मल्लीताल में, माल रोड पर नारायण बुक स्टोर खाली समय में मेरे लिए बहुत सुकून की जगह होती है, जहाँ मैं बिना टोका-टाकी या असभ्य लोगों की चिल्ल-पों अथवा पर्यटकों के रंग-बिरंगे परिधानों, हैट और सेल्फी स्टिक से जूझने के अलावा कुछ गंभीर लेखकों की नई पुस्तकों को उलट-पुलट लेता हूँ. जरूरत पड़ने पर इक्का-दुक्का ख़रीददारी भी हो जाती है.

आज भी रविवार का दिन था. इसी लिए उस ओर के लिए कदम बढ़ रहे थे. पर, बुक शॉप से निकलते हुए सृष्टि को देखा तो एकबारगी प्रसन्नता हुई. एक परिचित से अचानक टकरा जाने जैसे भाव भी जरूर आये पर फिर दिमाग ने उन भावों पर तत्काल ही नियंत्रण पा लिया और सहज भाव फिर से मन पर हावी हो गया. उसके पति ने तो शायद मुझे देखा नहीं था, पर बाहर एकबारगी हल्के अँधेरे, और ब्रिटिश युग की नये ज़माने की हल्की पीली रोशनी की छटा में नहाये लैम्पपोस्ट से इस पर्यटक नगरी के मुख्य बाज़ार की रंगीनियों और रौनक में मशगूल सृष्टि की नज़रें मुझसे क्षण भर के लिये ही सही, मिली जरूर थी !

बहुत बड़ा समय होता है न तेरह साल ? न जाने कितने उतार-चढाव ! और कुछ स्मृतियाँ आँखों के सामने सजीव होने लगी.

“मे आई कम इन, सर ?”

एक सॉफ्ट और मीठी नारी स्वर से मैंने अपने कक्ष के मुख्य द्वार की ओर निगाह घुमाई तो साड़ी में अपने शरीर को पूरी तरह से ढंके एक सौम्य नारी की छवि, जो आधे पर्दे के पीछे से झांक रही थी, मुझे दिखाई दी. मेरी सहमति के बाद वह प्रविष्ट हुयी और उतनी ही मधुर आवाज में अपना परिचय दिया. उसकी कॉल थी और फोन मेरे कक्ष में डाइवर्ट था.

…बात सन २००१ की है, जब मैंने प्रतिनियुक्ति पर ज्वाइन किया था, लोक निर्माण विभाग के परिवृत-४ में अधिशासी अभियंता के रूप में, जो इकाई नैनीताल में पिछले दो दशकों से कार्यरत थी और उसने बढ़ते-बढ़ते अब मिनी मुख्यालय का रूप ले लिया था. विभाग में सृष्टि मेरे साथ सहायक अभियंता के पद पर संबद्ध थी. वह उन लगभग १८ अधिकारियों व ४२ कर्मचारियों में से एक थी जिन्हें मुझे रिपोर्ट करना होता था. वह तो बाद में मैं उसको जान पाया, पर न जाने क्यूँ उसको पहली बार में ही देखकर मुझे लगता था कि वह सबसे अलग है, और यह भी कि किसी भी काम के मामले में उस पर भरोसा किया जा सकता था. यकीनन, यह मेरी अंतरात्मा की आवाज थी और इसका कोई भी तार्किक कारण मेरे पास नहीं था.

बाद में मुझे जब भी किसी काम को समझने की या कोई जानकारी करने की जरूरत होती तो सृष्टि को बुलवा लेता. वह भी निस्संकोच अपनी राय देती और आमतौर पर वह राय सही होती थी. अब मेरा स्टाफ भी समझने लगा था…और वह लोग कई बार “अरे, बुलाना उन्हें..” कहने भर से ही गर्दन हिलाकर सृष्टि को उसके प्रथम तल के केबिन से बुलाने निकल पड़ते. मैं भूतल के अपने कक्ष में बैठता था.

