किसने की थी अकबर महान के स्मारक की दुर्दशा ?

आगरा के सिकंदरा इलाके में स्थित है मुग़ल सम्राट अकबर महान का मकबरा जो तात्कालीन वास्तुकला का एक नायाब नमूना भी है, लेकिन बहुत काम लोग इस तथ्य को जानते हैं कि इस मकबरे में अकबर महान के अवशेष मौजूद नहीं हैं. न ही वहां तत्कालीन समय में मौजूद रत्नजड़ित पत्थरों, आभूषण तथा नायब बहुमूल्य कालीनों में से कुछ शेष बचा है.

अकबर महान ने अपने स्मारक का स्थल अपने जीते जी स्वयं चयनित किया था. उनके बेटे जहाँगीर ने पूरी तन्मयता से उनके शानदार मकबरे को तैयार कराया और उसे ऐसा भव्य रूप दिया कि दूर-दूर तक उसकी चर्चा होने लगी. तब तक ताजमहल का कोई नामोनिशान नहीं था, इसलिए लोग इस मकबरे की भव्यता से ही अभिभूत हो जाते थे.

Akbar (1)

औरंगजेब की धार्मिक असहिष्णुता तथा आक्रामकता की नीति ने मुग़लों की साख खराब करनी आरम्भ कर दी थी. ऐसे में, उसकी नीति का विरोध करने के लिए निकटवर्ती मथुरा के जाटों ने विद्रोह कर दिया. वे सिनसिनी (जो बाद में भरतपुर रियासत बनी) के स्थानीय जागीरदार राजा राम जाट के नेतृत्व में एकजुट हो गये. और मुग़ल साम्राज्य के गौरव अकबर के स्मारक को निशाना बनाने की ठानी.

विद्रोहियों के मन में औरंगजेब के प्रति इनता आक्रोश था कि उन्होंने उनके पड दादा के मसोलियम की ईट से ईट बजा दी.औरंगजेब की गुप्तचर सेवा लोगों में पनप रहे आक्रोश को भांपने में असफल रही. जब तक औरंगजेब की ओर से कोई कार्यवाही होती, विद्रोहियों ने सिकंदर स्थित अकबर के मकबरे की दुर्दशा कर दी थी.

विद्रोहियों ने स्मारक से सोना, चांदी, जवाहरात, दुर्लभ कालीन और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं को लूट लिया तथा जमकर तोड़फोड़ की. यह वह समय था जब औरंगजेब के नेतृत्व में मुग़ल साम्राज्य की सब जगह तूती बोल रही थी और उसका विरोध करने का दुस्साहस किसी में नहीं था.

दरअसल, राजा राम जाट का आक्रोश दोतरफा था. एक तो वह जबरन धर्म परिवर्तन के विरुद्ध था, दुसरे वह इसी विरोध के फलस्वरूप अपने पिता गोकुल सिंह को दिए गये मृत्यु दंड का भी बदला लेना चाहता था.

विद्रोहियों ने न केवल स्मारक में लूट को अंजाम दिया, बल्कि अकबर महान की कब्र को खोदकर उनकी हड्डियों को भी निकाल लिया और उन्हें सार्वजानिक रूप से जला दिया.

जब तक जान रही, तब तक राजा राम जाट और उसके सहयोगियों ने औरंगजेब के धर्मांतरण के प्रयासों का जोरदार विरोध जारी रखा. बाद में औरंगजेब ने उसे गिरफ्तार करने में कामयाबी पाई और उसके पिता की तरह सन १६८८ में उसे मृत्युदंड दिया.

ख़ास बात यह थी कि औरंगजेब की दिलचस्पी अपने पड़ दादा के स्मारक को उसके गौरवपूर्ण रूप में लाने की नहीं रही, वह केवल सोने, चांदी और गहनों की बरामदगी और अपने प्रभुत्व को कायम रखने में दिलचस्पी रखता था. वैसे भी औरंगजेब ने वास्तुकला तथा विशाल निर्माणों को अपनी प्राथमिकता कभी नहीं माना. इसी कारण अकबर महान का यह खूबसूरत स्मारक सैकड़ों साल बदहाली की स्थिति में रहा. इसकी वृहद् मरम्मत तथा पुनर्निर्माण करने का श्रेय ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लार्ड कर्ज़न को जाता है.

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