प्रारब्ध

“सर, मैं अपर्णा, ठाकुर साब के घर से !”, मोबाइल पर अनजाने नंबर की कॉल को अनमने ढंग से उठाते ही उधर से आवाज आई.

“अपर्णा…..हां, हां, ठाकुर साब के यहाँ से न? बोलो अपर्णा”, मैंने यथासंभव अपनी आवाज़ को संयत रखते हुए कहा, पर किसी अनिष्ट की आशंका से मेरी धडकनें संयत रहने में असफल-सी प्रतीत हो रही थी. पर, वही हुआ, जिसका मुझे भय था.

“बाबू जी नहीं रहे”, अपर्णा ने रुंधे गले से कहा, “रात भर बेचैनी के बाद जब सवेरे लगभग साढ़े पांच बजे उनके शरीर में जब निश्चेतना के भाव दिखे तो उन्हें नर्सिंग होम ले जाया गया, जहाँ डॉक्टर्स ने उन्हें मृत बता दिया”, अपर्णा ने आगे बताया. “ओह”, के अतिरिक्त मैं कुछ बोल पाता उससे पूर्व ही अपर्णा ने नमस्ते कर कॉल विच्छेदित कर दी थी. शायद उसे और लोगों को भी सूचित करना था.

मैंने अपनी घड़ी पर नज़र डाली. सवेरे के ७.४० हुए थे. आधा घंटा ही हुआ था अभी मुझे मार्निंग वाक से लौटे. बस एक कप चाय पीते-पीते सवेरे के अखबारों पर एक दृष्टि डाल रहा था. मन व्यथित-सा हो गया. अखबार के पन्ने समेत कर एक किनारे सरका दिए. आँखें अनायास मुंदी-सी जा रही थी. सामान्यतः मैं मॉर्निंग वाक से लौटकर चाय पीने और पेपर पढने के बाद नींद का एक झटका फिर से लेता था. पर, नींद तो उड़ ही चुकी थी, और  जागे रहने का भी मन नहीं था. बस मन करता था कि समय यूँ ही ठहर जाए, जब तक कि मैं तन्हाई में जाकर अपने मित्र अजेय प्रताप सिंह की यादों को समेट न लूं.

हालांकि ठाकुर साब से मेरी मित्रता अधिक पुरानी भी नहीं थी. मात्र लगभग साढ़े तीन साल हुए थे, उनसे मुलाक़ात हुए, और वह भी वाकिंग प्लाजा में. कॉलोनी का यह पार्क टहलने वालों के लिए स्वर्ग से कम नहीं था. ठाकुर साब अपने आठ-दस लोगों की मण्डली में चुटकुले और अपने किस्से सुनाते हुए तेज़ और सधे क़दमों से जब पार्क की दूरियां नापते तो कोई अनजान व्यक्ति भी समझ सकता था कि यह छः फीट का इंसान जरूर किसी पुलिस, सेना या ऐसी ही किसी संस्था से जुडा होगा, जहाँ चुस्ती और फिटनेस की अलग ही महत्ता है.

यह बात मुझे टहलते हुए लगभग दो-तीन हफ्ते बाद बाद पता चली कि सिंह साब पुलिस में फिलहाल डिप्टी एस पी के पद पर कार्यरत हैं और जल्दी ही सेवानिवृत होने वाले हैं. बाद में पता चला कि मूल रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया के निवासी ठाकुर साब ने आगरा में ही बसने का फैसला किया था और आवास-विकास कॉलोनी में एक घर भी बनवा लिया था, जो निश्चित रूप से उनके रुतबे और पद की अपेक्षा कहीं अधिक विलासितापूर्ण था. उनके तीन बेटे थे, जिनमें से दो अनुग्रह प्रताप सिंह और प्रबल प्रताप सिंह विवाहित थे और उनके साथ ही रहते थे. सिंह साब ने दोनों के लिए ही अपने मकान में अलग-अलग पोर्शन बनवा रखे थे. बड़े बेटे के लिए निजी व्यवसाय भी सिंह साब ने ही जमवाया था. मंझला बेटा शिक्षा के क्षेत्र में था. उनकी गृहस्थी अच्छी चल रही थी. तीसरा अविवाहित बेटा रचित प्रताप सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय से मास्टर्स की पढाई के साथ सिविल सर्विसेज की परीक्षाओं की तैयारी में जुटा था.

