आप पर गर्व है डॉ अनूप खरे !

आगरा में दो चीज़ों की भरमार है– एक तो होटल, रेस्टोरेंट और दूसरे नर्सिंग होम और डॉक्टर तथा अस्पताल. मुख्य राजमार्गों से लेकर गली-मुहल्लों तक में इस दोनों प्रकार की व्यवस्थाओं से आपको रूबरू होने का अवसर आसानी से मिल सकता है. लेकिन, इस बात की गारंटी नहीं कि, आपने जिसे चयन किया है वह अच्छा होटल या बेहतरीन नर्सिंग होम ही हो.

मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि बेहतर डॉक्टर वही होता है, जो मरीज़ को समय दे, उसके साथ संवाद स्थापित करने की पहल करे, उसमे सफल हो और अंततः उसके लिए बेहतर इलाज़ सुझा सके. पता नहीं कितने अनगिनत डॉक्टर्स से वास्ता पड़ा होगा, जिन्हें मरीज़ की आँखों में झाँकने की फुर्सत नहीं है. वह रोबोट की तरह सर झुकाए मेडिसिन, और उससे पहले तमाम तरह की जांचें ऐसे लिखते हैं, जैसे वह उस पर कोई बहुत बड़ा अहसान कर रहे हों. और अगर वही जांचें आपने दो दिन पूर्व भी कराई हैं, तो दूसरी लेबोरेटरी से रेफेर कर दिया जाएगा. आप आये हैं तो जांच तो फिर-फिर करानी होंगी ही आपको. मुस्कुराना तो बाद में आता है. वह पेशेंट्स पर एक नज़र डालना भी पसंद नहीं करते. केवल यांत्रिक रूप से अपनी ड्यूटी करते हैं, पर हाँ, यह सुनिश्चित जरूर करते हैं, कि पेशेंट की एंट्री उनके केबिन में तभी हो जब वह उनकी फीस पहले ही जमा करा दे. हाँ, कुछ अपवाद भी होते हैं, जिनके लिए मानवीय भावनाएं सर्वोपरि होती हैं. पर, वह इस व्यवसाय में शायद अँगुलियों पर गिने जा सकते हों.

अनूप खरे आगरा के प्रतिष्ठित ऑर्थोपेडिक सर्जन हैं. वह स्वयं अपना क्लिनिक चलाते हैं और कई प्रतिष्ठित नर्सिंग होम्स में अपनी सेवाएँ भी देते हैं. पत्नी को उनकी हड्डियों की समस्या के कारण दिखाना था. पहली बार की भेंट ने ही उन्होंने हम लोगों का दिल जीत लिया. फीस तो उनको भी अदा ही की न. पर जिस निश्छल तथा निर्मल स्वभाव से वह पेशेंट्स को पूरी तल्लीनता से समय देते हैं, और उससे व्यक्तिगत संवाद स्थापित करते हैं हैं, वह चमत्कारिक है. भीड़ कम नहीं होती उनके पास. पर, मरीज़ के उनके केबिन में प्रवेश करते ही, उनकी मोहक मुस्कान और मन से बात करना, वह भी पॉजिटिव, उससे ऐसा लगता है, आधी बीमारी तो यूँ ही चली गई. और आधी उनके डायग्नोसिस से.

डॉ खरे ने कुछ देर के संवाद के बाद ही पत्नी को स्पष्ट कर दिया था कि आपके लिए प्रसन्नता कि बात है कि आपको कोई बीमारी ही नहीं है. और अगर है भी तो आप केवल मार्निंग वाक, योग और लाइफ स्टाइल बदलने भर से ही स्वस्थ हो जायेंगी. दवाएं आपके लिए फिजूल हैं. टेस्ट कराये उन्होंने भी, परन्तु न्यूनतम, और वह भी अपनी संतुष्टि के लिए. बाद में उन टेस्ट के आधार पर भी उन्होंनेजो औषधियां सुझाई उनमें मुख्य था अंकुरित आहार (उनके शब्दों में घोड़े का दाना), भरपूर हरी सब्जियां और मौसम के फल, आवश्यकतानुसार बादाम, अखरोट, अनार और शहद का सेवन, सवेरे उठकर सुविधानुसार वाक, और श्री श्री रविशंकर की सी डी से योग क्रियायें तथा ध्यान.

जब-जब भी मैं डॉ खरे से मिला, तो एकबारगी तो और डॉक्टर्स के सम्बन्ध में भी मेरी अवधारणा नतमस्तक होने जैसी हो जाती है, लेकिन सब उनकी तरह नहीं हैं, जल्दी ही यह भी समझ में आ जाता है. मेरे पास इतने किस्से हैं डॉक्टर्स पर अविश्वास करने के, और मरीजों से अनुचित धन ऐंठने के कि कई सत्य कथाएं या उपन्यास लिखने भर की रोचक और रोंगटे खड़े कर देने वाली रचनाओं के लिए पर्याप्त सामग्री है. पर बात अभी अच्छे और बेहतर अनुभव की हो रही है , तो अभी उसको रहने ही दें तो उचित होगा.

दरअसल डॉक्टर से यही तो अपेक्षा हम करते हैं, कि वह हमको भी अपने परिवार का हिस्सा माने. जैसा सुझाव अपने परिजनों के लिए देना हो, वही हमारे लिए भी सुझायें, न कि दोहरे मापदंडों पर चले. ईश्वर ने उसे सेवा का अवसर दिया है और उस सेवा का भरपूर फल मात्र धनराशि अर्जन नहीं है, आने वाले लोगों के आशीष और स्नेह भी किसी धन– रूपये-पैसे, सोने चांदी और जवाहरात से कम नहीं हैं. धनराशि अर्जन एक समय में गौण हो जाता है. यूँ तो ठेला-खोमचा लगाने वाले, पान की गुमटी और ट्रेन में चाय-चाय चिल्लाकर भी जो पिलाते हैं, उससे भी करोडपति होते देखे गए हैं लोग, लेकिन, ईश्वर ने उन्हें केवल धन दिया है, वह सम्मान नहीं दिया जो डॉक्टर्स को हासिल है.

आगरा को आप पर गर्व है डॉ अनूप खरे !

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प्रारब्ध

“सर, मैं अपर्णा, ठाकुर साब के घर से !”, मोबाइल पर अनजाने नंबर की कॉल को अनमने ढंग से उठाते ही उधर से आवाज आई.

“अपर्णा…..हां, हां, ठाकुर साब के यहाँ से न? बोलो अपर्णा”, मैंने यथासंभव अपनी आवाज़ को संयत रखते हुए कहा, पर किसी अनिष्ट की आशंका से मेरी धडकनें संयत रहने में असफल-सी प्रतीत हो रही थी. पर, वही हुआ, जिसका मुझे भय था.

“बाबू जी नहीं रहे”, अपर्णा ने रुंधे गले से कहा, “रात भर बेचैनी के बाद जब सवेरे लगभग साढ़े पांच बजे उनके शरीर में जब निश्चेतना के भाव दिखे तो उन्हें नर्सिंग होम ले जाया गया, जहाँ डॉक्टर्स ने उन्हें मृत बता दिया”, अपर्णा ने आगे बताया. “ओह”, के अतिरिक्त मैं कुछ बोल पाता उससे पूर्व ही अपर्णा ने नमस्ते कर कॉल विच्छेदित कर दी थी. शायद उसे और लोगों को भी सूचित करना था.

मैंने अपनी घड़ी पर नज़र डाली. सवेरे के ७.४० हुए थे. आधा घंटा ही हुआ था अभी मुझे मार्निंग वाक से लौटे. बस एक कप चाय पीते-पीते सवेरे के अखबारों पर एक दृष्टि डाल रहा था. मन व्यथित-सा हो गया. अखबार के पन्ने समेत कर एक किनारे सरका दिए. आँखें अनायास मुंदी-सी जा रही थी. सामान्यतः मैं मॉर्निंग वाक से लौटकर चाय पीने और पेपर पढने के बाद नींद का एक झटका फिर से लेता था. पर, नींद तो उड़ ही चुकी थी, और  जागे रहने का भी मन नहीं था. बस मन करता था कि समय यूँ ही ठहर जाए, जब तक कि मैं तन्हाई में जाकर अपने मित्र अजेय प्रताप सिंह की यादों को समेट न लूं.

हालांकि ठाकुर साब से मेरी मित्रता अधिक पुरानी भी नहीं थी. मात्र लगभग साढ़े तीन साल हुए थे, उनसे मुलाक़ात हुए, और वह भी वाकिंग प्लाजा में. कॉलोनी का यह पार्क टहलने वालों के लिए स्वर्ग से कम नहीं था. ठाकुर साब अपने आठ-दस लोगों की मण्डली में चुटकुले और अपने किस्से सुनाते हुए तेज़ और सधे क़दमों से जब पार्क की दूरियां नापते तो कोई अनजान व्यक्ति भी समझ सकता था कि यह छः फीट का इंसान जरूर किसी पुलिस, सेना या ऐसी ही किसी संस्था से जुडा होगा, जहाँ चुस्ती और फिटनेस की अलग ही महत्ता है.