…पता नहीं, इस सोच को क्या कहूं. यह दिल है कि मानता ही नहीं—बस देखकर ही फैसला कर लेता है. बार-बार सोचता हूँ, कि आगे से हमेशा दिमाग की सुनूंगा.. लेकिन दिल के भाव कुछ इतने मजबूत हो जाते हैं, कि वह दिमाग की अनदेखी करने पर ही तुला रहता है, हमेशा. तर्क शक्ति क्षीण पड जाती है, और जो सोचा है बस वही ठीक लगता है. अक्सर अतार्किक. वह बात और है कि इस कारण जो धोखे मिले हैं, उसकी फेहरिस्त लम्बी होती जाती है. कुछ दिन उदासीनता. फिर, लगता है कि जिन्दगी में बहुत कुछ है, उससे सहारे खुशियाँ ढूंढी जा सकती हैं, उनमें जिया जा सकता है. लोगों का आना-जाना, सम्बन्ध, विचार यह सब तो तात्कालिक बातें हैं. पर हमेशा मुझे तो क्षितिज के पार ही देखने की इच्छा रहती थी. दूर… जहाँ आकाश और पृथ्वी का मिलन दिखता हो—एक सतरंगी से स्वप्न की भाँति !

एक दिन शहर में अनायास ही बर्फ़बारी की स्थिति बन गई. सृष्टि के पति ने फोन किया. लैंडलाइन फोन मेरे पास ही था. उसका एक्सटेंशन जरूर मेरे पी ए अतुल के पास रहता था. कार्यालय समय के बाद, सामान्यतः वह बता कर निकल जाता और मैं भी उसे तभी रोकता जब कोई वाकई जरूरी काम होता. हाँ, जाने से पहले वह सारी काल्स मेरे नंबर पर डाइवर्ट जरूर कर जाता ताकि कोई कॉल उसके कमरे में अनावश्यक रूप से बजती न रहे और मैं जान भी न पाऊं. वैसे भी उन दिनों केवल लैंडलाइन फोन का ही जमाना था. जन्म जरूर हो चुका था मोबाइल का, पर वह इतना महंगा था कि उसके उपयोग के विषय में सोचना भी मूर्खता थी.

खैर ! बात हो रही थी सृष्टि को आये कॉल की. उसके पति ने फोन किया था, यह बताने के लिये कि वह उसकी प्रतीक्षा करे, क्यूंकि उस इलाके में, जहाँ वह रहते थे, भू-स्खलन का भी खतरा था. अकेला लौटना खतरनाक हो सकता था. वह नगर से थोडा दूर और निर्जन क्षेत्र था, वह लोग जहाँ रहते थे, लगभग चार किलोमीटर दूर, और आज परिवहन के साधन भी लगभग बंद हो चुके थे. वह तेज़ी से बदलते मौसम में उसको लेने आये, और सृष्टि उनके साथ चली गई. अब कई दिन तक मौसम में अप्रत्याशित बदलाव जारी था, तो उनका सृष्टि को छोड़ने और लाने का सिलसिला आरम्भ हो गया.

इस बीच काम की अधिकता और सृष्टि पर मेरी निर्भरता—दोनों में ही तेज़ गति से वृद्धि हो रही थी. किसी काम को समझने के बजाय मैं उसे सृष्टि को सौंपकर निश्चित हो जाता. और हाँ, सृष्टि ने कभी उसमें अपनी जी-जान न लगाई हो, ऐसा मुझे एक बार भी आभास नहीं हुआ. दूसरी खूबी उसकी यह थी कि उसे कोई अभिमान नहीं था, ना अपनी शिक्षा पर, ओहदे पर या अपने काम के प्रति समर्पण की भावना पर. सब कुछ निश्छल था, जिसे उसके चेहरे और आत्मविश्वासयुक्त दर्प से महसूस किया जा सकता था.

नये विभाग की नई और दुरूह-सी कार्य संस्कृति को रातों रात अपनाना किसी के लिये भी संभव नहीं. वह भी मैदानी इलाके से, दुसरे विभाग से आकर नैनीताल जैसे पर्यटक और पहाड़ी क्षेत्र. कई रास्ते तो ऐसे थे जहाँ पर पैदल चलना ज्यादा श्रेयस्कर था, कुछ ऐसे थे कि वहां सरकारी गाडी से जाना ऐसा लगता था की खतरों के खिलाड़ी बनकर जा रहे हों, और न जाने लौट भी पायेंगे या नहीं. पर, जब सृष्टि जैसी सहकर्मी मिली हो, तो मुझे ज्यादा माथा-पच्ची करने की क्या जरूरत थी ! वैसे भी यह मेरा अतिरिक्त कार्यप्रभार था, अपने मूल काम के साथ-साथ. सो, मैं कुछ देर के लिये ही ऑफिस बैठता और कुछ जरूरी फाइलों को निपटाकर आवश्यक निर्देश देकर वापिस अपने दूसरे कार्यालय चला जाता जो इस भवन से डेढ़ किलोमीटर दूर एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित था, जहाँ मुझे विद्युत् विभाग की निर्माण इकाई में अधीक्षण अभियंता का पद प्राप्त था. कई बार जरूर रात के आठ-साढ़े आठ भी बज जाते थे. तब सृष्टि सहित सारा स्टाफ भी रुका रहता, जब तक मैं उन्हें स्वयं जाने को नहीं कह देता.