उन्हें रिटायर हुए बमुश्किल आठ माह ही हुए होंगे. अचानक सिंह साब का यूँ चले जाना किसी के लिए भी विश्वसनीय नहीं था. पर सच का सामना तो एक-न-एक दिन करना ही होता है. और सच यही था कि अजय प्रताप सिंह अब इस दुनिया में नहीं रहे. मैंने जल्दी से स्नान किया और नाश्ता किये बिना ही उनके आवास की ओर चल पड़ा, जो मेरे घर से लगभग चार किलोमीटर की दूरी पर रहा होगा.

सिंह साब की विशाल कोठी के बाहर से दिख रहा था एक अजीब-से किस्म का पसरा हुआ सन्नाटा. न जाने मौत को भी सन्नाटा कितना अच्छा लगता है. मेरा इस मकान में पिछले तीन सालों में न जाने कितने बार आना-जाना हुआ होगा. कितनी महफ़िलें जमी होंगी, कितने किस्से-कितनी बातें– पर आज, आज जो सन्नाटा और नीरवता का माहौल था वह बहुत गहन उदासी की चादर ओढ़े था. मैंने अपनी गाडी जिस जगह पार्क की, उसके आसपास पांच और गाड़ियाँ और कई स्कूटर-मोटरसाइकिल पहले से ही खड़ी थीं. ड्राइंग रूम से सटे वरांडे में सफ़ेद चादर में लिप्त था ठाकुर साब का निष्प्राण शरीर. वह शरीर जो दिन में न जाने कितनी बार ठहाके लगाया करता और लोगों को अपने चुटकुलों से हंसाते रहता था.आस-पास दरी पर बैठे लोग बिलकुल शांत थे. मेरी पहचान के तो केवल उनके घर के लोग थे, शेष सब अनजान से थे वहां.

मैंने उनके शरीर पर श्रद्धा सुमन के रूप में गुलाब की पंखुड़ियों को अर्पित किया. मैं किंकर्तव्यविमूढ़-सा उनके आत्मारहित शरीर के पास खड़ा रहा. अपने स्थान पर वापिस जाने की न तो मुझमें इच्छा थी, और न ही साहस. बस एकटक देखता रहा मैं उनकी मुंदी आँखों को! उस निस्तेज शरीर को जो कुछ कहानियों को जीता रहा था, ताउम्र. कोई उदासी, कोई दुःख, कोई उलझन– किसी को भी फटकने तक न दिया था अपने जीते-जी ठाकुर साब ने. कभी किसी पर मोहताज़ नहीं रहे. पर आज.. वह तो निश्चेत थे, और हम निस्सहाय !  

ठाकुर साब कुछ चमत्कारिक से व्यक्तित्व के स्वामी थे. पुलिस की नौकरी और उनका मजाकिया लहजा आपस में ज्यादा मेल नहीं खाता था. उनके बारे में तरह-तरह के किस्से भी सुने जाते थे. सिंह साब के बारे में चर्चा थी कि वह ठीक-ठाक घूसखोर टाइप के पुलिस अधिकारी रहे थे. कई बार उनकी ठाकुर बुद्धि शिकायतकर्ता और अपराधी दोनों पर ही सामान रूप से चोट कर जाती. यानी, दोनों तरफ से अच्छी-खासी वसूली के बाद ही मामले को रफा-दफा करते. हालाँकि छोटे-मोटे केस के लिए वह रॉबिनहुड की भूमिका में आ जाते. उनके निर्देश थे कि इन्हें ऐसे ही रफा-दफा कर दिया जाए, बिना किसी लिखापढ़ी के. चूँकि ठाकुर साब ने पुलिस में पहले पायदान, यानि हवालदार या सिपाही के पद से अपनी नौकरी आरम्भ की थी, और घिसते-घिसते वह डिप्टी एस पी की पोस्ट तक जा पहुंचे थे, तो यकीनन उन्हें कानून और पुलिसिया पेंचों की अपनी जानकारी के कारण चलते-फिरते एनसाइक्लोपीडिया के नाम से भी जाना जाता था. किसी केस को पक्ष में करना हो या खिलाफ, दोनों तरह के उपाय करना, और जरूरत पड़ने पर दोनों पक्षों से घूस ऐंठना उन्हें बखूबी आता था.