यह बात मुझे टहलते हुए लगभग दो-तीन हफ्ते बाद बाद पता चली कि सिंह साब पुलिस में फिलहाल डिप्टी एस पी के पद पर कार्यरत हैं और जल्दी ही सेवानिवृत होने वाले हैं. बाद में पता चला कि मूल रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया के निवासी ठाकुर साब ने आगरा में ही बसने का फैसला किया था और आवास-विकास कॉलोनी में एक घर भी बनवा लिया था, जो निश्चित रूप से उनके रुतबे और पद की अपेक्षा कहीं अधिक विलासितापूर्ण था. उनके तीन बेटे थे, जिनमें से दो अनुग्रह प्रताप सिंह और प्रबल प्रताप सिंह विवाहित थे और उनके साथ ही रहते थे. सिंह साब ने दोनों के लिए ही अपने मकान में अलग-अलग पोर्शन बनवा रखे थे. बड़े बेटे के लिए निजी व्यवसाय भी सिंह साब ने ही जमवाया था. मंझला बेटा शिक्षा के क्षेत्र में था. उनकी गृहस्थी अच्छी चल रही थी. तीसरा अविवाहित बेटा रचित प्रताप सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय से मास्टर्स की पढाई के साथ सिविल सर्विसेज की परीक्षाओं की तैयारी में जुटा था.

उन्हें रिटायर हुए बमुश्किल आठ माह ही हुए होंगे. अचानक सिंह साब का यूँ चले जाना किसी के लिए भी विश्वसनीय नहीं था. पर सच का सामना तो एक-न-एक दिन करना ही होता है. और सच यही था कि अजय प्रताप सिंह अब इस दुनिया में नहीं रहे. मैंने जल्दी से स्नान किया और नाश्ता किये बिना ही उनके आवास की ओर चल पड़ा, जो मेरे घर से लगभग चार किलोमीटर की दूरी पर रहा होगा.

सिंह साब की विशाल कोठी के बाहर से दिख रहा था एक अजीब-से किस्म का पसरा हुआ सन्नाटा. न जाने मौत को भी सन्नाटा कितना अच्छा लगता है. मेरा इस मकान में पिछले तीन सालों में न जाने कितने बार आना-जाना हुआ होगा. कितनी महफ़िलें जमी होंगी, कितने किस्से-कितनी बातें– पर आज, आज जो सन्नाटा और नीरवता का माहौल था वह बहुत गहन उदासी की चादर ओढ़े था. मैंने अपनी गाडी जिस जगह पार्क की, उसके आसपास पांच और गाड़ियाँ और कई स्कूटर-मोटरसाइकिल पहले से ही खड़ी थीं. ड्राइंग रूम से सटे वरांडे में सफ़ेद चादर में लिप्त था ठाकुर साब का निष्प्राण शरीर. वह शरीर जो दिन में न जाने कितनी बार ठहाके लगाया करता और लोगों को अपने चुटकुलों से हंसाते रहता था.आस-पास दरी पर बैठे लोग बिलकुल शांत थे. मेरी पहचान के तो केवल उनके घर के लोग थे, शेष सब अनजान से थे वहां.

मैंने उनके शरीर पर श्रद्धा सुमन के रूप में गुलाब की पंखुड़ियों को अर्पित किया. मैं किंकर्तव्यविमूढ़-सा उनके आत्मारहित शरीर के पास खड़ा रहा. अपने स्थान पर वापिस जाने की न तो मुझमें इच्छा थी, और न ही साहस. बस एकटक देखता रहा मैं उनकी मुंदी आँखों को! उस निस्तेज शरीर को जो कुछ कहानियों को जीता रहा था, ताउम्र. कोई उदासी, कोई दुःख, कोई उलझन– किसी को भी फटकने तक न दिया था अपने जीते-जी ठाकुर साब ने. कभी किसी पर मोहताज़ नहीं रहे. पर आज.. वह तो निश्चेत थे, और हम निस्सहाय !  

ठाकुर साब कुछ चमत्कारिक से व्यक्तित्व के स्वामी थे. पुलिस की नौकरी और उनका मजाकिया लहजा आपस में ज्यादा मेल नहीं खाता था. उनके बारे में तरह-तरह के किस्से भी सुने जाते थे. सिंह साब के बारे में चर्चा थी कि वह ठीक-ठाक घूसखोर टाइप के पुलिस अधिकारी रहे थे. कई बार उनकी ठाकुर बुद्धि शिकायतकर्ता और अपराधी दोनों पर ही सामान रूप से चोट कर जाती. यानी, दोनों तरफ से अच्छी-खासी वसूली के बाद ही मामले को रफा-दफा करते. हालाँकि छोटे-मोटे केस के लिए वह रॉबिनहुड की भूमिका में आ जाते. उनके निर्देश थे कि इन्हें ऐसे ही रफा-दफा कर दिया जाए, बिना किसी लिखापढ़ी के. चूँकि ठाकुर साब ने पुलिस में पहले पायदान, यानि हवालदार या सिपाही के पद से अपनी नौकरी आरम्भ की थी, और घिसते-घिसते वह डिप्टी एस पी की पोस्ट तक जा पहुंचे थे, तो यकीनन उन्हें कानून और पुलिसिया पेंचों की अपनी जानकारी के कारण चलते-फिरते एनसाइक्लोपीडिया के नाम से भी जाना जाता था. किसी केस को पक्ष में करना हो या खिलाफ, दोनों तरह के उपाय करना, और जरूरत पड़ने पर दोनों पक्षों से घूस ऐंठना उन्हें बखूबी आता था.

असली किस्से तो उन्होंने स्वयं रिटायरमेंट के बाद अपनी मण्डली में साझा करने का एक दस्तूर-सा बना लिया था. कई बार तो बातों का सिलसिला चलता रहता और मॉर्निंग वाक का समय खत्म हो जाता. तब गेट के पास लल्लन के चाय-बन-मक्खन पर शेष कड़ियों का निपटारा होता. खंडेलवाल जी, और अग्निहोत्री जी तो रोज़ ही उन्हें उकसा-उकसा कर नई-नई कहानियों की फरमाइश करते और ठाकुर साब भी बस, मूड बना लेते. फिर जो बातें शुरू होती तो तभी खत्म होती जब या तो अग्निहोत्री जी के घर से दो-तीन बार फोन ना आ जाता या खंडेलवाल जी का बेटा स्वयं ही उन्हें ढूंढने लल्लन के खोखे तक न आ पहुँचता. उन कहानियों में कितनी वास्तविकता होती और कितना मसाला, यह तो स्वयं ठाकुर साब ही जानते होंगे.

लेकिन इस सब के बावजूद पिछले काफी दिनों से, और ख़ास तौर से उनके रिटायरमेंट के बाद, एक बात साफ़ दिखती थी. अब से तीन साल पहले वाले ठाकुर साब अब नहीं रहे थे अजय प्रताप सिंह. उनकी मूंछों की रौनक कहीं हल्की पड़ चुकी थी, और आँखों की चमक तथा सीने का कसाव भी ढलान पर आ गया था. उनकी चाल और हाव-भाव में जो अंतर आया था, वह स्वाभाविक था, पर न जाने क्यूँ मुझे तथा और लोगों को वह सब कुछ अस्वाभाविक सा लगता था. रिटायरमेंट के बाद अवसाद और घर के लोगों से तालमेल न बैठने के किस्से आम होते हैं, लेकिन उनसे मेरी घनिष्टता में न तो मैंने स्वयं ऐसा कुछ देखा था, और न ही उन्होंने कभी मुझसे साझा किया. कभी हल्का सा भी कोई गुबार उनके मन में नहीं दिखा. बावजूद इसके यह भी उतना ही सही था कि कुछ था जो कतरा-कतरा उनकी जिन्दगी को खा रहा था.

ठाकुर साब अपने तीनों बच्चों की तारीफों के पुल बांधते नहीं थकते थे. वे उनको सोना बताते थे. कहते थे, यह मेरे पिछले जन्म के कर्मों का फल है, जो उसने मुझे तीनों बच्चों के रूप में मुझे लौटाया है. उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं थी. यह भी उन्होंने बताया था कि स्वयं को व्यस्त रखने के लिए वह अपने आप को बार काउंसिल में पंजीकृत कराकर प्राइवेट प्रैक्टिस आरम्भ करने वाले हैं. बहुत आशान्वित थे वह अपनी इस प्रैक्टिस को लेकर. पत्नी के देहावसान के बाद पिछले छः साल से ठाकुर साब अपने विशाल भवन के स्टडी रूम और ड्राइंग रूम तक ही सिमट कर रह गए थे. वह अपने शयन कक्ष में शायद ही कभी सोते हों.