हालाँकि काम उतना ही था पर अब मेरे रुकने की अवधि बढ़ गई थी. अब मैं अपने मूल ऑफिस के काम को कम समय देने लगा और इस ऑफिस में मेरा ज्यादा समय गुजरने लगा. कब से, यह मुझे पता ही नहीं चला, और क्यों, इसका भी कोई तर्क मेरे पास नहीं था. कई बार तो नौ भी बज जाते पर न तो कोई टोकता, न मैं जल्दी जाने में रुचि दिखाता. अब मुझे समय-समय पर चाय, कॉफ़ी और कभी कुछ स्नैक्स या कटे हुए फल भी सर्व होने लगे. विशिष्ठ विजिटर को आवश्यकतानुसार बिना कहे चाय पिलाना और भी सुखद लगता था. बाद में पता चला की यह सब सृष्टि के प्रबंधन का नतीजा था. मैं अभिभूत हो जाता. कई बार सृष्टि मुझे देर होने पर कुछ जरूरी बातें याद कराती. सारांश में, मेरी ऑफिस की दुनिया सृष्टि के आसपास घूमने लगी, और वह मेरी जरूरतों का भी हिसाब रखने लगी. अच्छा लगने लगा था यह बदलाव मुझे भी.

जनवरी का महीना और सर्दी का मौसम चरम पर. कुछ दिनों बाद फिर वही हुआ. तूफानी और बर्फीली आंधियां आने लगी. स्टाफ के सब लोग जल्दी जाने की बात करने लगे. मुझे अपनी कोई चिंता नहीं था, क्यूंकि मेरा आवास इस ऑफिस से मात्र एक किलोमीटर, नये विकसित क्षेत्र में था, जहाँ न तो रास्तों की कोई दुविधा थी और न ही कोई अन्य समस्या. मैंने स्वयं सृष्टि को बुलाकर उसे घर जाने की अनुमति दे दी थी. वह अपने पति को फोन कर उनके आने की प्रतीक्षा में बाहर चली गई.

अगले दिन वह नहीं आ पाई. दूसरा दिन भी बीत गया. अफ़सोस इस बात का था कि लैंडलाइन फोन भी पिछले कई दिन से डेड था. तीसरे दिन सृष्टि ने किसी के हाथ ऑफिस में अपनी छुट्टी की एप्लीकेशन भिजवाई थी जिसमें उसके वायरल फीवर से बीमार होने का जिक्र था.

चौथे दिन सृष्टि मेरे आने से पहले ही मुझे ऑफिस में दिख गई. वह स्वस्थ लग रही थी, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था. मुझे पता था कि वायरल के बाद लगभग एक सप्ताह इन्सान काम करने योग्य नहीं रहता, पर चौथे दिन ही उसे मौजूद देख कर मुझे अच्छा लगा. मैंने उसे अपने कक्ष में आने को कहा. हालचाल लेने के बाद मैंने उसे औपचारिकतावश कहा,

“अच्छा हुआ आप आज आ गई, फोन डेड था, वर्ना मैं तो आपको पडौस के नंबर पर फोन कर हाल-चाल लेने वाला था आज !”

“अरे सर, हमारी ऐसी किस्मत कहाँ, और अगर आप फोन कर देते तो हमारी तो स्लीपलेस नाइट्स हो जातीं”,

यह कहकर वह मेरी आँखों में झांक कर खिलखिलाकर हंस पड़ी. सर्दी का मौसम और फर का लांग कोट, उस पर काफी फब रहा था. मैं उसकी इस बात और हंसी के लिये तैयार नहीं था और मेरी सकपकाहट मेरी झेंप में दिखी. उसका यह बिंदास रूप मैंने कभी नहीं देखा था. बस, उससे जब भी होती थी, काम की बात. आज वह बिना काम के निस्संकोच सामने की कुर्सी पर बैठ गई. मैंने भी चाय मंगा ली थी, उसके और अपने लिये. बातें चल निकली… उसने बताया कि घर में पति और दो छोटे बच्चों के अलावा सास-ससुर और ननद भी है. छोटा बेटा उसका लगभग एक साल का था जिसे वह कभी आया, कभी पडौस और कभी अपनी मां के हवाले करने के बाद ऑफिस आती थी. सास-ससुर से कोई ख़ास सहयोग नहीं था, माँ शहर के दूसरे छोर पर रहती थी. दो भाई थे उसके मायके में जिनमें से लगातार बीमार बना रहता था, दूसरा अभी बेरोजगार था.

