तुम

तुम हो तो,
तपती धूप भी सुहानी,
गर्म हवाओं में भी,
मिल जाते अहसास,
जैसे जाना हो,
क्षितिज के पार,
और साँझ ढलने को हो;

तुम नहीं तो,
बारिश की बूँदें,
हो जाती निस्तेज,
बहता पानी छोड़ जाता,
अपने निशां,
दिल के कोने में ज्यूँ;

सर्द हवायें भी रहें बेअसर,
बेधने में मन को,
रहती नाकामियाब,
उन्हें भी चाहिये ना,
तुम्हारा ही साथ !
तुम न हो तो हो जाता मन,
बस सुषुप्त सा,
धमनियों के कवच में !

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मैं वही हूँ

नहीं,
यह इल्जाम गलत है,
हर लम्हा मैंने गुजारा है,
तुम्हारी ही यादों में,
विस्मृत किया नहीं कभी भी,
तुम्हारी यादों को,
ख़त मैंने रोज़ लिखे,
इन्हीं हाथों से,
जिनके लफ्ज़,
दिल की गहराइयों से,
निकले थे,
और स्याही में डूबे थे,
मुहब्बत के कुछ,
हसीं अफ़साने और,
थोड़ी सी नींद,
कुछ ख्वाब रहे बाकी,
स्वतः स्फूर्त और,
निश्छल बातें,
उन सपनों की,
कुछ मन की,
कुछ मायावी सी,
नहीं मालूम मुझे,
कहाँ गयी वह,
अभिव्यक्त व्यंजनायें,
और दीवानेपन की बातें,
बनी पंखड़ी गुलाब की या,
सितारा बन चमकती हैं अभी,
चाँद के इर्द-गिर्द ही,
मैं अब भी वही हूँ,
डूबता-उतराता,
प्रेम में तुम्हारे !

इश्क रूहानी

बेशक,
कैद दी मुझे,
अपने ही अंश ने,
लाल पत्थरों,
और झरोंखों की,
तन्हाइयों,
के दरमियान,
तो क्या ?
मुहब्बत की थी,
बेपनाह मैंने तो,
इश्क मेरा,
उस रूह में,
क़ाबिज है पुरसकूँ,
गिला नहीं कोई,
इन बेड़ियों से मुझको,
मैंने रच दी है,
मुहब्बत की तवारीख,
एक नायाब निशानी देकर,
सोया है इश्क मेरा अब,
संग-ए-मरमर के,
हसीं आगोश में,
और तुम ?
मुंह पर तुमने,
पोत ली है कालिख
बरखुरदार मेरे,
जब भी जिक्र होगा,
मुहब्बत का,
अदब देंगे कद्रदान मुझको,
और दर्ज होगा,
नाम तुम्हारा
कुफ्र और बेगैरत से,
दगाबाजों में,
फख्र है मुझको,
अपनी पाक मुहब्बत पे,
नाज़ है,
इश्क़-ए-ताजमहल पर,
करता हूँ सजदा जिसका मैं,
सुबह और शाम,
हर रोज़,
इन दरो-दीवारों से,
जी रहा हूँ इस इश्क को,
अपनी रूह में भी मैं !

अंतिम किरणें

सूरज की नन्ही सी,
वह अंतिम किरणें,
रोका था जिन्होंने,
उन स्याह रातों को,
हर दिन,
अपनी उस संचयित ऊष्मा से,
जो बनी स्रोत,
उसकी इच्छाशक्ति की,
नन्ही थी वह,
परीलोक के सपनों से,
दूर– बहुत दूर,
मानवता के धर्म को,
जीने को आतुर,
इच्छा उसकी,
फिर भी रही अपूर्ण,
अन्धकार के दानव ने,
डस लिया उसे भी बेवक्त,
और फैलाया अपना साम्राज्य,
चहुँ ओर,
पर फिर भी,
हार नहीं मानी नन्हीं किरणों ने,
हर दिन लिया पुनर्जन्म,
कुछ आशाओं ने,
विश्वासों ने,
स्वयं चमकी,
जग चमकाया,
किया उजियारा,
राह दिखाई सबको,
नमन तुम्हें,
है प्रणाम तुम्हारी,
श्रद्धा को !

अहसास

संजीदा से कुछ अहसास,

बदल जाते हैं,

लफ्जों में जब,

कलम का रोमांच,

और कागज़ का साथ,

कभी बारिश की बूंदों में,

या घने वृक्ष की छाँव मे,

ढूढता है कुछ,

कभी दरिया के

मुकम्मिल बहाव में,

यादों का फलसफा,

और रूहानी मुहब्बत,

सब कुछ तो है,

उस मसरूफियत में भी,

दिल के करीब और

उससे दूर भी  !

किरणें

सूरज की नन्ही सी,
वह अंतिम किरणें,
रोका था जिन्होंने,
उन स्याह रातों को,
हर दिन,
अपनी उस संचयित ऊष्मा से,
जो बनी स्रोत,
उसकी इच्छाशक्ति की,
नन्ही थी वह,
परीलोक के सपनों से,
दूर– बहुत दूर,
मानवता के धर्म को,
जीने को आतुर,
इच्छा उसकी,
फिर भी रही अपूर्ण,
अन्धकार के दानव ने,
डस लिया उसे भी बेवक्त,
और फैलाया अपना साम्राज्य,
चहुँ ओर,
पर फिर भी,
हार नहीं मानी नन्हीं किरणों ने,
हर दिन लिया पुनर्जन्म,
कुछ आशाओं ने,
विश्वासों ने,
स्वयं चमकी,
जग चमकाया,
किया उजियारा,
राह दिखाई सबको,
नमन तुम्हें,
है प्रणाम तुम्हारी,
श्रद्धा को !

जिन्दगी

मैंने भी देखे हैं,
जिन्दगी के हसीं रंग,
इन्द्रधनुष-सी इस दुनिया के,
जिए भी हैं कुछ ऐसे ही,
सतरंगी स्वप्न,
अब भी,
शेष हैं जरूर,
कुछ ऐसे ही रंग,
इन डिब्बों में,
छटपटाते से,
आतुर,
अपने दायरे से बाहर आने,
और छटा दिखाने को,
कुछ सपनों को,
फिर से रंगने के लिये,
क्यूंकि,
रंगसाज़ हूँ मैं,
मैं बेचता नहीं,
रंग भरता हूँ सपनों में,
सिर्फ तुम्हारे लिये,
और उड़ा देता हूँ गमों को,
धुआं-धुआं कर !