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…वह बात जुलाई के पहले सप्ताह की थी. दिन भी रविवार का था. जब लोग हफ्ते भर की भागदौड़ की जिन्दगी के विपरीत आलस्य में रहना ज्यादा पसंद करते हैं. रात से ही रुक-रुक कर कभी तेज़ और कभी मंद बारिश हो रही थी. आसपास के इलाकों में तो पानी भी इकठ्ठा हो गया था. आज पार्क में जाने की मेरी तो हिम्मत नहीं हुई, पर ठाकुर साब तो कुछ अलग ही मिटटी के बने थे. हमेशा की तरह ४.३० बजे के अलार्म के सहारे उठने वाले ठाकुर साब आज भी उसी तरह पार्क में आये थे टहलने. पानी और कीचड के बावजूद ट्रैक तक पहुँचने का अपना रास्ता बनाते. आम तौर पर चालीस से साठ लोग पार्क में टहलते थे, भोर से शुरू कर और सूरज की गर्मी आरम्भ होने तक लेकिन उस दिन दूर-दूर तक कोई नहीं दिख रहा था. ठाकुर साब अपने सफ़ेद जॉगिंग शू और हल्के नीले ट्रैक सूट में बारिश की धीमी-धीमी बूंदाबांदी से मोर्चा ले आ पहुंचे थे पार्क में. बारिश हालाँकि खत्म हो चुकी थी, फिर भी कभी-कभी हल्की फुहारों से मौसम की सौम्यता का अनुमान हो रहा था उसदिन भी .

…अकेले टहल रहे थे उस दिन ठाकुर साब जब अचानक वह ट्रैक के एक किनारे पर इकठ्ठा काई पर पैर रखते ही असंतुलित होकर जो नीचे गिरे तो उनका सर निकट की फेंसिंग से ऐसा टकराया कि वह मूर्छित हो गए. उनके सिर के एक हिस्से से हल्का सा रक्त स्राव भी हुआ. दुखद बात यह थी कि उनको कोई इस अवस्था में देख भी नहीं पाया. जब देखा गया तब तक काफी रक्त भी बह चुका था. जब उन्हें स्थानीय मेडिकल कॉलेज के आकस्मिक चिकित्सा विभाग में उन्हें पहुँचाया गया, उस समय लगभग सवेरे के ७.४५ बजे थे. अर्थात, मोटे तौर पर लगभग दो घंटे वह लावारिस स्थिति में पड़े रहे थे. चौकीदार की ड्यूटी बदलने के समय उन पर निगाह पड़ी थी, तब जाकर आनन-फानन में उनके घर सूचित किया गया और उन्हें इमरजेंसी में पहुँचाया गया.

मजबूत शरीर था, और उस पर फिटनेस का मुलम्मा. ठाकुर साब बच गए थे. लेकिन चोट गहरी पहुंची थी और देर तक पड़े रहने से हुए नाज़ुक हिस्से के रक्तस्राव से उनकी स्थिति यदि मेडिकल भाषा को सरल करके बताया जाए तो “असहज” हो गई थी. एम आर आई तथा कैट स्कैन से कुछ ऐसे स्पॉट पर ब्लड क्लाटिंग की जानकारी प्राप्त हो गई थी जिसने उनके शरीर के दाहिने हिस्से में पक्षाघात का रूप ले लिया था. उस दिन जब जानकारी पर मेडिकल कॉलेज पहुंचा तो देख कर विश्वास ही नहीं हुआ, कि यह वही जिंदादिल इंसान है जो मेडिकल कॉलेज के न्यूरो वार्ड में ऐसे पड़ा है जैसे किसी ने इसके प्राण चूस लिए हों– निस्तेज शरीर जो तीन-चार दिन की कोशिशों के बाद हिलने-डुलने की स्थिति में आ पाया था. हर दिन तिल-तिल जिन्दगी से हार मानते शरीर को देखना. और उस व्यक्ति की जिजीविषा जो दुनिया को हँसता था, एक समय में पुलिसिया क़ानून का बड़ा स्तम्भ था, जैसे दरक रहा हो…हर पल.

काफी दिन और तमाम तरह के टेस्ट्स के बाद डॉक्टर्स ने उन्हें दो विकल्प दिए– या तो दिल्ली के फोर्टिस अथवा मेदान्ता में रेफर कर दिया जाए या किसी निजी न्यूरो सर्जन की देखरेख में इनकी सेवा सुश्रुषा की जाए. दोनों ही स्थिति में जीवन बचने की संभावनाएं क्षीण थीं, पर जिन्दगी के शेष दिनों को घसीटने के अवसर अधिक ! बस. यही थी उनकी जिन्दगी, जिसका समय चंद डॉक्टर्स निर्धारित कर रहे थे, अपने ज्ञान और अनुभव के आधार पर, और जो वह कह रहे थे वह बात पूरी तरह व्यावहारिक थी.

ठाकुर साब कुल अदद २२ दिन मेडिकल कॉलेज के प्राइवेट न्यूरो वार्ड में रहे, और १२ दिन साधारण वार्ड में. कुल मिलाकर ३४ दिन. इसके बाद उन्हें घर पर शिफ्ट कर दिया गया. स्टडी रूम का छोटा दीवान ही उनकी दुनिया बन गया. मेदांता और फोर्टिस की बात आई-गई हो गई थी. मेडिकल कॉलेज में भर्ती रहे इन चौंतीस दिनों में एक वह अद्भुद बात हुई, जिसे ठाकुर साब पता नहीं कब से दुनिया से छिपाते आ रहे थे. अब यह साफ़ हो गया था कि उनके तीन बच्चों में से दो को अपने पिता की कोई ख़ास चिंता नहीं है. बस अगर सेवा के नाम पर कोई था तो मंझला बेटा और उसकी बहु अपर्णा.  जी, अपर्णा– जिसे ठाकुर साब ने कभी मन से अपनाया ही नहीं. क्यों ? क्योंकि बेटे प्रबल प्रताप ने उनसे विद्रोह कर अपर्णा के रूप में अपने जिस जीवनसाथी को चुना था वह न तो स्व-जातीय थी, न उनके स्तर की. वह हॉस्टल में रहकर स्कॉलरशिप की राशि से पढाई पूरी करने वाली एक साधारण ग्रामीण परिवार की कस्बाई मानसिकता और परिवेश की लड़की थी, पर मेधावी इतनी कि उसे हाई स्कूल से लेकर मास्टर्स तक हर बार मेडल्स मिले. अंततः वह शहर के प्रतिष्ठित महिला कॉलेज में अस्थायी रूप से सहायक प्राध्यापक के लिए चयनित भी हो गई थी. बेटा पहले से ही विश्वविद्यालय में जंतु विज्ञान विभाग में प्राध्यापक के पद पर कार्यरत था ही.

तब, शायद ही कोई दिन बीतता हो जब मैं घंटे-दो घंटे मेडिकल कॉलेज में ठाकुर साब के पास बैठकर न आता हूँ. अब वह धीरे-धीरे लोगों को पहचानने लगे थे, लेकिन केवल आँखें उनकी मूक अभिवादन करती. न मुंह, न जुबान, न मुस्कुराहट, न हिलना-डुलना, न गर्मजोशी से हाथ मिलाना– कुछ भी नहीं बचा था उस बेहतरीन इंसान के पास. वह बस या तो कुछ देर लोगों की आँखों में अपने लिए सहानुभूति के भाव पढ़कर नैराश्य के जंगल में भटकने लगते, या फिर सीलिंग की ओर देखते, चुपचाप ! ऐसा लगा भी कि एक बार उन्होंने अपनी जुबान पर जोर डालने की कोशिश भी की, पर उनके बोल तालू से चिपक कर रह गए, और वह फिर से उदास हो गए. इसी बीच मैंने उनकी आँखों को न जाने कितनी बार नम और बेबस होते देखा ! कमजोरी इतनी कि न जाने कितनी ग्लूकोज की बोतलें और उनमें औषधियों की डोज़ उन्हें चढ़ाई गई हो. हाथ में अभी भी ग्लूकोज चढाने के लिए कैनुला लगा था. न जाने फिर कब चढ़ाना पड जाए ग्लूकोज!

इस बीच प्रबल और अपर्णा ने जितनी सेवा की ठाकुर साब की, उसे देखकर मन भर आता और वाकई गर्व होता उनके संस्कारों पर. ऐसा शायद ही कोई अवसर हो, जब मैं उनके वार्ड में गया हूँ और अपर्णा तत्पर खड़ी, सेवा करते हुए न मिली हो, पूरी जिम्मेदारी और मन से ! ऐसा ही बेटा प्रबल था. वह बाहर की पूरी जिम्मेदारी संभाले हुए था. इसके विपरीत बड़ी बहू अमृता तथा पुत्र अनुग्रह का व्यवहार विचित्र और आश्चर्यजनक रूप से उपेक्षा से भरा था, न जाने क्यों ! इन चौंतीस दिनों में मेरी उससे दो बार भेंट हुई. वह भी किसी मेहमान की तरह. अनुग्रह का न मिलना तो और भी अचरज भरा था.

“किसने कहा था बारिश में भी पार्क में जाने को ?”,

झल्लाते हुए अनुग्रह ने उस दिन जब वार्ड में कई लोगों के सामने बोला तो मैं चकित रह गया. जो होना था वह तो हो चुका. अब तो पिता की सेवा-टहल करने की बात थी न, बस. न अवसर था और न जरूरत. झुंझलाने से क्या होने वाला था. पर, उसे अनावश्यक गुबार निकालना था, सो निर्लाज्ज़ता से बोलता गया,

“अब उन्हें मालूम था कि मुझे खुद १२ लाख रुपयों की सख्त जरूरत थी. पर मेरा तो कुछ सोचा ही नहीं उन्होंने. न यह पता कि उनके अकाउंट में कितना बैलेंस ही. सब तो छिपाकर रखा उन्होंने. अब इलाज के लिए भी पता नहीं कब तक, कहाँ-कहाँ से उधार मांगता फिरूं?”.