वायरल की बीमारी तो सामान्य मानी जाती है, सबको कभी न कभी होती रहती है. बीमारी से उठकर इन्सान शारीरिक और मानसिक रूप से दुर्बल महसूस करता है, जबकि सृष्टि इसके विपरीत दुरुस्त और अधिक ही आकर्षक लग रही थी. मैंने आज शायद पहली बार उसके नयन-नक्श को गौर से देखने की कोशिश की. वह हमेशा साडी ही पहनती थी. पतली, आकर्षक व छरहरी काया की स्वामिनी कॉटन की ऑरगंजा साड़ी, हाथों में केवल कांच की चूड़ियों तथा बिना किसी अन्य ज्वेलरी में भी वह काफी आकर्षक दिखती थी. आज जरूर साड़ी से अधिक उसका लांग कोट नज़र आ रहा था, जिसने उसके शरीर के ८० प्रतिशत भाग को कायदे से ढक रखा था. उसका साडी बाँधने का स्टाइल कुछ अलग था जिसमें पल्लू से पूरा शरीर ढका रहता और केवल हाथों के किनारे या अंगुलियाँ ही दिखाई पड़ती थी, जिनसे वह साड़ी का किनारा संभाले रखती. बड़ी-बड़ी गोल, सुरमई सी आँखें और हँसते समय गालों में हल्के गड्ढे पड़ने से उसकी हंसी और भी मोहक बन जाती थी. रंग जरूर उसका थोडा सांवला था, लेकिन अच्छे फीचर्स के सामने वह सृष्टि की कृशांगी आकर्षकता को कहीं से भी विपरीत रूप से प्रभावित नहीं करता था.

अब लगभग रोज़ ही कोई न कोई बात व्यक्तिगत भी होने लगी सृष्टि से. अपने काम में निपुण, और अपने विषय में गोल्ड मैडल के बाद भी उसका पिछले सात साल से कोई प्रमोशन नहीं हुआ था, जबकि उसके जूनियर दो-दो प्रमोशन पाकर सृष्टि से वरिष्ठ बन बैठे थे. इस बात को भी उसने खिलखिलाकर बताया मुझे. उसे कोई ख़ास शिकायत नहीं थी किसी से. वह जानती थी कि यह सिस्टम की पेचीदिगियों के कारण है, न कि उससे किसी पूर्वाग्रह के कारण. इस बीच उसने गैर-तकनीकी विषय समाज शास्त्र में शोध के लिये विश्वविद्यालय से अपना पंजीकरण करा लिया था.

उसके पति ने सृष्टि को रोजाना लेने आना तो बंद कर दिया था, पर कभी-कभी वह अचानक गैर-समय अवश्य टपक पड़ता और विचित्र से भावों से अपनी नापसंदगी जाहिर करता दिखता. मैंने उसकी परवाह करनी छोड़ दी थी, उसके रूखे व्यवहार को देखते हुये. उसे मेरी मंगवाई हुई चाय जो पसंद नहीं आती थी. वह वरांडे में चपरासियों और अन्य विजिटर के आस पास या तो बैठा रहता या टहलते हुए अपना समय बिताता.

बाद में सृष्टि से ही पता चला कि रोज-रोज़ के झंझटों के सम्बन्ध में. अन्तत: एक दिन सृष्टि ने बताया कि उसने अपने दोनों बच्चों के साथ अलग रहने का फैसला किया है, और अब वह फैसला अटल है, क्यूंकि पिछले लगभग नौ साल से वह नाकाम से रिश्ते को पल-पल जिन्दा रखने के लिये स्वयं को मारती आ रही थी. अब वह थक चुकी थी. इस फैसले में अभी भी एक ‘सिल्वर लाइनिंग’ यह थी कि सृष्टि अपने दोनों बेटों के साथ अपनी मां के पास ही लौट आई.