असली किस्से तो उन्होंने स्वयं रिटायरमेंट के बाद अपनी मण्डली में साझा करने का एक दस्तूर-सा बना लिया था. कई बार तो बातों का सिलसिला चलता रहता और मॉर्निंग वाक का समय खत्म हो जाता. तब गेट के पास लल्लन के चाय-बन-मक्खन पर शेष कड़ियों का निपटारा होता. खंडेलवाल जी, और अग्निहोत्री जी तो रोज़ ही उन्हें उकसा-उकसा कर नई-नई कहानियों की फरमाइश करते और ठाकुर साब भी बस, मूड बना लेते. फिर जो बातें शुरू होती तो तभी खत्म होती जब या तो अग्निहोत्री जी के घर से दो-तीन बार फोन ना आ जाता या खंडेलवाल जी का बेटा स्वयं ही उन्हें ढूंढने लल्लन के खोखे तक न आ पहुँचता. उन कहानियों में कितनी वास्तविकता होती और कितना मसाला, यह तो स्वयं ठाकुर साब ही जानते होंगे.

लेकिन इस सब के बावजूद पिछले काफी दिनों से, और ख़ास तौर से उनके रिटायरमेंट के बाद, एक बात साफ़ दिखती थी. अब से तीन साल पहले वाले ठाकुर साब अब नहीं रहे थे अजय प्रताप सिंह. उनकी मूंछों की रौनक कहीं हल्की पड़ चुकी थी, और आँखों की चमक तथा सीने का कसाव भी ढलान पर आ गया था. उनकी चाल और हाव-भाव में जो अंतर आया था, वह स्वाभाविक था, पर न जाने क्यूँ मुझे तथा और लोगों को वह सब कुछ अस्वाभाविक सा लगता था. रिटायरमेंट के बाद अवसाद और घर के लोगों से तालमेल न बैठने के किस्से आम होते हैं, लेकिन उनसे मेरी घनिष्टता में न तो मैंने स्वयं ऐसा कुछ देखा था, और न ही उन्होंने कभी मुझसे साझा किया. कभी हल्का सा भी कोई गुबार उनके मन में नहीं दिखा. बावजूद इसके यह भी उतना ही सही था कि कुछ था जो कतरा-कतरा उनकी जिन्दगी को खा रहा था.

ठाकुर साब अपने तीनों बच्चों की तारीफों के पुल बांधते नहीं थकते थे. वे उनको सोना बताते थे. कहते थे, यह मेरे पिछले जन्म के कर्मों का फल है, जो उसने मुझे तीनों बच्चों के रूप में मुझे लौटाया है. उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं थी. यह भी उन्होंने बताया था कि स्वयं को व्यस्त रखने के लिए वह अपने आप को बार काउंसिल में पंजीकृत कराकर प्राइवेट प्रैक्टिस आरम्भ करने वाले हैं. बहुत आशान्वित थे वह अपनी इस प्रैक्टिस को लेकर. पत्नी के देहावसान के बाद पिछले छः साल से ठाकुर साब अपने विशाल भवन के स्टडी रूम और ड्राइंग रूम तक ही सिमट कर रह गए थे. वह अपने शयन कक्ष में शायद ही कभी सोते हों.

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…वह बात जुलाई के पहले सप्ताह की थी. दिन भी रविवार का था. जब लोग हफ्ते भर की भागदौड़ की जिन्दगी के विपरीत आलस्य में रहना ज्यादा पसंद करते हैं. रात से ही रुक-रुक कर कभी तेज़ और कभी मंद बारिश हो रही थी. आसपास के इलाकों में तो पानी भी इकठ्ठा हो गया था. आज पार्क में जाने की मेरी तो हिम्मत नहीं हुई, पर ठाकुर साब तो कुछ अलग ही मिटटी के बने थे. हमेशा की तरह ४.३० बजे के अलार्म के सहारे उठने वाले ठाकुर साब आज भी उसी तरह पार्क में आये थे टहलने. पानी और कीचड के बावजूद ट्रैक तक पहुँचने का अपना रास्ता बनाते. आम तौर पर चालीस से साठ लोग पार्क में टहलते थे, भोर से शुरू कर और सूरज की गर्मी आरम्भ होने तक लेकिन उस दिन दूर-दूर तक कोई नहीं दिख रहा था. ठाकुर साब अपने सफ़ेद जॉगिंग शू और हल्के नीले ट्रैक सूट में बारिश की धीमी-धीमी बूंदाबांदी से मोर्चा ले आ पहुंचे थे पार्क में. बारिश हालाँकि खत्म हो चुकी थी, फिर भी कभी-कभी हल्की फुहारों से मौसम की सौम्यता का अनुमान हो रहा था उसदिन भी .