तब तक प्रबल भी आ पहुंचा था. उसने भाई को मान से समझाने की कोशिश की और दवाओं का पर्चा अपने भाई के हाथ से ले लिया.

“सब ठीक होगा. आप परेशान न हों भैया”,

कहा अवश्य उसने पर बड़े भाई को तो न जाने और क्या कहना शेष था. मेरा मन इतना खिन्न हुआ कि एकबारगी वहां से चलने का मन हुआ, पर कदम नहीं उठ पाए. बस, इतना जरूर कहा मैंने, कि जो भी खर्च है ट्रीटमेंट का, वह तो सरकार से वापिस मिलना ही है, अंततः.परन्तु, अनुग्रह को तो आज सारा ही हिसाब करना था, जैसे उसके पिता बेटे से उधार लेकर विश्व यात्रा के लिए निकल रहे हों.

“देखेंगे वो भी, न जाने कितने साल लगेंगे”,

और लम्बी सांस खींचकर वह वार्ड के बहार वरांडे में टहलने के लिए चला गया.

ठाकुर साब का बेड उस जगह से थोडा दूर था, जहाँ यह अनावश्यक प्रसंग चल रहा था. पर, यह जगह उतनी भी दूर नहीं थी की शब्द उनके कानों तक न आ सकें. उन्हें सब समझ में आ रहा था. अफ़सोस, कि वह अभी भी अपने शरीर, और इन्द्रियों के गुलाम थे, और अपने भाव को अभिव्यक्त करने से मजबूर. मैं उनके सिरहाने एक स्टूल खींचकर बैठ गया. मैंने उनको सांत्वना देने की दृष्टि से एक झूठी मुस्कान डालनी चाही. पर, ठाकुर साब की आँखों में नमी, और दृष्टि में कातरता के भाव– दोनों ने इतना विचलित किया कि चाह कर भी वह दृश्य मेरे दृष्टि पटल से ओझल नहीं हो पा रहा है.

यह वही बड़ा  बेटा था जिसमें उनकी जान बसती थी. अपने प्रोविडेंट फण्ड तथा अन्य देयकों  के लगभग 48 लाख रूपये उन्होंने अनुग्रह के कंप्यूटर व्यवसाय में लगा दिए थे. एक गाडी भी खरीद कर दी थी. पर, फिर भी उसका उपेक्षित तथा विचित्र व्यवहार कुछ नासमझी वाली बात थी.

दरअसल मानव स्वभाव और रिश्ते इतने जटिल होते हैं कि हम जितना समझते हैं उससे कहीं अधिक वह हमारी समझ से परे होते हैं. संस्कारों का व्यक्ति के साथ ऐसा सम्बन्ध है जैसा जल का जमीन के साथ. व्यक्ति के कुछ संस्कार तो उसके अपने होते हैं. हम जीवन को उसकी गहराई तक जाकर देखते है तो बोध होता है कि हर व्यक्ति अंतत: संस्कारों का ही एक पुतला है. व्यक्ति एक जन्म का नहीं जन्म जन्मान्तर के संस्कारों का परिणाम है. व्यक्ति जो कुछ होता है, करता है वह सब उसके भीतर इस जन्म के और पूर्व जन्म के संस्कारों का एक प्रवाह गतिशील रहता है. कहते हैं कि हम पिछले जन्म में जो कर्म करते हैं वह वर्तमान में भाग्य बनकर आता है. भाग्य दिखता नहीं है अन्धकार में हमें दृष्टिपात नहीं होता है इसलिए उसके आधार पर जीवन कैसे जिया जाये यह बस विचारणीय हो सकता है.

 

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अपर्णा और प्रबल– बस यही दो लोग संस्कार की तैयारी में जुटे थे. बीच-बीच में अपर्णा अपनी नम आँखों को पल्लू से पोंछती जाती. प्रबल उसे ढाढस बंधाता. तब तक दिल्ली से रचित भी आ चुका था.  एकबारगी उसकी आँखें छलछला आई, फिर संयत होकर वह भी शांत बैठ गया था. वह बस अपने पिता के निष्प्राण शरीर को एक टक देर तक निहारता रहा. ठाकुर साब की मॉर्निंग वाक की मण्डली में से कोई दिख नहीं रहा था. अधिकांश घर-परिवार और मोहल्ले के लोग थे.

“अब देर न करें आप लोग, जल्दी करें दाह संस्कार के लिए !”,

…अचानक तन्द्रा टूटी तो देखा अनुग्रह प्रताप सिंह लकदक सफ़ेद कुरता-पायजामे में तैयार खड़े थे, अपने पिता ठाकुर अजय प्रताप सिंह की अंतिम विदा की रस्म अदायगी के लिए ! उसकी पत्नी दूर खड़ी देख रही थी. हाँ, आठ साल का बेटा अनुरूप जरूर अपने दादा के पास खड़ा था, विचलित और अचंभित सा– क्योंकि जन्म-मृत्यु के विस्तृत रिश्तों, और उनकी जटिलताओं से अभी तक परे जो था!

सच है..अपने हिस्से का हिसाब हमें स्वयं ही करना पड़ता है !

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अहसास की किरणें…

कितना भी अकेला हूँ…
भले ही मैं…
तेरे अहसास की किरणें…
सूरज की जलती गर्मी से छिटक…
सुनहरे धागों से बुनी…
चादर बन…
खुशनुमा अहसास के साथ …
होती हैं पास मेरे…
हमेशा.

….और,
अंधेरों में…
ढूंढ ही लेता है…
यह एकाकी जीवन…
तुमसा साथी अपना…
अनगिनत चमकते…
जुगनुओं-से तारों…
और एक अदद…
चाँद, और जगमग सितारों की…
दिलकश रोशनियों में भी.

इन बारिशों का भी…
भरोसा कब है…
अपने से बरसती हैं…
हमेशा से यह तो,
इनकी राह देखोगे…
तो प्यासे रह जाओगे…
तुम भी…
किन्हीं अनजान…
चाहतों की तरह.

मेरी तन्हाइयां मुस्कुराती हैं…
तेरी सरगोशियों और…
कुछ ऐसे जुनून पर…
जो मुमकिन नहीं यूँ तो…
किसी वक्त…
हर किसी के लिए भी
पर तेरे प्यार में..
वो कौन सी बात है…
जो मुमकिन नहीं.

तेरी हर बात में…
तेरे प्यार का अक्स दिखता है…
इक सादगी का…
कुछ अनकही सी…
छिपाई गई…
उन बातों का…
जिनसे बना है यह…
इक हसीं जुनूँ तेरा…
पता है तुझको भी…
कि छिप न सकेगा यूँ कभी…
प्यार वह…
जो तेरे दिल में है.

अलहदा है तू यूँ भी…
उन्मुक्त और स्वछन्द-सी…
पर…
बंद कमरों में भी…
कसमसाते हैं…
दरवाजों केे चौखट,
और खिड़कियां के शीशे…
चटखना चाहते हों जैसे…
बंद हैं घर के…
वह तमाम रस्ते,
जिनसे लेते थे…
सांसें कभी…
हवाओं पे पहरा भी,
है बहुत गहरा…
तन्हाइयों का मौसम रहा वह …
और था सिर्फ उदासियों का घेरा !

जितना आना था…
आ चुका दौर..
उस इंकलाब का…
जब सुनाना हो तुमको…
अपना फलसफा…
रुमानियत को तुम…
कर देना दफ़न…
गहराई में जाकर…
तुम्हारी आत्मा से है…
मिलन मेरा…
कुछ जुदा सा है…
यह रिश्ता…
मन में नज़ाकत नहीं…
ताकत है अभी…
और हौसलों में उड़ान भी…
जिंदगी तेरी है यह…
किसी से कर्ज पर तो नहीं.

चाँद तारों पे है यकीं गर तुझको…
आग सूरज की भी तो…
सहनी होगी…
रोज-रोज के इम्तिहान से बेहतर…
मेरे सीने में झांक लो…
तुम बस इक बार…
जिंदगी तुमको यूँ तो…
अपनी शर्तों पर लेकिन…
कुछ मेरे प्यार में भी जीनी होगी.
😊😊

बेटी

वो नन्हीं सी गुड़िया,
दुनिया में आई,
रुई-सा बदन,
जैसे पंखुड़ी गुलाब की,
मुस्कुराई वो जब भी,
लगा वसंत ऋतू आई,
अंगुली पकड़ना,
कभी गिरना,
फिर संभलना,
वो खिलखिलाये जब भी,
पुष्प झरते हों जैसे,
उसकी बातें जैसे,
बहती ठंडी हवाएं !

परियों की बातें,
कुछ नानी की यादें,
मेरी आँखों में पढ़ती है,
अब अपना वो बचपन,
कुछ मिट्टी का संग,
कभी चूड़ियों के रंग,
अब भी उसको हैं भाते,
चेहरे पर उसके,
मुस्कुराहट हैं लाते.

