सिर्फ तेरी,
कुछ अदद यादें ही तो हैं,
जिन्हें ओढ़ता हूँ,
कभी बिछाता हूँ मैं,
साँसों में बसी हैं वह,
समेट लेता हूँ कभी उनको,
दिल के एक कोने में,
कि नज़र ना लग जाये,
इनको भी,
किसी सुहाने मौसम,
या हसीं रात की,
सर्द मौसम,
या फिर बरसात की,
विस्मृत हुई गर यादें भी,
तो क्या बचेगा,
नश्वर शरीर भी,
जिन्दा है,
इनके ही सहारे !

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