…याद करते-करते मैं अतीत में खो सा गया था. कहते हैं कि अतीत की स्मृतियाँ तथा भविष्य की कल्पनाएँ मनुष्य को उसके वर्तमान का आनंद नहीं लेने देती परन्तु, मेरे विचार से वर्तमान में सही तरीके से जीने के लिये अनुकूलता और प्रतिकूलता— दोनों में रम जाना आवश्यक है. यह भी उतना ही जरूरी है कि अतीत को कभी विस्मृत न होने दो, क्यूंकि अतीत का बोध हमें जाने-अनजाने में की गई भूलों से बचाता है…यही सोचते हुये मैं पार्किंग से गाडी निकालकर सीधे घर वापिस चला आया, हालाँकि कुछ अदद खरीदारियां करनी थी मुझे किताबों की, पर वह कार्यक्रम अब टल गया था.

चेंज करने और फ्रेश होने के बाद कुछ हल्का-फुल्का लिखने को मन किया. बहुत कोशिश की, पर पेन ने साथ नहीं दिया, सो निढाल होकर बेड पर आ लेटा ! पत्नी बिना कुछ बोले एक कप चाय और दो बिस्कुट रख गई. मैंने एक मुस्कान के साथ उसकी ओर देखा तो वह भी मुस्कुराकर अपने काम में फिर से व्यस्त होने के लिये जाने लगी. मैंने हौले से उसके हाथ को पकड़ लिया, पर यह क्या! वैदेही शायद इसके लिये तैयार नहीं थी. वह पहले चौंकी, फिर शरारतपूर्ण ढंग से अपने को बचाकर, छिटक कर दूर दरवाजे की ओर चली गई और वहीँ से बोली.

“क्या बात, आज बहुत प्यार उमड़ रहा है ?”,

और वैदेही के उस प्रश्न में छिपे आश्चर्य का उत्तर शायद मेरे पास था भी नहीं. आज बहुत दिनों बाद प्रेम पर चिंतन का मन हुआ. लगा कि दरअसल, भावनाएं पत्थर नहीं होतीं, वे गुलाब के फूलों की भांति होती हैं. आप प्रेम दोगे तो प्रेम मिलेगा, हो सकता है पत्थर का बदला आपको पत्थर से नहीं मिले, पर यह उस इंसान की सदाशयता है, और आपका संयोग ! यह बात अब मेरी समझ में आने लगी थी, वैदेही के ही सरल ज्ञान के माध्यम से !

….यादें फिर हावी होने लगीं. लगा कि आज का दिन सृष्टि और उसकी यादों को ही समर्पित रहने वाला है. या तो वर्षों से उससे अभिवादन या “हाय!” तक भी नहीं हुआ था, और आज— जी, आज तो उसकी यादों के पन्ने स्वतः खुलते जा रहे थे. मुझे भी इन पन्नों में अपना वो अतीत ढूँढने की उत्सुकता हो आई, जिनके कारण आज मुझे कुछ ग्लानि और कुछ अपराध-बोध कई वर्षों से हो रहा था, और वह अपराध बोध कई तरफ़ा था. पत्नी की जब जानकारी में आया था कि मेरी सृष्टि से अंतरंगता बढ़ रही है, तो उसने मुझे समझाया था कि इस सम्बन्ध से कोई प्रसन्न नहीं रह सकता, न तुम, न मैं, न बच्चे और ना ही सृष्टि स्वयं और उसका परिवार ! उसका कहना था कि यह संबध प्रेम है ही नहीं और दैहिक आकर्षण भले ही क्षणिक सुख दे, लेकिन आजन्म ऐसी टीस छोड़ जाता है कि पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ नहीं दीखता. उस समय मुझे पत्नी की इन बातों से बहुत चिढ लगती थी क्यूंकि जो दिखता है वह हमेशा सच हो, यह जरूरी नहीं है. असलियत यह भी थी कि मेरा और सृष्टि का सम्बन्ध प्रेम का था या नहीं, यह तो तब तक स्पष्ट नहीं था, पर हां, यकीनन यह मात्र दैहिक आकर्षण नहीं था. यह बात या तो मैं जानता हूँ या सृष्टि, कि हम दोनों में अंतरंगता के बावजूद और भरपूर अवसर के बाद भी कोई भी ऐसा सम्बन्ध स्थापित नहीं हुआ था जिसे आम भाषा में स्त्री-पुरुष का स्वाभाविक आकर्षण अथवा प्यार की परिणति कहा जाता था. मैं स्वयं इस बात के लिये बहुत सतर्क था कि उसका और मेरा मित्रभाव उस मोड़ पर न पहुँच जाये जिसे भटकाव कहते हैं और उस अंधी गली से निकलना बहुत जटिल हो जाता है. इस द्वंद ने मुझे हालाँकि बहुत जटिल स्थिति में रख दिया था पर दिमाग के सामने हमेशा दिल ही जीतता था. अंतरंगता के बावजूद सृष्टि की ओर से ऐसा कोई आमंत्रण भाव भी मैंने उसकी आँखों में नहीं पढ़ा था.