सजाती थी वो,
जैसे डॉल को अपनी,
करती है श्रृंगार,
अपने मन का वो आज,
पढ़ती है वो,
पढ़ाती है मुझको,
अपनी बातों के पाठ,
अपनी यादों के साथ,
मां की जैसे,
बनती प्रतिबिम्ब है,
मेरा सदा होती,
सम्बल है वो,
बेटी भी वो,
बेटा भी है,
मेरे विश्वास की,
छाया है वह,
उसमें दिखता है मुझको,
एक अक्स अपना !

वन्दनीय…

देखा है न…
डूबते सूरज को तुमने…
दिन भर की तपन…
असह्य भयावहता…
तीव्र ऊष्मा…
तजता है जब इनको…
शनै: शनै:..
निशा का पहला अध्याय…
बुनता है वह…
कितनी सौम्यता से…
और,
सिमट जाता है…
अपनी प्रकृति में…
हर दिन की तरह…
रजनी का आमंत्रण…
हर लेता है जैसे…
क्रोध को…
स्निग्ध स्नेह से…
आगोश में,
कल फिर दिखेगा…
उषा का जादू…
और क्रोध के रंग…
कुछ सुनहरी-सी…
किरणों के संग…
तेरा आना…
बिखेर देना अपनी लालिमा…
फिर अहसास कुछ अलग…
सख्त-से तेवर…
एक मौन-सी अभिव्यक्ति…
और अंततः अस्त होना…
वंदनीय है…
है देवतुल्य!!

क्षितिज के पार

मल्लीताल में, माल रोड पर नारायण बुक स्टोर खाली समय में मेरे लिए बहुत सुकून की जगह होती है, जहाँ मैं बिना टोका-टाकी या असभ्य लोगों की चिल्ल-पों अथवा पर्यटकों के रंग-बिरंगे परिधानों, हैट और सेल्फी स्टिक से जूझने के अलावा कुछ गंभीर लेखकों की नई पुस्तकों को उलट-पुलट लेता हूँ. जरूरत पड़ने पर इक्का-दुक्का ख़रीददारी भी हो जाती है.

आज भी रविवार का दिन था. इसी लिए उस ओर के लिए कदम बढ़ रहे थे. पर, बुक शॉप से निकलते हुए सृष्टि को देखा तो एकबारगी प्रसन्नता हुई. एक परिचित से अचानक टकरा जाने जैसे भाव भी जरूर आये पर फिर दिमाग ने उन भावों पर तत्काल ही नियंत्रण पा लिया और सहज भाव फिर से मन पर हावी हो गया. उसके पति ने तो शायद मुझे देखा नहीं था, पर बाहर एकबारगी हल्के अँधेरे, और ब्रिटिश युग की नये ज़माने की हल्की पीली रोशनी की छटा में नहाये लैम्पपोस्ट से इस पर्यटक नगरी के मुख्य बाज़ार की रंगीनियों और रौनक में मशगूल सृष्टि की नज़रें मुझसे क्षण भर के लिये ही सही, मिली जरूर थी !

बहुत बड़ा समय होता है न तेरह साल ? न जाने कितने उतार-चढाव ! और कुछ स्मृतियाँ आँखों के सामने सजीव होने लगी.

“मे आई कम इन, सर ?”

एक सॉफ्ट और मीठी नारी स्वर से मैंने अपने कक्ष के मुख्य द्वार की ओर निगाह घुमाई तो साड़ी में अपने शरीर को पूरी तरह से ढंके एक सौम्य नारी की छवि, जो आधे पर्दे के पीछे से झांक रही थी, मुझे दिखाई दी. मेरी सहमति के बाद वह प्रविष्ट हुयी और उतनी ही मधुर आवाज में अपना परिचय दिया. उसकी कॉल थी और फोन मेरे कक्ष में डाइवर्ट था.

…बात सन २००१ की है, जब मैंने प्रतिनियुक्ति पर ज्वाइन किया था, लोक निर्माण विभाग के परिवृत-४ में अधिशासी अभियंता के रूप में, जो इकाई नैनीताल में पिछले दो दशकों से कार्यरत थी और उसने बढ़ते-बढ़ते अब मिनी मुख्यालय का रूप ले लिया था. विभाग में सृष्टि मेरे साथ सहायक अभियंता के पद पर संबद्ध थी. वह उन लगभग १८ अधिकारियों व ४२ कर्मचारियों में से एक थी जिन्हें मुझे रिपोर्ट करना होता था. वह तो बाद में मैं उसको जान पाया, पर न जाने क्यूँ उसको पहली बार में ही देखकर मुझे लगता था कि वह सबसे अलग है, और यह भी कि किसी भी काम के मामले में उस पर भरोसा किया जा सकता था. यकीनन, यह मेरी अंतरात्मा की आवाज थी और इसका कोई भी तार्किक कारण मेरे पास नहीं था.

बाद में मुझे जब भी किसी काम को समझने की या कोई जानकारी करने की जरूरत होती तो सृष्टि को बुलवा लेता. वह भी निस्संकोच अपनी राय देती और आमतौर पर वह राय सही होती थी. अब मेरा स्टाफ भी समझने लगा था…और वह लोग कई बार “अरे, बुलाना उन्हें..” कहने भर से ही गर्दन हिलाकर सृष्टि को उसके प्रथम तल के केबिन से बुलाने निकल पड़ते. मैं भूतल के अपने कक्ष में बैठता था.

…पता नहीं, इस सोच को क्या कहूं. यह दिल है कि मानता ही नहीं—बस देखकर ही फैसला कर लेता है. बार-बार सोचता हूँ, कि आगे से हमेशा दिमाग की सुनूंगा.. लेकिन दिल के भाव कुछ इतने मजबूत हो जाते हैं, कि वह दिमाग की अनदेखी करने पर ही तुला रहता है, हमेशा. तर्क शक्ति क्षीण पड जाती है, और जो सोचा है बस वही ठीक लगता है. अक्सर अतार्किक. वह बात और है कि इस कारण जो धोखे मिले हैं, उसकी फेहरिस्त लम्बी होती जाती है. कुछ दिन उदासीनता. फिर, लगता है कि जिन्दगी में बहुत कुछ है, उससे सहारे खुशियाँ ढूंढी जा सकती हैं, उनमें जिया जा सकता है. लोगों का आना-जाना, सम्बन्ध, विचार यह सब तो तात्कालिक बातें हैं. पर हमेशा मुझे तो क्षितिज के पार ही देखने की इच्छा रहती थी. दूर… जहाँ आकाश और पृथ्वी का मिलन दिखता हो—एक सतरंगी से स्वप्न की भाँति !

एक दिन शहर में अनायास ही बर्फ़बारी की स्थिति बन गई. सृष्टि के पति ने फोन किया. लैंडलाइन फोन मेरे पास ही था. उसका एक्सटेंशन जरूर मेरे पी ए अतुल के पास रहता था. कार्यालय समय के बाद, सामान्यतः वह बता कर निकल जाता और मैं भी उसे तभी रोकता जब कोई वाकई जरूरी काम होता. हाँ, जाने से पहले वह सारी काल्स मेरे नंबर पर डाइवर्ट जरूर कर जाता ताकि कोई कॉल उसके कमरे में अनावश्यक रूप से बजती न रहे और मैं जान भी न पाऊं. वैसे भी उन दिनों केवल लैंडलाइन फोन का ही जमाना था. जन्म जरूर हो चुका था मोबाइल का, पर वह इतना महंगा था कि उसके उपयोग के विषय में सोचना भी मूर्खता थी.

खैर ! बात हो रही थी सृष्टि को आये कॉल की. उसके पति ने फोन किया था, यह बताने के लिये कि वह उसकी प्रतीक्षा करे, क्यूंकि उस इलाके में, जहाँ वह रहते थे, भू-स्खलन का भी खतरा था. अकेला लौटना खतरनाक हो सकता था. वह नगर से थोडा दूर और निर्जन क्षेत्र था, वह लोग जहाँ रहते थे, लगभग चार किलोमीटर दूर, और आज परिवहन के साधन भी लगभग बंद हो चुके थे. वह तेज़ी से बदलते मौसम में उसको लेने आये, और सृष्टि उनके साथ चली गई. अब कई दिन तक मौसम में अप्रत्याशित बदलाव जारी था, तो उनका सृष्टि को छोड़ने और लाने का सिलसिला आरम्भ हो गया.

इस बीच काम की अधिकता और सृष्टि पर मेरी निर्भरता—दोनों में ही तेज़ गति से वृद्धि हो रही थी. किसी काम को समझने के बजाय मैं उसे सृष्टि को सौंपकर निश्चित हो जाता. और हाँ, सृष्टि ने कभी उसमें अपनी जी-जान न लगाई हो, ऐसा मुझे एक बार भी आभास नहीं हुआ. दूसरी खूबी उसकी यह थी कि उसे कोई अभिमान नहीं था, ना अपनी शिक्षा पर, ओहदे पर या अपने काम के प्रति समर्पण की भावना पर. सब कुछ निश्छल था, जिसे उसके चेहरे और आत्मविश्वासयुक्त दर्प से महसूस किया जा सकता था.

