यूटशनल एरिया में क़ुतुब होटल के भी उस पार, लगभग २२ किलोमीटर दूर. मेट्रो ट्रेन की तो दिल्ली में उन दिनों कल्पना भी नहीं हुई थी. हमारी मुलाकात डी टी सी की जिस बस में होती थी, उसका नाम था पी-३२. यह ऑफिस जाने वाले लोगों के लिये चलाई जाने वाली पॉइंट-टू-पॉइंट बस सर्विस थी जो हम जैसे लोगों के लिये बेहद सुगम थी.

बहुत बिंदास थी वह. उसके चेहरे पर दिखते आत्मविश्वास से कई बार डर भी लगता था. जितनी बिंदास थी, उतनी टची भी. धीरे-धीरे पता चला कि वह जिस सरकारी ऑफिस में काम करती है, वहां उसकी भी जॉब रेस्पोंसिबिलिटी मेरे जैसी ही थी. स्वाभाविक था उसे और जानने की इच्छा होना. पर, दिन यूँ ही बीतते गए और सवेरे ८.४०, और शाम ५.५० की पी-३२ से यूँ ही आना-जाना लगा रहा– सप्ताह में पांच  दिन. एक दिन मेरे सहयोगी एक अधिकारी दयानंद परमार जी को उसके नज़दीक की सीट पर बैठने का मौका मिला. मैंने दूर से ही देखा कि परमार जी ने अपनी जेब से पढने का चश्मा निकाल कर अपनी आँखों पर लगाया, फिर उन्होंने आभा जिस किताब को पढ़ रही थी, उसमें झाँकने का प्रयास किया, या यूँ कहें उन्होंने भी उस किताब को पढने में रूचि लेनी आरम्भ की.

किताब वह झाँक रहे थे, धडकनें मेरी बढ़ रही थी. मैं असहज हो रहा था. दरअसल सुरभि को लेकर हम लोग अक्सर चर्चा करते थे, और मैंने ही अपने स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर परमार जी को बताया था कि वह भी सम्पादन के क्षेत्र से जुडी है. अब मैंने देखा, कि परमार जी ने चश्मा उतारकर वापिस कवर में रखकर जेब के हवाले कर दिया. परमार जी ने सुरभि से संवाद आरम्भ कर दिया था. मैं असहज था, और परमार जी पूरी तरह सहज. उनके लिये सहज होने का कारण उनके पूरे सफ़ेद बाल, झुर्रियां और उम्र का आखिरी पड़ाव होना था. और मैं? मैंने तो अभी नौकरी शुरू ही की थी—लगभग २४ वर्ष, यही आयु रही होगी मेरी, प्रोबेशन पीरियड था अभी मेरा. सुरभि मुझसे आयु में लगभग दो-चार साल बड़ी रही होगी.

खुशमिजाज़ अधिकारी थे परमार जी. वह मेरे ही साथ टेक्निकल ऑफिसर थे, और इंडियन स्टैण्डर्ड इंस्टिट्यूट की नौकरी छोड़कर लगभग छह महीने पूर्व ही आये थे. परमार जी का स्टॉप मेरे स्टॉप से एक स्टॉप पूर्व ही पड़ता था. सो, वह पहले ही उतर गये. इस बीच में मैं उन्हें कनखियों से सुरभि से काफी विस्तार में बात करते बार-बार देखने का मोह संवरण नहीं कर पाता था. एक बार तो उन्होंने सुरभि को मेरी और इंगित कर कुछ बताया, और उसने गर्दन घुमा कर दूर बैठे मुझे देखा तो, लगा कि मेरे प्राण सूख गए हों, मैंने ऐसा करते हुए देख लिया था, सो मेरी निगाह खुद ही खिड़की की ओर घूम गई थी. मैं असहज तो था ही, अब विचलित भी हो गया था, और परमार जी पर झुंझलाहट हो रही थी. मेरी धड़कनें कानों तक पहुँच रही थी. पर, कुछ विशेष चिंता की बात नहीं लगी, क्यूंकि विदा लेते समय परमार जी को सुरभि ने बहुत सहज ढंग से विदा किया था.

