नहीं,
यह इल्जाम गलत है,
हर लम्हा मैंने गुजारा है,
तुम्हारी ही यादों में,
विस्मृत किया नहीं कभी भी,
तुम्हारी यादों को,
ख़त मैंने रोज़ लिखे,
इन्हीं हाथों से,
जिनके लफ्ज़,
दिल की गहराइयों से,
निकले थे,
और स्याही में डूबे थे,
मुहब्बत के कुछ,
हसीं अफ़साने और,
थोड़ी सी नींद,
कुछ ख्वाब रहे बाकी,
स्वतः स्फूर्त और,
निश्छल बातें,
उन सपनों की,
कुछ मन की,
कुछ मायावी सी,
नहीं मालूम मुझे,
कहाँ गयी वह,
अभिव्यक्त व्यंजनायें,
और दीवानेपन की बातें,
बनी पंखड़ी गुलाब की या,
सितारा बन चमकती हैं अभी,
चाँद के इर्द-गिर्द ही,
मैं अब भी वही हूँ,
डूबता-उतराता,
प्रेम में तुम्हारे !

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