…अकेले टहल रहे थे उस दिन ठाकुर साब जब अचानक वह ट्रैक के एक किनारे पर इकठ्ठा काई पर पैर रखते ही असंतुलित होकर जो नीचे गिरे तो उनका सर निकट की फेंसिंग से ऐसा टकराया कि वह मूर्छित हो गए. उनके सिर के एक हिस्से से हल्का सा रक्त स्राव भी हुआ. दुखद बात यह थी कि उनको कोई इस अवस्था में देख भी नहीं पाया. जब देखा गया तब तक काफी रक्त भी बह चुका था. जब उन्हें स्थानीय मेडिकल कॉलेज के आकस्मिक चिकित्सा विभाग में उन्हें पहुँचाया गया, उस समय लगभग सवेरे के ७.४५ बजे थे. अर्थात, मोटे तौर पर लगभग दो घंटे वह लावारिस स्थिति में पड़े रहे थे. चौकीदार की ड्यूटी बदलने के समय उन पर निगाह पड़ी थी, तब जाकर आनन-फानन में उनके घर सूचित किया गया और उन्हें इमरजेंसी में पहुँचाया गया.

मजबूत शरीर था, और उस पर फिटनेस का मुलम्मा. ठाकुर साब बच गए थे. लेकिन चोट गहरी पहुंची थी और देर तक पड़े रहने से हुए नाज़ुक हिस्से के रक्तस्राव से उनकी स्थिति यदि मेडिकल भाषा को सरल करके बताया जाए तो “असहज” हो गई थी. एम आर आई तथा कैट स्कैन से कुछ ऐसे स्पॉट पर ब्लड क्लाटिंग की जानकारी प्राप्त हो गई थी जिसने उनके शरीर के दाहिने हिस्से में पक्षाघात का रूप ले लिया था. उस दिन जब जानकारी पर मेडिकल कॉलेज पहुंचा तो देख कर विश्वास ही नहीं हुआ, कि यह वही जिंदादिल इंसान है जो मेडिकल कॉलेज के न्यूरो वार्ड में ऐसे पड़ा है जैसे किसी ने इसके प्राण चूस लिए हों– निस्तेज शरीर जो तीन-चार दिन की कोशिशों के बाद हिलने-डुलने की स्थिति में आ पाया था. हर दिन तिल-तिल जिन्दगी से हार मानते शरीर को देखना. और उस व्यक्ति की जिजीविषा जो दुनिया को हँसता था, एक समय में पुलिसिया क़ानून का बड़ा स्तम्भ था, जैसे दरक रहा हो…हर पल.

काफी दिन और तमाम तरह के टेस्ट्स के बाद डॉक्टर्स ने उन्हें दो विकल्प दिए– या तो दिल्ली के फोर्टिस अथवा मेदान्ता में रेफर कर दिया जाए या किसी निजी न्यूरो सर्जन की देखरेख में इनकी सेवा सुश्रुषा की जाए. दोनों ही स्थिति में जीवन बचने की संभावनाएं क्षीण थीं, पर जिन्दगी के शेष दिनों को घसीटने के अवसर अधिक ! बस. यही थी उनकी जिन्दगी, जिसका समय चंद डॉक्टर्स निर्धारित कर रहे थे, अपने ज्ञान और अनुभव के आधार पर, और जो वह कह रहे थे वह बात पूरी तरह व्यावहारिक थी.

ठाकुर साब कुल अदद २२ दिन मेडिकल कॉलेज के प्राइवेट न्यूरो वार्ड में रहे, और १२ दिन साधारण वार्ड में. कुल मिलाकर ३४ दिन. इसके बाद उन्हें घर पर शिफ्ट कर दिया गया. स्टडी रूम का छोटा दीवान ही उनकी दुनिया बन गया. मेदांता और फोर्टिस की बात आई-गई हो गई थी. मेडिकल कॉलेज में भर्ती रहे इन चौंतीस दिनों में एक वह अद्भुद बात हुई, जिसे ठाकुर साब पता नहीं कब से दुनिया से छिपाते आ रहे थे. अब यह साफ़ हो गया था कि उनके तीन बच्चों में से दो को अपने पिता की कोई ख़ास चिंता नहीं है. बस अगर सेवा के नाम पर कोई था तो मंझला बेटा और उसकी बहु अपर्णा.  जी, अपर्णा– जिसे ठाकुर साब ने कभी मन से अपनाया ही नहीं. क्यों ? क्योंकि बेटे प्रबल प्रताप ने उनसे विद्रोह कर अपर्णा के रूप में अपने जिस जीवनसाथी को चुना था वह न तो स्व-जातीय थी, न उनके स्तर की. वह हॉस्टल में रहकर स्कॉलरशिप की राशि से पढाई पूरी करने वाली एक साधारण ग्रामीण परिवार की कस्बाई मानसिकता और परिवेश की लड़की थी, पर मेधावी इतनी कि उसे हाई स्कूल से लेकर मास्टर्स तक हर बार मेडल्स मिले. अंततः वह शहर के प्रतिष्ठित महिला कॉलेज में अस्थायी रूप से सहायक प्राध्यापक के लिए चयनित भी हो गई थी. बेटा पहले से ही विश्वविद्यालय में जंतु विज्ञान विभाग में प्राध्यापक के पद पर कार्यरत था ही.

