तेरे फौलादी-से सीने पे,
रेत सी बिखरती हूँ,
तेरे माथे की दुविधा-सी हूँ ,
हूँ तुझमें अभी भी मैं,
पर आभासी रूप से हटकर,
तेरे अनवरत साथ को,
मचलती हूँ,
मैं बूँद हूँ,
एक नन्ही सी,
रुकना नहीं,
बस प्रवाहित रहना चाहती हूँ,
तेरे ही ख्यालों में रहकर भी.

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दरिया में मिलकर,
समुन्दर हो भी जाऊं तो भी,
तुझमें समा जाऊं,
और तुझमें ही,
जी जाऊं,
कुछ ऐसी ही,
जिन्दगी चाहती हूँ,
बस,
नन्ही सी एक बूँद हूँ मैं
मैं तुझ में समाकर,
सिर्फ तुझको ही,
जीना चाहती हूँ,
बस इतनी सी ख़्वाहिश को,
हक़ीक़त में तब्दील होते,
देखना चाहती हूँ !

–राजगोपाल सिंह वर्मा

 

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