मुझे ठीक से याद नहीं कि इस घटना के कितने दिन बाद सुरभि ने एक बार लौटते समय एक सौम्य मुस्कान के साथ अभिवादन कर, पी-३२ बस में मुझे आग्रहपूर्वक अपने निकट की सीट पर बिठाया था. हाँ, इससे पहले परमार जी मुझे उस दिन की घटनाक्रम का विवरण अवश्य दे चुके थे. उन्होंने मेरे विषय में, मेरे लेखन, और साहित्यिक संबंधों के बारे में वह जो भी जानते थे, उसका बखूबी मक्खन के साथ सुरभि के सामने प्रस्तुतिकरण कर दिया था. इस संक्षिप्त सी पहली मुलाकात में सुरभि ने कुछ विषयों पर हमारी लाइब्रेरी में पुस्तकों की उपलब्धता पर कुछ जानकारी ली, और कुछ मेरी पृष्ठभूमि की. तब तक हमारा स्टॉप भी आ गया था. उसके फ्लैट तथा मेरे फ्लैट की दूरी लगभग आधा किलोमीटर होगी. वह सेक्टर तीन में रहती थी, और मैं सेक्टर चार में. हमने एक दूसरे से विदा ली. उसके बाद भी कभी-कभी हम लोगों में अभिवादन तथा छोटी-मोती बातों की रस्म अदायगी हो जाती थी.

एक दिन देर शाम लगभग ७.४५ बजे, घर की डोर बैल बजी. देखा तो, सुरभि सामने थी. तीसरी मंजिल का फ्लैट और लगभग हांफती हुई आभा, बोली, “चलिए, घर चलिए, चाय गैस पर चढ़ा कर आई हूँ, मुझे लगा कि आपका घर बिल्कुल पास ही होगा, अनन्त भी आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं”. पत्नी से यह पहली मुलाकात थी उसकी. हमने उसे आश्वस्त किया कि अभी आते हैं आधे घंटे में, तब जाकर वह वापिस लौटी, उसी तरह.  रुकना उसे था नहीं, सो नहीं रुकी. जल्दी इतनी थी कि पानी भी नहीं पिया उसने.

आप सोच रहे होंगे कि मेरा यह कैसा आकर्षण था सुरभि में?  कैसी दिखती होगी वह?  तो सुनिये– सुरभि एक साधारण शरीर की, कुछ ओवरवेट, स्वयं अपने और ज़माने से बेपरवाह सी लड़की थी, जो न तो अपने कपड़ों पर ध्यान देती थी, न अपने लुक या ज्वेलरी पर ! उसका आईसाईट  के चश्मे का फ्रेम भी उसी की तरह बहुत साधारण था. कभी-कभी वह खादी का कुरता और सलवार भी पहन आती थी, पैरों में चप्पल और कंधे पर लटकता था एक थैला. थैले में और तो पता नहीं, पर कुछेक अच्छी किताबें और उसकी डायरी जरूर होती थी. इस साधारण लुक के बावजूद एक बात अवश्य थी जो मुझे हमेशा उसकी ओर आकर्षित करती थी— उसका भरपूर आत्म विश्वास, और बाद में जब मैंने उसे जाना, तब मैं उसके दृष्टिकोण और विचारों की तार्किक दृढ़ता से भी प्रभावित हुआ. वह बॉटनी में परास्नातक थी पर उसे प्राचीन व मुगलकालीन भारतीय इतिहास रोमांचित करता था. उसे जितनी रूचि इस विषय में थी उतनी इतिहास में अपनी परास्नातक की शिक्षा के बावजूद मुझे शायद न रही हो. वह हिंदी और अंग्रेजी भाषा की  जानी मानी लेखिका थी– उसकी कई कहानियां चर्चित रहीं जो उस समय धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान और हंस सरीखी पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित होती रहती थी. उसने दूरदर्शन के कई प्रमुख कार्यक्रमों की स्क्रिप्ट भी लिखी और सामाजिक मुद्दों को भी उठाने का साहस दिखाया. निजी चैनल का जमाना तब तक अजन्मा था.