नये विभाग की नई और दुरूह-सी कार्य संस्कृति को रातों रात अपनाना किसी के लिये भी संभव नहीं. वह भी मैदानी इलाके से, दुसरे विभाग से आकर नैनीताल जैसे पर्यटक और पहाड़ी क्षेत्र. कई रास्ते तो ऐसे थे जहाँ पर पैदल चलना ज्यादा श्रेयस्कर था, कुछ ऐसे थे कि वहां सरकारी गाडी से जाना ऐसा लगता था की खतरों के खिलाड़ी बनकर जा रहे हों, और न जाने लौट भी पायेंगे या नहीं. पर, जब सृष्टि जैसी सहकर्मी मिली हो, तो मुझे ज्यादा माथा-पच्ची करने की क्या जरूरत थी ! वैसे भी यह मेरा अतिरिक्त कार्यप्रभार था, अपने मूल काम के साथ-साथ. सो, मैं कुछ देर के लिये ही ऑफिस बैठता और कुछ जरूरी फाइलों को निपटाकर आवश्यक निर्देश देकर वापिस अपने दूसरे कार्यालय चला जाता जो इस भवन से डेढ़ किलोमीटर दूर एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित था, जहाँ मुझे विद्युत् विभाग की निर्माण इकाई में अधीक्षण अभियंता का पद प्राप्त था. कई बार जरूर रात के आठ-साढ़े आठ भी बज जाते थे. तब सृष्टि सहित सारा स्टाफ भी रुका रहता, जब तक मैं उन्हें स्वयं जाने को नहीं कह देता.

हालाँकि काम उतना ही था पर अब मेरे रुकने की अवधि बढ़ गई थी. अब मैं अपने मूल ऑफिस के काम को कम समय देने लगा और इस ऑफिस में मेरा ज्यादा समय गुजरने लगा. कब से, यह मुझे पता ही नहीं चला, और क्यों, इसका भी कोई तर्क मेरे पास नहीं था. कई बार तो नौ भी बज जाते पर न तो कोई टोकता, न मैं जल्दी जाने में रुचि दिखाता. अब मुझे समय-समय पर चाय, कॉफ़ी और कभी कुछ स्नैक्स या कटे हुए फल भी सर्व होने लगे. विशिष्ठ विजिटर को आवश्यकतानुसार बिना कहे चाय पिलाना और भी सुखद लगता था. बाद में पता चला की यह सब सृष्टि के प्रबंधन का नतीजा था. मैं अभिभूत हो जाता. कई बार सृष्टि मुझे देर होने पर कुछ जरूरी बातें याद कराती. सारांश में, मेरी ऑफिस की दुनिया सृष्टि के आसपास घूमने लगी, और वह मेरी जरूरतों का भी हिसाब रखने लगी. अच्छा लगने लगा था यह बदलाव मुझे भी.

जनवरी का महीना और सर्दी का मौसम चरम पर. कुछ दिनों बाद फिर वही हुआ. तूफानी और बर्फीली आंधियां आने लगी. स्टाफ के सब लोग जल्दी जाने की बात करने लगे. मुझे अपनी कोई चिंता नहीं था, क्यूंकि मेरा आवास इस ऑफिस से मात्र एक किलोमीटर, नये विकसित क्षेत्र में था, जहाँ न तो रास्तों की कोई दुविधा थी और न ही कोई अन्य समस्या. मैंने स्वयं सृष्टि को बुलाकर उसे घर जाने की अनुमति दे दी थी. वह अपने पति को फोन कर उनके आने की प्रतीक्षा में बाहर चली गई.

अगले दिन वह नहीं आ पाई. दूसरा दिन भी बीत गया. अफ़सोस इस बात का था कि लैंडलाइन फोन भी पिछले कई दिन से डेड था. तीसरे दिन सृष्टि ने किसी के हाथ ऑफिस में अपनी छुट्टी की एप्लीकेशन भिजवाई थी जिसमें उसके वायरल फीवर से बीमार होने का जिक्र था.

चौथे दिन सृष्टि मेरे आने से पहले ही मुझे ऑफिस में दिख गई. वह स्वस्थ लग रही थी, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था. मुझे पता था कि वायरल के बाद लगभग एक सप्ताह इन्सान काम करने योग्य नहीं रहता, पर चौथे दिन ही उसे मौजूद देख कर मुझे अच्छा लगा. मैंने उसे अपने कक्ष में आने को कहा. हालचाल लेने के बाद मैंने उसे औपचारिकतावश कहा,

“अच्छा हुआ आप आज आ गई, फोन डेड था, वर्ना मैं तो आपको पडौस के नंबर पर फोन कर हाल-चाल लेने वाला था आज !”

“अरे सर, हमारी ऐसी किस्मत कहाँ, और अगर आप फोन कर देते तो हमारी तो स्लीपलेस नाइट्स हो जातीं”,

यह कहकर वह मेरी आँखों में झांक कर खिलखिलाकर हंस पड़ी. सर्दी का मौसम और फर का लांग कोट, उस पर काफी फब रहा था. मैं उसकी इस बात और हंसी के लिये तैयार नहीं था और मेरी सकपकाहट मेरी झेंप में दिखी. उसका यह बिंदास रूप मैंने कभी नहीं देखा था. बस, उससे जब भी होती थी, काम की बात. आज वह बिना काम के निस्संकोच सामने की कुर्सी पर बैठ गई. मैंने भी चाय मंगा ली थी, उसके और अपने लिये. बातें चल निकली… उसने बताया कि घर में पति और दो छोटे बच्चों के अलावा सास-ससुर और ननद भी है. छोटा बेटा उसका लगभग एक साल का था जिसे वह कभी आया, कभी पडौस और कभी अपनी मां के हवाले करने के बाद ऑफिस आती थी. सास-ससुर से कोई ख़ास सहयोग नहीं था, माँ शहर के दूसरे छोर पर रहती थी. दो भाई थे उसके मायके में जिनमें से लगातार बीमार बना रहता था, दूसरा अभी बेरोजगार था.

वायरल की बीमारी तो सामान्य मानी जाती है, सबको कभी न कभी होती रहती है. बीमारी से उठकर इन्सान शारीरिक और मानसिक रूप से दुर्बल महसूस करता है, जबकि सृष्टि इसके विपरीत दुरुस्त और अधिक ही आकर्षक लग रही थी. मैंने आज शायद पहली बार उसके नयन-नक्श को गौर से देखने की कोशिश की. वह हमेशा साडी ही पहनती थी. पतली, आकर्षक व छरहरी काया की स्वामिनी कॉटन की ऑरगंजा साड़ी, हाथों में केवल कांच की चूड़ियों तथा बिना किसी अन्य ज्वेलरी में भी वह काफी आकर्षक दिखती थी. आज जरूर साड़ी से अधिक उसका लांग कोट नज़र आ रहा था, जिसने उसके शरीर के ८० प्रतिशत भाग को कायदे से ढक रखा था. उसका साडी बाँधने का स्टाइल कुछ अलग था जिसमें पल्लू से पूरा शरीर ढका रहता और केवल हाथों के किनारे या अंगुलियाँ ही दिखाई पड़ती थी, जिनसे वह साड़ी का किनारा संभाले रखती. बड़ी-बड़ी गोल, सुरमई सी आँखें और हँसते समय गालों में हल्के गड्ढे पड़ने से उसकी हंसी और भी मोहक बन जाती थी. रंग जरूर उसका थोडा सांवला था, लेकिन अच्छे फीचर्स के सामने वह सृष्टि की कृशांगी आकर्षकता को कहीं से भी विपरीत रूप से प्रभावित नहीं करता था.

अब लगभग रोज़ ही कोई न कोई बात व्यक्तिगत भी होने लगी सृष्टि से. अपने काम में निपुण, और अपने विषय में गोल्ड मैडल के बाद भी उसका पिछले सात साल से कोई प्रमोशन नहीं हुआ था, जबकि उसके जूनियर दो-दो प्रमोशन पाकर सृष्टि से वरिष्ठ बन बैठे थे. इस बात को भी उसने खिलखिलाकर बताया मुझे. उसे कोई ख़ास शिकायत नहीं थी किसी से. वह जानती थी कि यह सिस्टम की पेचीदिगियों के कारण है, न कि उससे किसी पूर्वाग्रह के कारण. इस बीच उसने गैर-तकनीकी विषय समाज शास्त्र में शोध के लिये विश्वविद्यालय से अपना पंजीकरण करा लिया था.

उसके पति ने सृष्टि को रोजाना लेने आना तो बंद कर दिया था, पर कभी-कभी वह अचानक गैर-समय अवश्य टपक पड़ता और विचित्र से भावों से अपनी नापसंदगी जाहिर करता दिखता. मैंने उसकी परवाह करनी छोड़ दी थी, उसके रूखे व्यवहार को देखते हुये. उसे मेरी मंगवाई हुई चाय जो पसंद नहीं आती थी. वह वरांडे में चपरासियों और अन्य विजिटर के आस पास या तो बैठा रहता या टहलते हुए अपना समय बिताता.

