सुनो, बुरांस के फूलों !

सुनो बुरांस, इन पहाड़ों से  गुम न हो जाना तुम इन अपनी खूबियों के चलते अपनी पहचान बनाये रखना तुम यूँ ही महकाये रखना हिमाचल और उत्तराखंड को, या फिर नीलगिरी पर्वतों की  छाया में रहकर, तुम विस्तार करना प्रजातियों का नगालैंड के जंगलों और थाईलैंड, अफगानिस्तान  के रस्ते यूरोप और पूरे अमेरिका में भी क्योंकि तुम बंधे नहीं हो किन्हीं मानवीय सीमाओं से

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तुम्हारे लम्हे !

तुम्हारे कुछ लम्हे, कुछ नाजुक से वह पल, जो मेरे अहसासों को जीते हैं, तुम में, और कुछ यादें, जो तुम्हें, देती हैं सुकूं, चुराना चाहता हूँ, मैं भी,

मेरा विश्वास

तुममें निहित हैं... कुछ कल्पनाएं... स्वप्न..रचनाधर्मिता के, और सुखद अहसास... तुम्हारी सहज-सी भावनाओं के... वह प्रतीति... जिससे तुम्हारा होना... अर्थपूर्ण बनता है...

गुलदोपहरी का फूल

बस.. उगना.. बढना… फ़ैलते जाना… बिना किसी खुशबू के.. सिमट जाना.. और अंततः मिट जाना… फिर एक दिन… हमेशा के लिए… इस जिजीविषा में… यही है न… नियति मेरी ?

धूप हूँ मैं

जानते तुम भी हो... धूप और अंधेरों के मायने... एक आशा जगाता... तो दूसरा निराशा कहलाता, बस अवसाद की ही... राह दिखाता... और मैंने तो हमेशा... आशाएँ बांटी हैं,

अहसास की किरणें…

बंद कमरों में भी... कसमसाते हैं... दरवाजों केे चौखट, और खिड़कियां के शीशे... चटखना चाहते हों जैसे... बंद हैं घर के... वह तमाम रस्ते, जिनसे लेते थे... सांसें कभी... हवाओं पे पहरा भी, है बहुत गहरा...