इसी सब झुंझलाहट में कई बार इस प्रसंग के भटकाव और सृष्टि की ओर से भी मन में वितृष्णा के भाव आते थे, परन्तु ऑफिस पहुंचे-पहुँचते फिर से सब सामान्य हो जाता. सृष्टि की भूमिका कई बार मुझे बहुत मासूम लगती और जो भी हो रहा था उसके लिये मैं उससे अधिक स्वयं को दोषी मानता. उसके और मेरे बीच कोई प्रेम-रहित सम्बन्ध नहीं थे, पर असामाजिक सम्बन्ध भी नहीं थे, इसलिये मैं अपने ऊपर उठती अँगुलियों को लेकर अधिक चिंतित नहीं था, बल्कि बेपरवाह हो गया था. इसे वह स्थिति कह सकते हैं जिसमे इंसान अपनी सुविधानुसार मानक तय करता है, नैतिक मूल्यों के !

कभी चोर मन में लगता कि सृष्टि में भी अपना भविष्य खोजा जा सकता है. क्या नहीं है उसमें जिसकी कल्पना मेरे अवचेतन में बचपन से रही है? तब यह भी लगता था कि ओशो ने सही कहा है कि सभी मनुष्य प्रेम करने के पात्र हैं. एक ही व्यक्ति के साथ आजीवन बंधकर रहने की जरूरत नहीं है. यह एक कारण है कि दुनिया में लोग इतने ऊबे हुए क्यों लगते हैं. वे तुम जैसे हंस क्यों नहीं सकते? वे तुम्हारी तरह नाच क्यों नहीं सकते? वे अदृश्य जंजीरों से बंधे हैं जैसे परिवार, पति, पत्नी, बच्चे. वे हर तरह के कर्तव्यों, जिम्मेदारियों और त्याग के बोझ तले दबे हैं, और तुम चाहते हो कि वे हंसें, मुस्कुराएं, और आनंद मनाएं? तुम असंभव की मांग कर रहे हो. लोगों के प्रेम को स्वतंत्र करो, लोगों को मालकियत से मुक्त करो. लेकिन यह तभी होता है जब तुम ध्यान में अपने अंतर्मन को खोजते हो. इस प्रेम का अभ्यास नहीं किया जा सकता, इसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है…. तब तक मैंने कभी ओशो के विचार जानने का कोई प्रयास भी नहीं किया था.

पर, अगले ही पल मैं इस कल्पना को भी पाप मानने लगता और इस ख्याल को जबरिया अपने दिमाग से दूर निकाल फेंकता. दरअसल, जब आप वास्तव में किसी से प्रेम करते हैं तो आप अपना व्यक्तित्व, अपनी पसंद-नापसंद अपना सब कुछ समर्पित करने के लिए तैयार होते हैं और यह बात हमें लचीला बनाती है. जब वह प्रेम नहीं होता, तो लोग कठोर होने में सुविधा महसूस करते हैं. परन्तु, जैसे ही वे किसी से प्रेम करने लगते हैं, तो वे हर जरूरत के अनुसार स्वयं को ढालने के लिए तैयार हो जाते हैं. यह अपने आप में एक अद्भुत, चमत्कारिक और यूँ कहें कि एक शानदार आध्यात्मिक प्रक्रिया है, क्योंकि इस तरह आपके स्वभाव में आधारभूत तथा परिपूर्ण परिवर्तन आते हैं. आपको जीवन में तरह-तरह के रंग दिखने लगते हैं. प्रेम निस्संदेह स्वयं को मिटाने वाला है और यही इसका सबसे खूबसूरत पहलू भी कहा जा सकता है, जरूरी नहीं कि प्रेम खुद को मिटाने वाला ही हो, यह महज विनाशक भी हो सकता है. जिसे आप ’मैं’ कहते हैं, जो आपका सख्त व्यक्तित्व है, प्रेम की प्रक्रिया में उसका विनाश होता है, और यही स्वयं को मिटाना है. लेकिन दुर्भाग्यवश यह न तो प्रेम था न अप्रेम. यह असमंजस था, जिसने मुझे अनिर्णय की स्थिति में ला खड़ा किया था और इसकी हवा अब मेरे और सृष्टि के घरों तक जा पहुंची थी जो मेरे लिये भी विनाशकारी हो रही थी. संदेह, अनिश्चय और कलह का वातावरण मेरे लिये कष्टकर होने लगा था उधर ऑफिस में भी फ़ैल रही कुछ चर्चाएँ कानों तक पहुँचने लगी थी.

