सोचता हूँ,
हर रोज़,
लिखूंगा एक ख़त तुम्हें,
बताऊंगा कुछ राज,
बातें ऐसी,
जिनसे हो तुम अनजान,
और कुछ ऐसे किस्से,
जिन्हें जानना है जरूरी,
तुम्हारे लिये,
पर,
यह हो ना सका,
क्यूंकि,
सुबह होती है,
तो गुजर जाती है,
खूबसूरत सी,
उन इन्द्रधनुषी किरणों को,
निहारने में,
पंछियों के कलरव और,
मंद हवा के झोंकों में,
चूमने में,
उन लटों को,
जो आ जाती हैं बार-बार,
मेरे पास,
रहकर भी बंधी,
अपनी ही जड़ों से,
दिन में,
क्या माहौल बना,
कुछ लिखने का कभी,
या कुछ हुआ सृजन कहीं,
जिन्दगी की व्यर्थ सी,
भागदौड़ में,
और,
शाम होती है तो,
कुछ ख़ुशी,
कुछ गम के साये,
साथ होते हैं,
जो तेरी यादों को,
धुंधला करना चाहते हैं,
या जीना चाहते हैं,
चुनिन्दा खूबसूरत लम्हे,
क्या आसां है अनदेखी करना,
उनकी धृष्टता को,
और यूँ ही बस,
रात होती है,
तेरा साथ,
और तन्हाइयाँ,
मैं बुनता जाता हूँ,
स्वप्न कुछ खूबसूरत से,
झरोखे खट्टी-मीठी सी,
कुछ यादों के,
और रात का एक-एक लम्हा,
तेरे साथ होने का,
अहसास देता है.
जब मुझे,
तब,
मैं भूल जाता हूँ,
स्वयं को भी !

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