खैर, मैं सुरभि के आग्रह पर पत्नी के साथ उसके घर पहुंचा जहाँ उसके पति अनन्त भी हमारी ही प्रतीक्षा कर रहे थे. उनके कोई बच्चा नहीं था तब. तमाम औपचारिक बातों और परिचय के बाद उसने मेरी पत्नी से कहा, “जानती हैं आप, वर्मा जी का रिश्ता लेकर आये थे परमार जी, मेरे पास!”, मैं सकपका गया था, परन्तु उसने अपने पति और मेरी पत्नी के सामने बताना जारी रखा, “परमार जी ने मुझे इनके बारे में ऐसे बताया जैसे कोई व्यक्ति किसी लड़की को लड़के के गुणों के बारे में बताता है…”, और यह कहकर उसकी जोरदार, उन्मुक्त खिलखिलाहट वातावरण में फ़ैल गई. अब सब सामान्य हो गया था. हम सब एक दूसरे से काफी घुल-मिल गए थे और समय-समय पर एक दूसरे के घर या बाहर मुलाकातें होती होती रहती थी.

समय बीतता गया, सुरभि  की जिन्दगी के पन्ने खुलते गए. अब अमिय से भी मुलाकातें होती थी जो सुरभि  के पति का मित्र था, और लखनऊ से दिल्ली आकर किसी बड़े समूह के साथ खोजी पत्रकारिता में जुडा था. वह भी सुरभि के घर पर रुका था. यूँ तो सामान्य तौर पर सब कुछ अच्छा दिखता था पर एक दिन पता चला कि सुरभि ने अपना घर छोड़ दिया है. पता नहीं यह उसकी जिन्दगी के प्रति उदासीनता थी या फिर उसके इरादों की मजबूती– जब तक उसने स्वयं नहीं बताया, मैं कभी सुरभि और अनन्त के संबंधों की वितृष्णा महसूस नहीं कर पाया. गंभीर बातों को भी मजाक में उडा देने की प्रवृति जो थी उसकी. बाद में जरूर उसने मुझे बताया था कि किस प्रकार एक-एक दिन उसके सब सपने मर रहे थे. वह जीना चाहती थी अपनी एक विस्तृत, मायावी और परीलोक की सी जिन्दगी में, पर अनन्त चाहता था कि वह नौकरी करे और वहां से लौटकर चूल्हा-चौका संभाले. जैसे-तैसे लगभग पांच साल तक उसने जी भी यह जिन्दगी. और अनन्त? वह पत्रकार था और स्वयं न जाने कितनी नौकरी बदलता था. टिकना उसकी फितरत में नहीं था– और नौकरी छोड़ने के लिये उसके पास प्रबंधतंत्र के विरुद्ध  कोई न कोई सैद्धांतिक मतभेद का बहाना जरूर हाज़िर रहता. साथ में, वह जब भी बिहार के अपने पैत्रक घर से अपनी मां को बुला लेता तो बच्चा न जन्मने के खोट से उपजी कुंठा और उसके रूखे व्यवहार से जो अवसाद मिलता उससे व्यथित हो वह अक्सर लम्बे समय तक ऐसी हो जाती  जैसे नदी के किसी  बंजर किनारे पर पड़े रेत के ढेर जैसी ही उसकी भी नियति हो, सिर्फ भावनाशून्य !

अब, वह नयी दिल्ली के ग्रीनपार्क इलाके में एक वर्किंग वीमेन हॉस्टल में शिफ्ट हो गई थी. उसने एक बार मुझे वहां फोन कर बुलाया भी. वहां की जिन्दगी भी उसके जीवन में रंग नहीं भर पा रही थी. दरअसल, वह उसकी जिन्दगी का ठौर नहीं था, वह उसका संक्रमण काल था. तब उसने अपनी जिन्दगी के वह पन्ने भी मेरे साथ साझा किये जिनसे मैं अनजान था. सुरभि पश्चिम उत्तर प्रदेश के हाथरस जनपद के एक अनजान से कस्बे में पली-बढ़ी थी, जबकि उसका पति बिहार के चंपारण जिले के किसी जमींदार का बेटा था जो वैसे तो एक पत्रकार था, पर मूलरूप से विद्रोही स्वभाव का था. मैट्रिमोनियल विज्ञापन के माध्यम से उनकी शादी तय हुई थी, पर उनके विचार और जिन्दगी में ठहराव सात साल के दाम्पत्य जीवन में शायद कभी नहीं हो पाया. बीच में उससे मिलना जुलना नहीं हो पाता था. उन दिनों मोबाइल फोन नहीं थे, और लैंडलाइन तब एक स्टेटस सिंबल मात्र था, जो हम दोनों के पास नहीं था, इसलिए बातें कम ही हो पाती थी. फिर, वह अपनी भागदौड़ और प्राथमिकताओं की जटिलताओं में अकसर ऑफिस भी मिस कर देती थी, जहाँ जाकर कभी-कभार उसके पास बैठ कर बातें करना हो जाया करता था.