बाद में सृष्टि से ही पता चला कि रोज-रोज़ के झंझटों के सम्बन्ध में. अन्तत: एक दिन सृष्टि ने बताया कि उसने अपने दोनों बच्चों के साथ अलग रहने का फैसला किया है, और अब वह फैसला अटल है, क्यूंकि पिछले लगभग नौ साल से वह नाकाम से रिश्ते को पल-पल जिन्दा रखने के लिये स्वयं को मारती आ रही थी. अब वह थक चुकी थी. इस फैसले में अभी भी एक ‘सिल्वर लाइनिंग’ यह थी कि सृष्टि अपने दोनों बेटों के साथ अपनी मां के पास ही लौट आई.

…याद करते-करते मैं अतीत में खो सा गया था. कहते हैं कि अतीत की स्मृतियाँ तथा भविष्य की कल्पनाएँ मनुष्य को उसके वर्तमान का आनंद नहीं लेने देती परन्तु, मेरे विचार से वर्तमान में सही तरीके से जीने के लिये अनुकूलता और प्रतिकूलता— दोनों में रम जाना आवश्यक है. यह भी उतना ही जरूरी है कि अतीत को कभी विस्मृत न होने दो, क्यूंकि अतीत का बोध हमें जाने-अनजाने में की गई भूलों से बचाता है…यही सोचते हुये मैं पार्किंग से गाडी निकालकर सीधे घर वापिस चला आया, हालाँकि कुछ अदद खरीदारियां करनी थी मुझे किताबों की, पर वह कार्यक्रम अब टल गया था.

चेंज करने और फ्रेश होने के बाद कुछ हल्का-फुल्का लिखने को मन किया. बहुत कोशिश की, पर पेन ने साथ नहीं दिया, सो निढाल होकर बेड पर आ लेटा ! पत्नी बिना कुछ बोले एक कप चाय और दो बिस्कुट रख गई. मैंने एक मुस्कान के साथ उसकी ओर देखा तो वह भी मुस्कुराकर अपने काम में फिर से व्यस्त होने के लिये जाने लगी. मैंने हौले से उसके हाथ को पकड़ लिया, पर यह क्या! वैदेही शायद इसके लिये तैयार नहीं थी. वह पहले चौंकी, फिर शरारतपूर्ण ढंग से अपने को बचाकर, छिटक कर दूर दरवाजे की ओर चली गई और वहीँ से बोली.

“क्या बात, आज बहुत प्यार उमड़ रहा है ?”,

और वैदेही के उस प्रश्न में छिपे आश्चर्य का उत्तर शायद मेरे पास था भी नहीं. आज बहुत दिनों बाद प्रेम पर चिंतन का मन हुआ. लगा कि दरअसल, भावनाएं पत्थर नहीं होतीं, वे गुलाब के फूलों की भांति होती हैं. आप प्रेम दोगे तो प्रेम मिलेगा, हो सकता है पत्थर का बदला आपको पत्थर से नहीं मिले, पर यह उस इंसान की सदाशयता है, और आपका संयोग ! यह बात अब मेरी समझ में आने लगी थी, वैदेही के ही सरल ज्ञान के माध्यम से !

….यादें फिर हावी होने लगीं. लगा कि आज का दिन सृष्टि और उसकी यादों को ही समर्पित रहने वाला है. या तो वर्षों से उससे अभिवादन या “हाय!” तक भी नहीं हुआ था, और आज— जी, आज तो उसकी यादों के पन्ने स्वतः खुलते जा रहे थे. मुझे भी इन पन्नों में अपना वो अतीत ढूँढने की उत्सुकता हो आई, जिनके कारण आज मुझे कुछ ग्लानि और कुछ अपराध-बोध कई वर्षों से हो रहा था, और वह अपराध बोध कई तरफ़ा था. पत्नी की जब जानकारी में आया था कि मेरी सृष्टि से अंतरंगता बढ़ रही है, तो उसने मुझे समझाया था कि इस सम्बन्ध से कोई प्रसन्न नहीं रह सकता, न तुम, न मैं, न बच्चे और ना ही सृष्टि स्वयं और उसका परिवार ! उसका कहना था कि यह संबध प्रेम है ही नहीं और दैहिक आकर्षण भले ही क्षणिक सुख दे, लेकिन आजन्म ऐसी टीस छोड़ जाता है कि पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ नहीं दीखता. उस समय मुझे पत्नी की इन बातों से बहुत चिढ लगती थी क्यूंकि जो दिखता है वह हमेशा सच हो, यह जरूरी नहीं है. असलियत यह भी थी कि मेरा और सृष्टि का सम्बन्ध प्रेम का था या नहीं, यह तो तब तक स्पष्ट नहीं था, पर हां, यकीनन यह मात्र दैहिक आकर्षण नहीं था. यह बात या तो मैं जानता हूँ या सृष्टि, कि हम दोनों में अंतरंगता के बावजूद और भरपूर अवसर के बाद भी कोई भी ऐसा सम्बन्ध स्थापित नहीं हुआ था जिसे आम भाषा में स्त्री-पुरुष का स्वाभाविक आकर्षण अथवा प्यार की परिणति कहा जाता था. मैं स्वयं इस बात के लिये बहुत सतर्क था कि उसका और मेरा मित्रभाव उस मोड़ पर न पहुँच जाये जिसे भटकाव कहते हैं और उस अंधी गली से निकलना बहुत जटिल हो जाता है. इस द्वंद ने मुझे हालाँकि बहुत जटिल स्थिति में रख दिया था पर दिमाग के सामने हमेशा दिल ही जीतता था. अंतरंगता के बावजूद सृष्टि की ओर से ऐसा कोई आमंत्रण भाव भी मैंने उसकी आँखों में नहीं पढ़ा था.

इसी सब झुंझलाहट में कई बार इस प्रसंग के भटकाव और सृष्टि की ओर से भी मन में वितृष्णा के भाव आते थे, परन्तु ऑफिस पहुंचे-पहुँचते फिर से सब सामान्य हो जाता. सृष्टि की भूमिका कई बार मुझे बहुत मासूम लगती और जो भी हो रहा था उसके लिये मैं उससे अधिक स्वयं को दोषी मानता. उसके और मेरे बीच कोई प्रेम-रहित सम्बन्ध नहीं थे, पर असामाजिक सम्बन्ध भी नहीं थे, इसलिये मैं अपने ऊपर उठती अँगुलियों को लेकर अधिक चिंतित नहीं था, बल्कि बेपरवाह हो गया था. इसे वह स्थिति कह सकते हैं जिसमे इंसान अपनी सुविधानुसार मानक तय करता है, नैतिक मूल्यों के !

कभी चोर मन में लगता कि सृष्टि में भी अपना भविष्य खोजा जा सकता है. क्या नहीं है उसमें जिसकी कल्पना मेरे अवचेतन में बचपन से रही है? तब यह भी लगता था कि ओशो ने सही कहा है कि सभी मनुष्य प्रेम करने के पात्र हैं. एक ही व्यक्ति के साथ आजीवन बंधकर रहने की जरूरत नहीं है. यह एक कारण है कि दुनिया में लोग इतने ऊबे हुए क्यों लगते हैं. वे तुम जैसे हंस क्यों नहीं सकते? वे तुम्हारी तरह नाच क्यों नहीं सकते? वे अदृश्य जंजीरों से बंधे हैं जैसे परिवार, पति, पत्नी, बच्चे. वे हर तरह के कर्तव्यों, जिम्मेदारियों और त्याग के बोझ तले दबे हैं, और तुम चाहते हो कि वे हंसें, मुस्कुराएं, और आनंद मनाएं? तुम असंभव की मांग कर रहे हो. लोगों के प्रेम को स्वतंत्र करो, लोगों को मालकियत से मुक्त करो. लेकिन यह तभी होता है जब तुम ध्यान में अपने अंतर्मन को खोजते हो. इस प्रेम का अभ्यास नहीं किया जा सकता, इसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है…. तब तक मैंने कभी ओशो के विचार जानने का कोई प्रयास भी नहीं किया था.

पर, अगले ही पल मैं इस कल्पना को भी पाप मानने लगता और इस ख्याल को जबरिया अपने दिमाग से दूर निकाल फेंकता. दरअसल, जब आप वास्तव में किसी से प्रेम करते हैं तो आप अपना व्यक्तित्व, अपनी पसंद-नापसंद अपना सब कुछ समर्पित करने के लिए तैयार होते हैं और यह बात हमें लचीला बनाती है. जब वह प्रेम नहीं होता, तो लोग कठोर होने में सुविधा महसूस करते हैं. परन्तु, जैसे ही वे किसी से प्रेम करने लगते हैं, तो वे हर जरूरत के अनुसार स्वयं को ढालने के लिए तैयार हो जाते हैं. यह अपने आप में एक अद्भुत, चमत्कारिक और यूँ कहें कि एक शानदार आध्यात्मिक प्रक्रिया है, क्योंकि इस तरह आपके स्वभाव में आधारभूत तथा परिपूर्ण परिवर्तन आते हैं. आपको जीवन में तरह-तरह के रंग दिखने लगते हैं. प्रेम निस्संदेह स्वयं को मिटाने वाला है और यही इसका सबसे खूबसूरत पहलू भी कहा जा सकता है, जरूरी नहीं कि प्रेम खुद को मिटाने वाला ही हो, यह महज विनाशक भी हो सकता है. जिसे आप ’मैं’ कहते हैं, जो आपका सख्त व्यक्तित्व है, प्रेम की प्रक्रिया में उसका विनाश होता है, और यही स्वयं को मिटाना है. लेकिन दुर्भाग्यवश यह न तो प्रेम था न अप्रेम. यह असमंजस था, जिसने मुझे अनिर्णय की स्थिति में ला खड़ा किया था और इसकी हवा अब मेरे और सृष्टि के घरों तक जा पहुंची थी जो मेरे लिये भी विनाशकारी हो रही थी. संदेह, अनिश्चय और कलह का वातावरण मेरे लिये कष्टकर होने लगा था उधर ऑफिस में भी फ़ैल रही कुछ चर्चाएँ कानों तक पहुँचने लगी थी.