तब, शायद ही कोई दिन बीतता हो जब मैं घंटे-दो घंटे मेडिकल कॉलेज में ठाकुर साब के पास बैठकर न आता हूँ. अब वह धीरे-धीरे लोगों को पहचानने लगे थे, लेकिन केवल आँखें उनकी मूक अभिवादन करती. न मुंह, न जुबान, न मुस्कुराहट, न हिलना-डुलना, न गर्मजोशी से हाथ मिलाना– कुछ भी नहीं बचा था उस बेहतरीन इंसान के पास. वह बस या तो कुछ देर लोगों की आँखों में अपने लिए सहानुभूति के भाव पढ़कर नैराश्य के जंगल में भटकने लगते, या फिर सीलिंग की ओर देखते, चुपचाप ! ऐसा लगा भी कि एक बार उन्होंने अपनी जुबान पर जोर डालने की कोशिश भी की, पर उनके बोल तालू से चिपक कर रह गए, और वह फिर से उदास हो गए. इसी बीच मैंने उनकी आँखों को न जाने कितनी बार नम और बेबस होते देखा ! कमजोरी इतनी कि न जाने कितनी ग्लूकोज की बोतलें और उनमें औषधियों की डोज़ उन्हें चढ़ाई गई हो. हाथ में अभी भी ग्लूकोज चढाने के लिए कैनुला लगा था. न जाने फिर कब चढ़ाना पड जाए ग्लूकोज!

इस बीच प्रबल और अपर्णा ने जितनी सेवा की ठाकुर साब की, उसे देखकर मन भर आता और वाकई गर्व होता उनके संस्कारों पर. ऐसा शायद ही कोई अवसर हो, जब मैं उनके वार्ड में गया हूँ और अपर्णा तत्पर खड़ी, सेवा करते हुए न मिली हो, पूरी जिम्मेदारी और मन से ! ऐसा ही बेटा प्रबल था. वह बाहर की पूरी जिम्मेदारी संभाले हुए था. इसके विपरीत बड़ी बहू अमृता तथा पुत्र अनुग्रह का व्यवहार विचित्र और आश्चर्यजनक रूप से उपेक्षा से भरा था, न जाने क्यों ! इन चौंतीस दिनों में मेरी उससे दो बार भेंट हुई. वह भी किसी मेहमान की तरह. अनुग्रह का न मिलना तो और भी अचरज भरा था.

“किसने कहा था बारिश में भी पार्क में जाने को ?”,

झल्लाते हुए अनुग्रह ने उस दिन जब वार्ड में कई लोगों के सामने बोला तो मैं चकित रह गया. जो होना था वह तो हो चुका. अब तो पिता की सेवा-टहल करने की बात थी न, बस. न अवसर था और न जरूरत. झुंझलाने से क्या होने वाला था. पर, उसे अनावश्यक गुबार निकालना था, सो निर्लाज्ज़ता से बोलता गया,

“अब उन्हें मालूम था कि मुझे खुद १२ लाख रुपयों की सख्त जरूरत थी. पर मेरा तो कुछ सोचा ही नहीं उन्होंने. न यह पता कि उनके अकाउंट में कितना बैलेंस ही. सब तो छिपाकर रखा उन्होंने. अब इलाज के लिए भी पता नहीं कब तक, कहाँ-कहाँ से उधार मांगता फिरूं?”.

तब तक प्रबल भी आ पहुंचा था. उसने भाई को मान से समझाने की कोशिश की और दवाओं का पर्चा अपने भाई के हाथ से ले लिया.