घर पर न जाने कितनी बार पत्नी की चीख–चिल्लाहटों और तानों से मैं परेशान आ चुका था. जबकि असलियत अभी भी यही थी कि सृष्टि और मैं मात्र अच्छे मित्र थे. इस रिश्ते से इतर हमरे प्रेम की सुगबुगाहट तो अभी न मेरे दिल ने सुनी थी और शायद न ही सृष्टि को ऐसा भी कोई आभास हुआ होगा. पर, जब भी फुर्सत होती तो सृष्टि और वैदेही की तुलना अपने आप होने लगती..एक तरफ चीख-चिल्लाहट और जली-भुनी बातें, दूसरी तरफ सौम्य, प्रसन्नचित्त और स्वयं में सम्पूर्ण-सी दिखती सृष्टि !

इसी ऊहापोह में न जाने कब एक साल बीतने को था. अब मैंने कुछ कडा निर्णय लेने का निश्चय किया. वैसे भी मेरा प्रतिनियुक्ति का समय पूरा हो रहा था. साथ में मेरे पास भारत सरकार में एक और प्रतिनियुक्ति का ऑफर मौजूद था. मैंने न घर बताया, न सृष्टि को, और विभाग से अपनी विदाई की तैयारी कर ली. दो दिन पहले मैंने यह रहस्योद्घाटन किया तो काफी हलचल हुई, हर जगह, जैसाकि प्रत्याशित भी था. सृष्टि भी इस अचानक हुए घटनाक्रम से विचलित हुई, पर मुझे कुछ और करना नहीं था. अब तो मुझे विभाग को रिलीव करना था और दिल्ली जाकर मुझे नये पद पर ज्वाइन करना था.

ठीक तीसरे दिन, ०२ अप्रैल को, मैंने दिल्ली के शास्त्री भवन में मानव संसाधन विभाग के संस्कृति प्रकोष्ठ में परियोजना निदेशक के पद पर अपना योगदान दे दिया. परिवार को भी मैं यहाँ साथ ही ले आया था. मैंने एक सप्ताह में ही कार्यालय और नए जॉब की जिम्मेदारियों को काफी अच्छे से समझ लिया था. यह मेरी दूसरी पारी था और मेरा इरादा नई स्लेट पर नई इबारत लिखकर अपनी जिन्दगी को फिर से बेहतर और पारिवारिक जीवन को खुशनुमा बनाने का था.

नैनीताल से लगभग ३०० किलोमीटर दूर अपनी नई पारी तो मैं आरम्भ कर चुका था, पर इसका अर्थ यह कतई नहीं था कि मैं सृष्टि से बचकर चोरों की तरह भाग आया था. मैं उससे सम्पर्क में अवश्य बना रहा, लेकिन यह भी व्यवहारिक तथ्य है कि दूर के रिश्ते टिकाऊ नहीं रह पाते, और तब जबकि आप किसी रिश्ते से दूरी बनाना चाहते हैं, तो उनका निष्प्रयोज्य होना स्वाभाविक व नैसर्गिक प्रक्रिया बन जाता है. धीरे-धीरे फोन कॉल्स की संख्या घटने लगी, फिर कॉल की अवधि भी घटी और दिन से हफ़्तों, महीनों पर बात आ गई. अब कोई विशेष बात होती तो ही उसका फोन आता था. उधर मैं भी अपने काम में बहुत व्यस्त हो गया था.

इस बीच जो बात मुझे उलझन में डालती रही वह सृष्टि के प्रति मेरी सोच और उसको लेकर आत्मग्लानि थी. मुझे लगता था कि उसे मैंने मंझधार में छोड़ दिया था. हालाँकि यह भी उतना ही सच था कि इस रिश्ते को किसी बेहतर परिणिति पर ले जाने का न तो मेरा उद्देश्य था, न ही साहस. कई बार लगता था कि समय और परिस्थितियां सृष्टि के मार्ग को स्वयं प्रशस्त कर देंगी, और मुझे यह सोचकर ही सूकून सा मिल जाता.