घर पर न जाने कितनी बार पत्नी की चीख–चिल्लाहटों और तानों से मैं परेशान आ चुका था. जबकि असलियत अभी भी यही थी कि सृष्टि और मैं मात्र अच्छे मित्र थे. इस रिश्ते से इतर हमरे प्रेम की सुगबुगाहट तो अभी न मेरे दिल ने सुनी थी और शायद न ही सृष्टि को ऐसा भी कोई आभास हुआ होगा. पर, जब भी फुर्सत होती तो सृष्टि और वैदेही की तुलना अपने आप होने लगती..एक तरफ चीख-चिल्लाहट और जली-भुनी बातें, दूसरी तरफ सौम्य, प्रसन्नचित्त और स्वयं में सम्पूर्ण-सी दिखती सृष्टि !

इसी ऊहापोह में न जाने कब एक साल बीतने को था. अब मैंने कुछ कडा निर्णय लेने का निश्चय किया. वैसे भी मेरा प्रतिनियुक्ति का समय पूरा हो रहा था. साथ में मेरे पास भारत सरकार में एक और प्रतिनियुक्ति का ऑफर मौजूद था. मैंने न घर बताया, न सृष्टि को, और विभाग से अपनी विदाई की तैयारी कर ली. दो दिन पहले मैंने यह रहस्योद्घाटन किया तो काफी हलचल हुई, हर जगह, जैसाकि प्रत्याशित भी था. सृष्टि भी इस अचानक हुए घटनाक्रम से विचलित हुई, पर मुझे कुछ और करना नहीं था. अब तो मुझे विभाग को रिलीव करना था और दिल्ली जाकर मुझे नये पद पर ज्वाइन करना था.

ठीक तीसरे दिन, ०२ अप्रैल को, मैंने दिल्ली के शास्त्री भवन में मानव संसाधन विभाग के संस्कृति प्रकोष्ठ में परियोजना निदेशक के पद पर अपना योगदान दे दिया. परिवार को भी मैं यहाँ साथ ही ले आया था. मैंने एक सप्ताह में ही कार्यालय और नए जॉब की जिम्मेदारियों को काफी अच्छे से समझ लिया था. यह मेरी दूसरी पारी था और मेरा इरादा नई स्लेट पर नई इबारत लिखकर अपनी जिन्दगी को फिर से बेहतर और पारिवारिक जीवन को खुशनुमा बनाने का था.

नैनीताल से लगभग ३०० किलोमीटर दूर अपनी नई पारी तो मैं आरम्भ कर चुका था, पर इसका अर्थ यह कतई नहीं था कि मैं सृष्टि से बचकर चोरों की तरह भाग आया था. मैं उससे सम्पर्क में अवश्य बना रहा, लेकिन यह भी व्यवहारिक तथ्य है कि दूर के रिश्ते टिकाऊ नहीं रह पाते, और तब जबकि आप किसी रिश्ते से दूरी बनाना चाहते हैं, तो उनका निष्प्रयोज्य होना स्वाभाविक व नैसर्गिक प्रक्रिया बन जाता है. धीरे-धीरे फोन कॉल्स की संख्या घटने लगी, फिर कॉल की अवधि भी घटी और दिन से हफ़्तों, महीनों पर बात आ गई. अब कोई विशेष बात होती तो ही उसका फोन आता था. उधर मैं भी अपने काम में बहुत व्यस्त हो गया था.

इस बीच जो बात मुझे उलझन में डालती रही वह सृष्टि के प्रति मेरी सोच और उसको लेकर आत्मग्लानि थी. मुझे लगता था कि उसे मैंने मंझधार में छोड़ दिया था. हालाँकि यह भी उतना ही सच था कि इस रिश्ते को किसी बेहतर परिणिति पर ले जाने का न तो मेरा उद्देश्य था, न ही साहस. कई बार लगता था कि समय और परिस्थितियां सृष्टि के मार्ग को स्वयं प्रशस्त कर देंगी, और मुझे यह सोचकर ही सूकून सा मिल जाता.

… सृष्टि का बुक स्टोर में दिखना कल की ही तो बात थी. मुझे आज का दिन और भी अच्छा लगा. आज फिर मैंने मॉल रोड का रुख किया, और नारायण बुक डिपो पहुंचकर वहां से जाकर अपनी पसंद की चार अदद पुस्तकें छांटी, उनके अंश पढ़े, काउंटर पर रु ४३८ का भुगतान किया और बांस के कागज़ के लिफाफे में रखवा कर बाहर का रुख किया. नजदीक ही हनुमान मंदिर में आरती के बोल, घंटों और घंटियों की मिश्रित आवाजें, गैंदे के फूल और मालाओं की सुगंध, आस-पास के अव्यवस्थित तथा धीमे-से ट्रैफिक के बीच रेंगती जिंदगियां कभी पर्यटकों की बातों और वेंडर्स की चिल्ल-पों पर भारी पड़ने लगी थी. मंदिर के बाहर प्रसाद लेने वालों को कुछ लोग श्रद्धा सुमन के रूप में बेसन के लड्डू और गुल्दाने का भोग प्रसाद के रूप में वितरित कर रहे थे. मैले-कुचैले वस्त्र धारण किये तथा भिखारीनुमा बच्चों की ही भरमार दिख रही थी.

…पहले मैं रुका, फिर मैंने निश्चय किया और मंदिर के बाहर से रु ५०१ का प्रसाद तथा गेंदे की माला खरीदी. भक्तों की भीड़ से रास्ता बनाते हुये लगभग चार मिनट में, मैं मंदिर की मुख्यमूर्ति तक पहुँच गया था. पुजारी जी को सामग्री दे, टीका लगवाकर और प्रसाद पाकर मैं निश्चिन्त वापिस लौटने लगा. प्रसाद मैंने वहां बच्चों की भीड़ में ही बाँट दिया और केवल थोडा सा अंश लेकर घर लौटते हुए लगा कि आज शरीर और आत्मा दोनों हल्के हो गये हैं. लग रहा था कि मैंने स्वयं को पा लिया था, वापिस, अपने अतीत से ! यहाँ स्नेह भी था, प्रेम भाव भी था और लचीलापन भी. बस, अब मेरा दृष्टिकोण बदल गया था, और मुझे घर का वातावरण भी खुशनुमा लगने लगा था. और सृष्टि भी प्रसन्न दिख रही थी न ? उसकी भी दूसरी पारी अच्छी तरह चलने का मुझे सुबूत दिख गया था.

मेरा अपराधबोध उड़न-छू हो गया था और मैंने पत्नी के लिये आर्चीस गैलरी से एक बिना किसी अवसर वाला एक खूबसूरत कार्ड खरीदा. उस पर लिखे सन्देश वाले पृष्ठ को निकल कर दुकानदार को वापिस किया और उससे मांगकर एक कोरा कागज़ इन्सर्ट किया. उस पर जो पंक्तियाँ मैंने लिखी वह यूँ थी-

“…प्रेम निश्छल था तुम्हारा,
सदा समर्पित हर पल,
मेरे मन की दुविधा थी वह,
पीता रहा जब मैं कोलाहल,
न दुविधा है, अब न कोई द्वन्द,
तुम हो और सिर्फ तुम रहोगी,
अब इस निर्मल मन.. !”

…मैंने देखा, पत्नी चाय बनाने गयी थी, पर चाय बने, उससे पहले वह मेरे कार्ड और उसकी पंक्तियों को पढने का लोभ संवरण न कर पायी. मैं धीरे से, दबे पाँव पीछे आकर खड़ा हो गया. वह गौर से उन्हीं पंक्तियों में खोयी थी. अचानक मुड़कर मुझे देखा वैदेही ने. उसकी आंखें डबडबा आई थी. मैंने कुछ कहे बिना उसे हौले से अपने सीने से लगा लिया. पिछले वर्षों में जो कुछ जाने-अनजाने में मुझसे हुआ था, उसकी ग्लानि कुछ कम हुई लग रही थी.

और हो क्यों न, इस खूबसूरत जीवन की दूसरी पारी जो आरम्भ हो गयी थी. किचन की खिड़की से बाहर देखा तो लगा कि काफी नीचे रुई जैसे उड़ रहे सफ़ेद-आसमानी बादल अचल आकाश की नीली पृष्ठभूमि में बहुत ही रूमानी लग रहे थे.

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