“सब ठीक होगा. आप परेशान न हों भैया”,

कहा अवश्य उसने पर बड़े भाई को तो न जाने और क्या कहना शेष था. मेरा मन इतना खिन्न हुआ कि एकबारगी वहां से चलने का मन हुआ, पर कदम नहीं उठ पाए. बस, इतना जरूर कहा मैंने, कि जो भी खर्च है ट्रीटमेंट का, वह तो सरकार से वापिस मिलना ही है, अंततः.परन्तु, अनुग्रह को तो आज सारा ही हिसाब करना था, जैसे उसके पिता बेटे से उधार लेकर विश्व यात्रा के लिए निकल रहे हों.

“देखेंगे वो भी, न जाने कितने साल लगेंगे”,

और लम्बी सांस खींचकर वह वार्ड के बहार वरांडे में टहलने के लिए चला गया.

ठाकुर साब का बेड उस जगह से थोडा दूर था, जहाँ यह अनावश्यक प्रसंग चल रहा था. पर, यह जगह उतनी भी दूर नहीं थी की शब्द उनके कानों तक न आ सकें. उन्हें सब समझ में आ रहा था. अफ़सोस, कि वह अभी भी अपने शरीर, और इन्द्रियों के गुलाम थे, और अपने भाव को अभिव्यक्त करने से मजबूर. मैं उनके सिरहाने एक स्टूल खींचकर बैठ गया. मैंने उनको सांत्वना देने की दृष्टि से एक झूठी मुस्कान डालनी चाही. पर, ठाकुर साब की आँखों में नमी, और दृष्टि में कातरता के भाव– दोनों ने इतना विचलित किया कि चाह कर भी वह दृश्य मेरे दृष्टि पटल से ओझल नहीं हो पा रहा है.

यह वही बड़ा  बेटा था जिसमें उनकी जान बसती थी. अपने प्रोविडेंट फण्ड तथा अन्य देयकों  के लगभग 48 लाख रूपये उन्होंने अनुग्रह के कंप्यूटर व्यवसाय में लगा दिए थे. एक गाडी भी खरीद कर दी थी. पर, फिर भी उसका उपेक्षित तथा विचित्र व्यवहार कुछ नासमझी वाली बात थी.

दरअसल मानव स्वभाव और रिश्ते इतने जटिल होते हैं कि हम जितना समझते हैं उससे कहीं अधिक वह हमारी समझ से परे होते हैं. संस्कारों का व्यक्ति के साथ ऐसा सम्बन्ध है जैसा जल का जमीन के साथ. व्यक्ति के कुछ संस्कार तो उसके अपने होते हैं. हम जीवन को उसकी गहराई तक जाकर देखते है तो बोध होता है कि हर व्यक्ति अंतत: संस्कारों का ही एक पुतला है. व्यक्ति एक जन्म का नहीं जन्म जन्मान्तर के संस्कारों का परिणाम है. व्यक्ति जो कुछ होता है, करता है वह सब उसके भीतर इस जन्म के और पूर्व जन्म के संस्कारों का एक प्रवाह गतिशील रहता है. कहते हैं कि हम पिछले जन्म में जो कर्म करते हैं वह वर्तमान में भाग्य बनकर आता है. भाग्य दिखता नहीं है अन्धकार में हमें दृष्टिपात नहीं होता है इसलिए उसके आधार पर जीवन कैसे जिया जाये यह बस विचारणीय हो सकता है.

 

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अपर्णा और प्रबल– बस यही दो लोग संस्कार की तैयारी में जुटे थे. बीच-बीच में अपर्णा अपनी नम आँखों को पल्लू से पोंछती जाती. प्रबल उसे ढाढस बंधाता. तब तक दिल्ली से रचित भी आ चुका था.  एकबारगी उसकी आँखें छलछला आई, फिर संयत होकर वह भी शांत बैठ गया था. वह बस अपने पिता के निष्प्राण शरीर को एक टक देर तक निहारता रहा. ठाकुर साब की मॉर्निंग वाक की मण्डली में से कोई दिख नहीं रहा था. अधिकांश घर-परिवार और मोहल्ले के लोग थे.

“अब देर न करें आप लोग, जल्दी करें दाह संस्कार के लिए !”,

…अचानक तन्द्रा टूटी तो देखा अनुग्रह प्रताप सिंह लकदक सफ़ेद कुरता-पायजामे में तैयार खड़े थे, अपने पिता ठाकुर अजय प्रताप सिंह की अंतिम विदा की रस्म अदायगी के लिए ! उसकी पत्नी दूर खड़ी देख रही थी. हाँ, आठ साल का बेटा अनुरूप जरूर अपने दादा के पास खड़ा था, विचलित और अचंभित सा– क्योंकि जन्म-मृत्यु के विस्तृत रिश्तों, और उनकी जटिलताओं से अभी तक परे जो था!