एक दिन हर बार की ही तरह अचानक स्वयं ही हाज़िर हुई सुरभि, उसी खिलखिलाती बेबाक हंसी के साथ. उसने बताया कि वह अनन्त  से अलग हो रही है. मेरे और वैदेही के चेहरे के उड़ते रंग को भांप कर वह आगे बोली–“अलग तो बरसों से थे ही, बस अब अलग-अलग छत के नीचे रहेंगे”. वह शायद कुछ और भी कहना चाहती थी पर जल्दी से चाय का अंतिम घूँट लेकर पुनः आने का आश्वासन दे उठ खड़ी हुई. मैं और वैदेही अभी भी असमंजस में ही थे. वह दरवाजे तक पहंच चुकी थी जब वैदेही ने कहा—“सुरभि ! कोई भी मदद चाहिए हो तो बताना !”, वह बस मुस्कुराते हुये सीढियां उतरती चली गई.

बाद में पता चला की सुरभि और अमिय साथ रहने लगे हैं. उन्होंने कालिंदी विहार के ही सेक्टर-४ के निकट ही एक फ्लैट खरीद लिया था. उसके गृह प्रवेश के समय उन्होंने अपने सभी मित्रों को आमंत्रित किया था. सुरभि के सरल व्यवहार और लेखन की दुनिया में नाम के कारण यूं भी उसके मित्रों की सूची लंबी थी. टी वी तथा पत्रकारिता की दुनिया की कई चर्चित हस्तियों से भी आभा ने मेरा वहां परिचय कराया.

सुरभि की दुनिया में बदलाव अब साफ दिखने लगा था. यह सुरभि मेरे लिए कई मायने में नई थी. उसे देखकर यकीन किया जा सकता था कि सच्चा प्रेम निश्चय ही स्त्री को सहज सौंदर्य प्रदान कर देता है. सुरभि के चेहरे की दमक उसके प्रभामंडल की कहानी स्वयं बयां कर रही थी. अनन्त की निरन्तर उपेक्षा तथा उसकी अपनी अन्मस्यक जटिलताओं ने जहाँ सुरभि जैसी आत्मविश्वासी लड़की को अपने परिधान और लुक तक के लिए उदासीन बना दिया था वहीं अमिय के उसमें विश्वास तथा नैसर्गिक सहयोग ने उसकी जिन्दगी को यकीनन नये आयाम दिये थे. लगता था कि उसे ऊँची उडान के लिए पंख मिल गये हों ! मेहमानों से फुरसत मिलते ही वह मेरे  सामने आ खड़ी हुई, “बताओ कैसी लग रही हूं?“ मैं उसके बदले हुये स्वरूप को यूँ ही निहार रहा था और उसके अचानक प्रश्न से मुझे लगा जैसे मेरी चोरी पकड़ी गई. मेरे जवाब का इन्तज़ार किये बगैर ही वह मेरी बांह पकड़कर बोली – “अरे, लेंस लगाये हूँ. पुरानी यादों के साथ वह पुराना चश्मा भी दफन कर दिया जिससे सब स्याह ही दिखता था”, और फिर वही खिलखिलाहट भरी उन्मुक्त हंसी का झोंका !

