स्त्रियोचित होना नैसर्गिक है क्या?

एक महान विचारक ने कहा था,
‘स्त्री पैदा होती नहीं…
बनाई जाती है’.
उसमें डाले जाते हैं कुछ तत्त्व,
जो करते हैं उसे पुरुषों से भिन्न
जैसे स्नेहिल प्रकृति,
प्रफुल्लता का आवरण,
करुणा की देवी,
शिशुवत सहजता,
संवेदनाओं की अनुभूतियां,
मधुरभाषिणी,
सदैव उष्मीत व उर्जित,
नैसर्गिक रूप से
समझदार भी हो वह स्वयं,
और दूसरों का समझे मन,
सहज़विश्वासी हो,
और हो दयालु,
कर सके निःस्वार्थ समर्पण,
देकर तिलांजलि
स्वयं की भावनाओं की!

और कैसे होते हैं हम पुरूष…
आक्रामकता होता पहला लक्षण,
महत्त्वाकांक्षी भी होते,
विश्लेषण करते पहले,
फिर पत्ते अपने खोलते,
प्रतिस्पर्धा में खो देते,
न जाने कितनी दिन-रातें,
आत्मनिर्भर खुद को समझते,
शासक भी स्वयं बन जाते,
करते निर्धारित दायरे,
खुद ही मानक बना डालते!

दैहिक विविधता से प्रबल है स्त्री
सांस्कृतिक अस्मिता भी है
अर्थपूर्ण उसके लिए,
स्त्रीत्व का पुनर्जीवन
कहीं बदल न दे
स्त्रियोचित होने की
कुछ परिभाषाएं,
बहुत संभव है
कि पुरुषोचित गुण
हों जाएं निषेचित
उसकी भी कोख में,
फिर देखना तुम कि
अस्तित्व का संकट
किस पर आता है,
सिर्फ मुख्यधारा में
चाहती है आना वह भी
हक़ है जो उसका,
न घर का अलंकार है
और न प्राण प्रतिष्ठित देवी,
गर होती वह ऐसी ही
तो क्यूँ नहीं बन सकी
एक पहचान उसकी,
कब तक सहती रहे वह
एक पुराना… अनकहा दर्द
और जिये सिर्फ तुम्हारा मन,
स्त्री है वह.. तभी कारण हैं
गर्वित होने के उसके पास !

-Raj Gopal Singh Verma

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मुश्किल है स्त्री होने का अहसास

स्त्री होने का अहसास
समझना थोड़ा
मुश्किल है वाकई,
क्यूंकि पुरुष का दंभ
उसे सोचने ही नहीं देता,
कुछ भी इतर
किन्हीं चाहरदीवारियों
से चंद पग आगे,
उसके लिए,
बंधी है वह
परिधियों में अपनी
एक अलिखित
संविधान-सी बनी
चाहता है पुरुष कि
उसकी दृष्टि
रहे जमीं पर ही,
यह प्रमाण पत्र है
उसके चरित्र का भी
पुरुष के लिए,
पर,
कुछ भी नहीं ऐसा बंधन
न सीमा कोई,
न वर्जनाएं और
न ही परंपरा का निषेध,
असहज़ है वह
सिर्फ स्त्री को लेकर
क्यूंकि
नीला आसमान और
फ़लक उसका
बहुत विस्तृत है,
हो सकता है,
विस्मृत हो जाएं
या फिर दरक जाएं
वह परिधियाँ,
कहीं उस वृहद स्थल में,
गुमनामी का जश्न
कभी मनता है भला,
समानता का दिखावा
नहीं भाता,
न श्रेष्ठ होने का गुरूर,
रुधिर तुम्हारा भी वही है
और मस्तिष्क
बेहतर है पाया
स्त्री ने भी!

टूटन और झुकन !

टूटन से बचा जो दरख़्त
आंधियों के कहर से
बोला गुरुर से
फर्क है न..
टूटने और झुक जाने में,
फिर खड़ा हो जाऊंगा
एक दिन मैं,
गर्व से…
और तुम फिर सोचना
मुझे नष्ट करने के
कुछ नए उपाय !

कहा आंधी ने यूँ–
झुके तो तुम हो,
मेरे ही थपेड़ों से न
और टूटना…
वो तो बस,
लम्हों की बात है,
देखना है कि अब
कितना बचा
वह गुरुर तुम्हारा…
जिससे तनकर
खड़े रहते थे तुम…
बेफिक्र !