सच है..अपने हिस्से का हिसाब हमें स्वयं ही करना पड़ता है !

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क्षितिज के पार

मल्लीताल में, माल रोड पर नारायण बुक स्टोर खाली समय में मेरे लिए बहुत सुकून की जगह होती है, जहाँ मैं बिना टोका-टाकी या असभ्य लोगों की चिल्ल-पों अथवा पर्यटकों के रंग-बिरंगे परिधानों, हैट और सेल्फी स्टिक से जूझने के अलावा कुछ गंभीर लेखकों की नई पुस्तकों को उलट-पुलट लेता हूँ. जरूरत पड़ने पर इक्का-दुक्का ख़रीददारी भी हो जाती है.

आज भी रविवार का दिन था. इसी लिए उस ओर के लिए कदम बढ़ रहे थे. पर, बुक शॉप से निकलते हुए सृष्टि को देखा तो एकबारगी प्रसन्नता हुई. एक परिचित से अचानक टकरा जाने जैसे भाव भी जरूर आये पर फिर दिमाग ने उन भावों पर तत्काल ही नियंत्रण पा लिया और सहज भाव फिर से मन पर हावी हो गया. उसके पति ने तो शायद मुझे देखा नहीं था, पर बाहर एकबारगी हल्के अँधेरे, और ब्रिटिश युग की नये ज़माने की हल्की पीली रोशनी की छटा में नहाये लैम्पपोस्ट से इस पर्यटक नगरी के मुख्य बाज़ार की रंगीनियों और रौनक में मशगूल सृष्टि की नज़रें मुझसे क्षण भर के लिये ही सही, मिली जरूर थी !

बहुत बड़ा समय होता है न तेरह साल ? न जाने कितने उतार-चढाव ! और कुछ स्मृतियाँ आँखों के सामने सजीव होने लगी.

“मे आई कम इन, सर ?”

एक सॉफ्ट और मीठी नारी स्वर से मैंने अपने कक्ष के मुख्य द्वार की ओर निगाह घुमाई तो साड़ी में अपने शरीर को पूरी तरह से ढंके एक सौम्य नारी की छवि, जो आधे पर्दे के पीछे से झांक रही थी, मुझे दिखाई दी. मेरी सहमति के बाद वह प्रविष्ट हुयी और उतनी ही मधुर आवाज में अपना परिचय दिया. उसकी कॉल थी और फोन मेरे कक्ष में डाइवर्ट था.

…बात सन २००१ की है, जब मैंने प्रतिनियुक्ति पर ज्वाइन किया था, लोक निर्माण विभाग के परिवृत-४ में अधिशासी अभियंता के रूप में, जो इकाई नैनीताल में पिछले दो दशकों से कार्यरत थी और उसने बढ़ते-बढ़ते अब मिनी मुख्यालय का रूप ले लिया था. विभाग में सृष्टि मेरे साथ सहायक अभियंता के पद पर संबद्ध थी. वह उन लगभग १८ अधिकारियों व ४२ कर्मचारियों में से एक थी जिन्हें मुझे रिपोर्ट करना होता था. वह तो बाद में मैं उसको जान पाया, पर न जाने क्यूँ उसको पहली बार में ही देखकर मुझे लगता था कि वह सबसे अलग है, और यह भी कि किसी भी काम के मामले में उस पर भरोसा किया जा सकता था. यकीनन, यह मेरी अंतरात्मा की आवाज थी और इसका कोई भी तार्किक कारण मेरे पास नहीं था.

बाद में मुझे जब भी किसी काम को समझने की या कोई जानकारी करने की जरूरत होती तो सृष्टि को बुलवा लेता. वह भी निस्संकोच अपनी राय देती और आमतौर पर वह राय सही होती थी. अब मेरा स्टाफ भी समझने लगा था…और वह लोग कई बार “अरे, बुलाना उन्हें..” कहने भर से ही गर्दन हिलाकर सृष्टि को उसके प्रथम तल के केबिन से बुलाने निकल पड़ते. मैं भूतल के अपने कक्ष में बैठता था.