अब सुरभि को नवीनतम परिधानों, ज्वेलरी तथा घर की साज सज्जा में भी बहुत आनंद मिलने लगा था. वह समय-समय पर हम लोगों को घर पर भोजन के लिये आमंत्रित करती और मन से अच्छी-अच्छी डिश बनाकर सर्व करती, घर के  इंटीरियर के बारे में सलाह भी लेती. अमिय और वह दोनों बहुत प्रसन्न थे. उन्हें सुनिधि के रूप में जब बेटी की प्राप्ति हुई तो दोनों ने बहुत शानदार पार्टी दी. उसने निकट ही एक और फ्लैट लेकर उसे फिल्म स्टूडियो में बदल दिया था और दोनों मिलकर बेहतरीन डाक्यूमेंट्री, सीरियल्स, लघु फिल्म्स तथा एड फिल्म्स बनाने लगे. सामजिक मुद्दों पर जागरूक करती लघु फिल्मों से समाज को झकझोरना उसका सपना था. पर, गंभीरता के साथ ही परिहास की उसकी आदत बदस्तूर जारी थी. एक बार उसने मेरे घर फोन किया. बेटी ने फोन उठाकर जानना चाहा तो उसका जवाब था, “बेटा, मैं तुम्हारे पापा की गर्लफ्रेंड बोल रही हूँ, बात कराओ उनसे!”.

बेटी को कुछ समझ नही आया. उसे असमंजस में रिसीवर हाथ में लिए खडा देख मैंने पूछा – “कौन है?”

वह बोली—“आपकी गर्लफ्रैंड”.

वैदेही  ने कहा– “सुरभि के अलावा और कोई हो ही नही सकती”.

…इस बीच मेरा चयन लखनऊ में हो गया था. मेरा कोई ख़ास परिचय नहीं था वहां. अमिय के पापा तब लखनऊ में पुलिस विभाग के जाँच प्रकोष्ठ में वरिष्ठ अधिकारी थे, जिन्हें वहां पुलिस लाइन में सरकारी आवास मिला हुआ था. पुलिस के दंद-फंद से दूर सात्विक प्रवृति थी उनकी. सुरभि  ने अपना भी प्रोग्राम बनाया और रिजर्वेशन कराया लखनऊ के लिये. मैं और वह लखनऊ मेल से दिल्ली के लिये रवाना हुये. सुनिधि लगभग दो साल की रही होगी. टिकट दो थे, और रिजर्वेशन केवल एक सीट का कन्फर्म हुआ था. मैंने सुरभि  को सीट दे दी. वह सुनिधि  को लेकर निचली सीट पर सोने के लिए तैयारी के साथ लेट गई. मैं कभी इधर बैठता, कभी उधर. अन्ततः मध्यरात्रि के आसपास टिकट चेकर ने टिकट चेक किये और सुझाव दिया कि कोई सीट खाली नहीं है, क्यूँ न आप दोनों इसी सीट पर एडजस्ट हो जायें…! सुरभि ने मेरी तरफ देखा, और मैंने सुरभि  की तरफ…फिर सुरभि उसी स्फूर्त हंसी के साथ खिलखिला पड़ी जो उसका ट्रेडमार्क थी. टी टी महोदय अपने कंधे उचककर आगे निकल लिये थे.

सुरभि  के साथ बिताए वह दिन मेरी स्मृति में जस के तस कैद हैं. न केवल उसने मुझे लखनऊ की प्रमुख जगह दिखाई वरन दो दिन में ही कई लोगों से मेरी मुलाकात भी कराई. ऐसे लोग जो आज भी मेरी जीवन यात्रा में मेरे लिए संबल बने हैं.  मैं लगभग दो सप्ताह सुरभि  की ससुराल में रहा. उनके श्वसुर बेहतरीन इंसान थे और सास बहुत ममत्वपूर्ण. बिलकुल घर की तरह बीत गए वह दिन मेरे. बाद में भी, उनके रिटायरमेंट तक, उनसे मिलना-जुलना लगातार बना रहा और उनका वही स्नेह भी लगातार मुझे मिलता रहा.