न जाने ठीक कौन है…
गुरुर है दोनों को !

(जावेद अख्तर की एक ग़ज़ल की
अंतिम पंक्तियों …

“झुका दरख़्त हवा से, तो आंधियों ने कहा
ज्यादा फर्क नहीं झुकने-टूट जाने में !”

से प्रेरित)

Editटूटन

क्या यह महत्वकांक्षाएं हैं !

ऊँची…बहुत ऊँची…
पर अधूरी…कुछ रूप लेती…
शृंगाररत अट्टालिकाओं के
घने जंगलों के बीच
आसमाँ स्पर्श करने को अभिभूत,
महत्वाकांक्षी बहुमंज़िली इमारतें…
ले रहे हैं शक्ल जिनमें ख़्वाब
कुछ अपूर्व प्रतिमानों के,
और,
दिहाड़ी मज़दूरों का झुरमुट….
अलसाई-सी स्त्रियाँ
न जाने ढो रही हैं ईंटें या
शायद ज़िन्दगियाँ अपनी…
सिमटी-सकुचाई और हताश-सी…
लेकिन फिर भी…गीत गाती हैं
कभी तो मुस्कुराती भी हैं…
और यूँ तो,
खिलखिलाती भी हैं वह स्त्रियाँ…
अपने पतियों की झिड़कियों
और कुछ दुलार भरी गालियों के बीच,
आंखों में जिनके शेष नहीं हैं स्वप्न कोई
रोज़ जीती हैं जिंदगी वो नए सिरे से,
मिट्टी, बालू और सीमेंट…
कहीं बजरी, कुछ लोहे की सलाखों के ढेर,
पत्थरों को तोड़ने की आती आवाजें,
और,
बेतरतीब फैले कुछ अधकचरे सामान…
जैसे होते हैं कुछ कंस्ट्रक्शन साइट्स पर,
उन सब के बीच में,
टेढ़े-मेढ़े रास्ता बनाते
छुपम-छुपाई खेलते…
अपनी भूख को मिट्टी, रेत और
लोहे की सलाखों के ढेर से बहलाते,
वे मजदूरों के बच्चे…
खिलखिला रहे हैं…
यूँ ही,
न कोई खेलने का सामान है…
न पेट की भूख तृप्त हुई,
पर ज़रा देखो,
बचपन से ही…
कितने खुश हैं वे,
न जाने कैसे भला !

इनके हिस्से तो छाँव भी नहीं आई,
ईंट-पत्थर और दीवारों के भवन
देखे तो हैं न जाने कितने इन्होंने,
पर मिला है इनको मिट्टी का ही साथ
हमेशा..कुछ बीमारियों से लड़ने की
अद्भुत ताकत भी है पाई..
यूँ ही बड़े हो जाने का शऊर,
और न जाने क्या-क्या,
सोचना भी जिसको तुम्हारे लिए तो…
मुमकिन ही नहीं,
पर यकीनन,
इन्हें भी चाहिए…
अपने हिस्से की छाँव
कुछ धूप, बादलों के साये
और खूबसूरत चाँदनी रातें,
हर दिन…
बाँटनी होगी हमें
अपने हिस्सों से,
आज… नहीं तो कल,
ज़रूर !

 

नव संचार है यह !

पत्तियां, फल और फूल भी
जीवन हैं, जैसे हम हैं,
देखो जरा…इनकी नसें,
बहता इनमें रक्त द्रव्य भी
निश्चेत होती यह भी हैं,
शनै शनै…झरती भी हैं यह पत्तियां,
पीला गुलाबी रंग कर धारण,
और..देती हैं राह
फल को, फूलों को..
नई उत्पत्ति को शरद आगमन पर
उसी प्रेम से, जिससे ली है
विदाई इन्होंने उस निश्चेत
जीवन की !

पर सुनो..
निर्जीव नहीं कहलाती यह,
याद करो…कोई सुहानी शाम
और बहती हों ठंडी हवाएं…
वृक्ष से झरते पीले सुनहरे पत्ते,
नृत्य करते गिरते हों उठते हैं,
या हवाओं के संग झूमना उनका,
जैसे..झोंखों की तान पर
आनन्दित हों मोक्ष के मिलन की
आनंदित आस से,
शरद ऋतु तुम्हारा…
यह मधुर आगमन स्वागत योग्य है
जीवन का नव संचार भी
जो है यह !