… सृष्टि का बुक स्टोर में दिखना कल की ही तो बात थी. मुझे आज का दिन और भी अच्छा लगा. आज फिर मैंने मॉल रोड का रुख किया, और नारायण बुक डिपो पहुंचकर वहां से जाकर अपनी पसंद की चार अदद पुस्तकें छांटी, उनके अंश पढ़े, काउंटर पर रु ४३८ का भुगतान किया और बांस के कागज़ के लिफाफे में रखवा कर बाहर का रुख किया. नजदीक ही हनुमान मंदिर में आरती के बोल, घंटों और घंटियों की मिश्रित आवाजें, गैंदे के फूल और मालाओं की सुगंध, आस-पास के अव्यवस्थित तथा धीमे-से ट्रैफिक के बीच रेंगती जिंदगियां कभी पर्यटकों की बातों और वेंडर्स की चिल्ल-पों पर भारी पड़ने लगी थी. मंदिर के बाहर प्रसाद लेने वालों को कुछ लोग श्रद्धा सुमन के रूप में बेसन के लड्डू और गुल्दाने का भोग प्रसाद के रूप में वितरित कर रहे थे. मैले-कुचैले वस्त्र धारण किये तथा भिखारीनुमा बच्चों की ही भरमार दिख रही थी.

…पहले मैं रुका, फिर मैंने निश्चय किया और मंदिर के बाहर से रु ५०१ का प्रसाद तथा गेंदे की माला खरीदी. भक्तों की भीड़ से रास्ता बनाते हुये लगभग चार मिनट में, मैं मंदिर की मुख्यमूर्ति तक पहुँच गया था. पुजारी जी को सामग्री दे, टीका लगवाकर और प्रसाद पाकर मैं निश्चिन्त वापिस लौटने लगा. प्रसाद मैंने वहां बच्चों की भीड़ में ही बाँट दिया और केवल थोडा सा अंश लेकर घर लौटते हुए लगा कि आज शरीर और आत्मा दोनों हल्के हो गये हैं. लग रहा था कि मैंने स्वयं को पा लिया था, वापिस, अपने अतीत से ! यहाँ स्नेह भी था, प्रेम भाव भी था और लचीलापन भी. बस, अब मेरा दृष्टिकोण बदल गया था, और मुझे घर का वातावरण भी खुशनुमा लगने लगा था. और सृष्टि भी प्रसन्न दिख रही थी न ? उसकी भी दूसरी पारी अच्छी तरह चलने का मुझे सुबूत दिख गया था.

मेरा अपराधबोध उड़न-छू हो गया था और मैंने पत्नी के लिये आर्चीस गैलरी से एक बिना किसी अवसर वाला एक खूबसूरत कार्ड खरीदा. उस पर लिखे सन्देश वाले पृष्ठ को निकल कर दुकानदार को वापिस किया और उससे मांगकर एक कोरा कागज़ इन्सर्ट किया. उस पर जो पंक्तियाँ मैंने लिखी वह यूँ थी-

“…प्रेम निश्छल था तुम्हारा,
सदा समर्पित हर पल,
मेरे मन की दुविधा थी वह,
पीता रहा जब मैं कोलाहल,
न दुविधा है, अब न कोई द्वन्द,
तुम हो और सिर्फ तुम रहोगी,
अब इस निर्मल मन.. !”

…मैंने देखा, पत्नी चाय बनाने गयी थी, पर चाय बने, उससे पहले वह मेरे कार्ड और उसकी पंक्तियों को पढने का लोभ संवरण न कर पायी. मैं धीरे से, दबे पाँव पीछे आकर खड़ा हो गया. वह गौर से उन्हीं पंक्तियों में खोयी थी. अचानक मुड़कर मुझे देखा वैदेही ने. उसकी आंखें डबडबा आई थी. मैंने कुछ कहे बिना उसे हौले से अपने सीने से लगा लिया. पिछले वर्षों में जो कुछ जाने-अनजाने में मुझसे हुआ था, उसकी ग्लानि कुछ कम हुई लग रही थी.

और हो क्यों न, इस खूबसूरत जीवन की दूसरी पारी जो आरम्भ हो गयी थी. किचन की खिड़की से बाहर देखा तो लगा कि काफी नीचे रुई जैसे उड़ रहे सफ़ेद-आसमानी बादल अचल आकाश की नीली पृष्ठभूमि में बहुत ही रूमानी लग रहे थे.

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