मैं जब भी दिल्ली जाता सुरभि  से मुलाकात जरूर होती. वह अपनी व्यस्तता के बावजूद मेरे लिये समय निकालती और हम सब मिलकर कुछ अदद मिली-जुली यादों में उलझ जाते. सुनिधि ने सुरभि को अपना प्यार और ममता उड़ेलने का एक और जरिया प्रदान कर दिया था. वह अपनी व्यस्तताओं के बावजूद सुनिधि के बचपन को भी पूरी शिद्दत के साथ जी रही थी. सुरभि  ने अपनी सरकारी नौकरी को अलविदा कह दिया था. या, बकौल सुरभि, उसने एक दिन यूँ ही ऑफिस जाना बंद कर दिया, न कोई इस्तीफ़ा, न कोई हिसाब किसी तनख्वाह या फण्ड का. बस, छोड़ दी नौकरी !

आज, फिर से, यह सब यादें मेरी आँखों के सामने तैर रही हैं. लेकिन अंतर यह है कि आज मेरा मन अन्दर से रुदन कर रहा है. अंतिम बार गौतम बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली सारनाथ पर पर्यटन विभाग के लिये निर्मित्त लघु फिल्म उसने मुझे बहुत मन से दिखा कर उसके निर्माण की बारीकियों के सम्बन्ध में भी समझाया था. अभी भी याद है मुझे वह खूबसूरत फिल्म. उसके फेड इन, और फेड आउट इफ़ेक्ट, साथ ही बेहतरीन कल्पनाशील स्क्रिप्ट ! बिहार सरकार ने पर्यटन संबंधी कई परियोजनाओं पर विचार-विमर्श के लिये उन्हें आमंत्रित भी किया था. उनकी अगली फिल्म तमिलनाडु के शिवाकासी में पटाखा उद्योग की दशा पर प्लांड थी…और फिर एक सुबह, मैंने लखनऊ में अखबार में खबर पढ़ी— “प्रसिद्ध लघु फिल्म निर्माता पति-पत्नी की आग में घिरकर मौत” !

सुरभि  से मेरा कोई रक्त का सम्बन्ध नहीं था, पर कुछ कमतर भी नहीं था. एकबारगी मुझे लगा कि यह नहीं हो सकता. उस संक्षिप्त समाचार को फिर मैंने अन्य समाचारपत्रों में भी पढ़ा. मेरी आँखों के सामने अँधेरा छा रहा था. लगा, कि मेरा दिल बैठा जा रहा है. उससे जो रिश्ता था वह ऐसे कैसे विलीन हो सकता था? ईश्वर इतना निर्दयी कैसे हो सकता है ? अभी तो उसकी जिन्दगी के बेहतर दिनों का आगाज़ हुये मात्र चंद साल ही बीते थे. कितनी प्रसन्न दिखती थी वह. पर, खबर सच थी. बाद में पता चला कि सुरभि और अमिय ने वह रात अगर किसी अच्छे होटल में गुजारी होती तो शायद वह दोनों आज हमारे बीच होते. पर, उन्हें तो जूनून था. काम में जब तक वह दोनों अपना दिल-दिमाग और शरीर सब कुछ नहीं झोंक देते थे, उन्हें मजा नहीं आता था. बाद में पता चला कि उन्होंने स्वयं यह निर्णय लिया था कि वह पटाखों के विशाल गोदाम के ऊपर बने कमरे में ही रात्रि विश्राम करेंगे ताकि सवेरे भोर से ही शूटिंग की जा सके. शार्ट सर्किट से उठी आग की लपटों से कम, दम घुटना उनकी मौत का कारण अधिक बना. कहें तो उनका काम के प्रति जूनून ही उनकी मौत का कारण बना.

….आज, सुनिधि को पुरस्कार मिलने की खबर से पुनः मेरी आँखें नम हो आई. पर, आज यह आंसू ख़ुशी के थे. सुरभि के स्वप्न को जो जिया था सुनिधि ने, उसके अधूरे काम को बेहतरीन ढंग से पूरा कर. फिल्म थी “शिवाकासी—एक स्वप्न की मौत”, जो वहाँ के असंगठित पटाखा उद्योग में लगे हजारों बाल श्रमिकों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिति के दोहन तथा सरकारी उपेक्षा पर एक बेहतरीन रिपोर्ताज थी ! …कम से कम सुरभि  और अमिय का यूँ अचानक अखबार के पन्ने में एक खबर में सिमट जाने का आशीर्वाद सुनिधि को मिल गया था. क्या सपने मरते हैं भला कभी ?

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–राजगोपाल सिंह वर्मा 

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