तुम

तुम हो तो,
तपती धूप भी सुहानी,
गर्म हवाओं में भी,
मिल जाते अहसास,
जैसे जाना हो,
क्षितिज के पार,
और साँझ ढलने को हो;

तुम नहीं तो,
बारिश की बूँदें,
हो जाती निस्तेज,
बहता पानी छोड़ जाता,
अपने निशां,
दिल के कोने में ज्यूँ;

सर्द हवायें भी रहें बेअसर,
बेधने में मन को,
रहती नाकामियाब,
उन्हें भी चाहिये ना,
तुम्हारा ही साथ !
तुम न हो तो हो जाता मन,
बस सुषुप्त सा,
धमनियों के कवच में !

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