सिर्फ तुम…

जानते हो न तुम…
कि क्यूं स्नेह है मेरा तुमसे,
कि नाता एक अलग बन गया है,
क्यूंकि तुम मुझमें…
आशाओं का संचार करती हो,
कुछ उलझनों में
संबल बन जाती हो मेरा
सिर्फ अपने आसपास होने के
अहसास मात्र से…
जब जीवन के उतार-चढ़ाव
और जिजीविषा से जूझता होता हूं मैं,
सिखाया है तुमने मुझे…
स्नेह का भी अर्थ,
और बांटा है मेरा दर्द,
ईमानदारी, विश्वास और दृढ़ता
तुममें है आत्मसात !

तुम्हीं वह ऋतु हो,
जिसमें खिलते हैं पुष्प मेरे मन के,
बार-बार जन्म लेता हूँ,
नवकोमल उत्कंठा और
स्नेहिल भावों के साथ
पत्ते गिरते हैं तो भी
वह पल होते हैं अनमोल,
प्रेम का शब्द जब भी
मन में विचरण करता है मेरे…
तुम्हारा ही अक्स
मुझमें एक आस भरता है,
मेरा संसार बहुत सीमित है,
उसकी परिधि की परिभाषा तुम हो,
सीमाओं के दायरे बंधे हैं तुमसे और
मित्रता की कसौटी भी तुम्हीं हो,
तुमसे ही बना हूं मैं
जो था बस अनगढ़ इक इंसान,
तुम हो मेरे लिए
महान जिसके भाव
करते हों स्पर्श मेरे अन्तस को,
पाषाण देह से इतर…
एक पिघलते हिमखंड के
बिखरते कणों की निस्पृहता के मानिंद !

–राजगोपाल सिंह वर्मा

सुनो, बुरांस के फूलों !

सुनो तुम,
बुरांस के फूलों
क्यों तुम अपने
सुर्ख लाल रंग से
जंगल दहकने का-सा
भरम फैलाते हो
कहीं गुलाबी कहीं पीला
और कहीं श्वेत रंग में आकर
खुशबुएं फैलाते हो
तुम खिलते हो तो
पहाड़ झूमते हैं,
हो जाते हैं उदास वह भी
तुम्हारे मुरझाने भर से,
माना कि तुम स्वामी हो
अप्रतिम सौंदर्य के
उगते हो समुन्द्र तट से
हज़ारों फ़ीट ऊपर
और यह भी कि
तुम उत्तराखण्ड के राज्य फूल हो,
नेपाल ने और भी अधिक
मान किया है तुम्हारा
जहां तुम्हें घोषित किया है
राष्ट्रीय फूल भी
पर,
कहते तुमको सब अभी भी
जंगली ही हैं
जो उग आते हो यूँ ही
अनायास कहीं,
चाहे आस्ट्रेलिया के
सघन हों जंगल,
या उत्तरी अमेरिका के
ऊंचे वृक्षों से हो घिरे तुम,
अब यह तो बताओ तुम कि
कितने सुरक्षित हो फिर भी
हिमालय की तलहटी में
या नीलगिरी पर्वत के
निकट छिपकर भी
कोलाहल से दूर
घाटियों के बियाबान में
या फिर गहन पर्वतों की
किसी श्रृंखला के साये में,
खोज लिया है फिर भी तुमको
हम इंसानों ने दोहन के लिए
तुम पर निगाह है
हमारे लालच की
पुष्प गुच्छ तुम्हारे
काम आते हैं शर्बत के लिए
जिनसे अहसास बनाते हैं हम
अपनी ताज़गी के,
लकड़ियां तुम्हारी सजती हैं
फर्नीचर बनकर
या जलाते हैं हम
ईंधन में इसको,
कहते हैं कि तुममें खान है
औषधिय गुणों की
सुनो बुरांस,
इन पहाड़ों से
गुम न हो जाना तुम
इन अपनी खूबियों के चलते
अपनी पहचान बनाये रखना तुम
यूँ ही महकाये रखना
हिमाचल और उत्तराखंड को,
या फिर नीलगिरी पर्वतों की
छाया में रहकर,
तुम विस्तार करना प्रजातियों का
नगालैंड के जंगलों
और थाईलैंड, अफगानिस्तान
के रस्ते यूरोप और पूरे
अमेरिका में भी क्योंकि
तुम बंधे नहीं हो
किन्हीं मानवीय सीमाओं से
जीना होगा तुम्हें
अपनी खुशबुओं के साथ
अस्मिता के लिए !