देखा है न…
डूबते सूरज को तुमने…
दिन भर की तपन…
असह्य भयावहता…
तीव्र ऊष्मा…
तजता है जब इनको…
शनै: शनै:..
निशा का पहला अध्याय…
बुनता है वह…
कितनी सौम्यता से…
और,
सिमट जाता है…
अपनी प्रकृति में…
हर दिन की तरह…
रजनी का आमंत्रण…
हर लेता है जैसे…
क्रोध को…
स्निग्ध स्नेह से…
आगोश में,
कल फिर दिखेगा…
उषा का जादू…
और क्रोध के रंग…
कुछ सुनहरी-सी…
किरणों के संग…
तेरा आना…
बिखेर देना अपनी लालिमा…
फिर अहसास कुछ अलग…
सख्त-से तेवर…
एक मौन-सी अभिव्यक्ति…
और अंततः अस्त होना…
वंदनीय है…
है देवतुल्य!!

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