प्रारब्ध

हालांकि ठाकुर साब से मेरी मित्रता अधिक पुरानी भी नहीं थी. मात्र लगभग साढ़े तीन साल हुए थे, उनसे मुलाक़ात हुए, और वह भी वाकिंग प्लाजा में. कॉलोनी का यह पार्क टहलने वालों के लिए स्वर्ग से कम नहीं था. ठाकुर साब अपने आठ-दस लोगों की मण्डली में चुटकुले और अपने किस्से सुनाते हुए तेज़ और सधे क़दमों से जब पार्क की दूरियां नापते तो कोई अनजान व्यक्ति भी समझ सकता था कि यह छः फीट का इंसान जरूर किसी पुलिस, सेना या ऐसी ही किसी संस्था से जुडा होगा, जहाँ चुस्ती और फिटनेस की अलग ही महत्ता है.

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क्षितिज के पार

...याद करते-करते मैं अतीत में खो सा गया था. कहते हैं कि अतीत की स्मृतियाँ तथा भविष्य की कल्पनाएँ मनुष्य को उसके वर्तमान का आनंद नहीं लेने देती परन्तु, मेरे विचार से वर्तमान में सही तरीके से जीने के लिये अनुकूलता और प्रतिकूलता— दोनों में रम जाना आवश्यक है. यह भी उतना ही जरूरी है कि अतीत को कभी विस्मृत न होने दो, क्यूंकि अतीत का बोध हमें जाने-अनजाने में की गई भूलों से बचाता है...यही सोचते हुये मैं पार्किंग से गाडी निकालकर सीधे घर वापिस चला आया, हालाँकि कुछ अदद खरीदारियां करनी थी मुझे किताबों की, पर वह कार्यक्रम अब टल गया था.

एक स्वप्न की मौत

....आज, सुनिधि को पुरस्कार मिलने की खबर से पुनः मेरी आँखें नम हो आई. पर, आज यह आंसू ख़ुशी के थे. सुरभि के स्वप्न को जो जिया था सुनिधि ने, उसके अधूरे काम को बेहतरीन ढंग से पूरा कर. फिल्म थी “शिवाकासी—एक स्वप्न की मौत”, जो वहाँ के असंगठित पटाखा उद्योग में लगे हजारों बाल श्रमिकों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिति के दोहन तथा सरकारी उपेक्षा पर एक बेहतरीन रिपोर्ताज थी ! ...कम से कम सुरभि और अमिय का यूँ अचानक अखबार के पन्ने में एक खबर में सिमट जाने का आशीर्वाद सुनिधि को मिल गया था.क्या सपने मरते हैं भला कभी ?

रामकिशोर

रामकिशोर ने एक बार बेटे अमित को घूरा और फिर प्यार से उस कुत्ते की और नजर डाली जो धीरे-धीरे आँखों से ओझिल हो गया था.. ....और गाडी उस गली से काफी दूर निकल आई.

पंडित जी !

डॉ वशिष्ठ अस्थि रोग के जाने-माने विशेषज्ञ हैं शहर में. पास में, नेशनल हॉस्पिटल में वह सप्ताह के केवल मंगलवार के दिन ही ओ पी डी में पेशेंट्स देखते हैं. मंगलवार का अपॉइंटमेंट तो मिस हो गया, अब लगभग १० किलोमीटर दूर सदर बाज़ार के निकट उनके आवास पर ही दिखाना पड़ेगा....