टूटन और झुकन !

फर्क है न.. टूटने और झुक जाने में, फिर खड़ा हो जाऊंगा  एक दिन मैं, गर्व से... और तुम फिर सोचना मुझे नष्ट करने के कुछ नए उपाय !

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क्या यह महत्वकांक्षाएं हैं !

अलसाई-सी स्त्रियाँ न जाने ढो रही हैं ईंटें या शायद ज़िन्दगियाँ अपनी... सिमटी-सकुचाई और हताश-सी... लेकिन फिर भी...गीत गाती हैं  कभी तो मुस्कुराती भी हैं... और यूँ तो, खिलखिलाती भी हैं वह स्त्रियाँ... अपने पतियों की झिड़कियों और कुछ दुलार भरी गालियों के बीच, आंखों में जिनके शेष नहीं हैं स्वप्न कोई रोज़ जीती हैं जिंदगी वो नए सिरे से,

नव संचार है यह !

याद करो...कोई सुहानी शाम  और बहती हों ठंडी हवाएं... वृक्ष से झरते पीले सुनहरे पत्ते,  नृत्य करते गिरते हों उठते हैं, या हवाओं के संग झूमना उनका, जैसे..झोंखों की तान पर आनन्दित हों मोक्ष के मिलन की  आनंदित आस से, शरद ऋतु तुम्हारा... यह मधुर आगमन स्वागत योग्य है

सिर्फ तुम…

तुम्हीं वह ऋतु हो, जिसमें खिलते हैं पुष्प मेरे मन के, बार-बार जन्म लेता हूँ, नवकोमल उत्कंठा और स्नेहिल भावों के साथ पत्ते गिरते हैं तो भी वह पल होते हैं अनमोल, प्रेम का शब्द जब भी  मन में विचरण करता है मेरे...

सुनो, बुरांस के फूलों !

सुनो बुरांस, इन पहाड़ों से  गुम न हो जाना तुम इन अपनी खूबियों के चलते अपनी पहचान बनाये रखना तुम यूँ ही महकाये रखना हिमाचल और उत्तराखंड को, या फिर नीलगिरी पर्वतों की  छाया में रहकर, तुम विस्तार करना प्रजातियों का नगालैंड के जंगलों और थाईलैंड, अफगानिस्तान  के रस्ते यूरोप और पूरे अमेरिका में भी क्योंकि तुम बंधे नहीं हो किन्हीं मानवीय सीमाओं से

तुम्हारे लम्हे !

तुम्हारे कुछ लम्हे, कुछ नाजुक से वह पल, जो मेरे अहसासों को जीते हैं, तुम में, और कुछ यादें, जो तुम्हें, देती हैं सुकूं, चुराना चाहता हूँ, मैं भी,