सूरज की नन्ही सी,
वह अंतिम किरणें,
रोका था जिन्होंने,
उन स्याह रातों को,
हर दिन,
अपनी उस संचयित ऊष्मा से,
जो बनी स्रोत,
उसकी इच्छाशक्ति की,
नन्ही थी वह,
परीलोक के सपनों से,
दूर– बहुत दूर,
मानवता के धर्म को,
जीने को आतुर,
इच्छा उसकी,
फिर भी रही अपूर्ण,
अन्धकार के दानव ने,
डस लिया उसे भी बेवक्त,
और फैलाया अपना साम्राज्य,
चहुँ ओर,
पर फिर भी,
हार नहीं मानी नन्हीं किरणों ने,
हर दिन लिया पुनर्जन्म,
कुछ आशाओं ने,
विश्वासों ने,
स्वयं चमकी,
जग चमकाया,
किया उजियारा,
राह दिखाई सबको,
नमन तुम्हें,
है प्रणाम तुम्हारी,
श्रद्धा को !

Advertisements