मैंने भी देखे हैं,
जिन्दगी के हसीं रंग,
इन्द्रधनुष-सी इस दुनिया के,
जिए भी हैं कुछ ऐसे ही,
सतरंगी स्वप्न,
अब भी,
शेष हैं जरूर,
कुछ ऐसे ही रंग,
इन डिब्बों में,
छटपटाते से,
आतुर,
अपने दायरे से बाहर आने,
और छटा दिखाने को,
कुछ सपनों को,
फिर से रंगने के लिये,
क्यूंकि,
रंगसाज़ हूँ मैं,
मैं बेचता नहीं,
रंग भरता हूँ सपनों में,
सिर्फ तुम्हारे लिये,
और उड़ा देता हूँ गमों को,
धुआं-धुआं कर !

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