…पता नहीं, इस सोच को क्या कहूं. यह दिल है कि मानता ही नहीं—बस देखकर ही फैसला कर लेता है. बार-बार सोचता हूँ, कि आगे से हमेशा दिमाग की सुनूंगा.. लेकिन दिल के भाव कुछ इतने मजबूत हो जाते हैं, कि वह दिमाग की अनदेखी करने पर ही तुला रहता है, हमेशा. तर्क शक्ति क्षीण पड जाती है, और जो सोचा है बस वही ठीक लगता है. अक्सर अतार्किक. वह बात और है कि इस कारण जो धोखे मिले हैं, उसकी फेहरिस्त लम्बी होती जाती है. कुछ दिन उदासीनता. फिर, लगता है कि जिन्दगी में बहुत कुछ है, उससे सहारे खुशियाँ ढूंढी जा सकती हैं, उनमें जिया जा सकता है. लोगों का आना-जाना, सम्बन्ध, विचार यह सब तो तात्कालिक बातें हैं. पर हमेशा मुझे तो क्षितिज के पार ही देखने की इच्छा रहती थी. दूर… जहाँ आकाश और पृथ्वी का मिलन दिखता हो—एक सतरंगी से स्वप्न की भाँति !

एक दिन शहर में अनायास ही बर्फ़बारी की स्थिति बन गई. सृष्टि के पति ने फोन किया. लैंडलाइन फोन मेरे पास ही था. उसका एक्सटेंशन जरूर मेरे पी ए अतुल के पास रहता था. कार्यालय समय के बाद, सामान्यतः वह बता कर निकल जाता और मैं भी उसे तभी रोकता जब कोई वाकई जरूरी काम होता. हाँ, जाने से पहले वह सारी काल्स मेरे नंबर पर डाइवर्ट जरूर कर जाता ताकि कोई कॉल उसके कमरे में अनावश्यक रूप से बजती न रहे और मैं जान भी न पाऊं. वैसे भी उन दिनों केवल लैंडलाइन फोन का ही जमाना था. जन्म जरूर हो चुका था मोबाइल का, पर वह इतना महंगा था कि उसके उपयोग के विषय में सोचना भी मूर्खता थी.

खैर ! बात हो रही थी सृष्टि को आये कॉल की. उसके पति ने फोन किया था, यह बताने के लिये कि वह उसकी प्रतीक्षा करे, क्यूंकि उस इलाके में, जहाँ वह रहते थे, भू-स्खलन का भी खतरा था. अकेला लौटना खतरनाक हो सकता था. वह नगर से थोडा दूर और निर्जन क्षेत्र था, वह लोग जहाँ रहते थे, लगभग चार किलोमीटर दूर, और आज परिवहन के साधन भी लगभग बंद हो चुके थे. वह तेज़ी से बदलते मौसम में उसको लेने आये, और सृष्टि उनके साथ चली गई. अब कई दिन तक मौसम में अप्रत्याशित बदलाव जारी था, तो उनका सृष्टि को छोड़ने और लाने का सिलसिला आरम्भ हो गया.

इस बीच काम की अधिकता और सृष्टि पर मेरी निर्भरता—दोनों में ही तेज़ गति से वृद्धि हो रही थी. किसी काम को समझने के बजाय मैं उसे सृष्टि को सौंपकर निश्चित हो जाता. और हाँ, सृष्टि ने कभी उसमें अपनी जी-जान न लगाई हो, ऐसा मुझे एक बार भी आभास नहीं हुआ. दूसरी खूबी उसकी यह थी कि उसे कोई अभिमान नहीं था, ना अपनी शिक्षा पर, ओहदे पर या अपने काम के प्रति समर्पण की भावना पर. सब कुछ निश्छल था, जिसे उसके चेहरे और आत्मविश्वासयुक्त दर्प से महसूस किया जा सकता था.

नये विभाग की नई और दुरूह-सी कार्य संस्कृति को रातों रात अपनाना किसी के लिये भी संभव नहीं. वह भी मैदानी इलाके से, दुसरे विभाग से आकर नैनीताल जैसे पर्यटक और पहाड़ी क्षेत्र. कई रास्ते तो ऐसे थे जहाँ पर पैदल चलना ज्यादा श्रेयस्कर था, कुछ ऐसे थे कि वहां सरकारी गाडी से जाना ऐसा लगता था की खतरों के खिलाड़ी बनकर जा रहे हों, और न जाने लौट भी पायेंगे या नहीं. पर, जब सृष्टि जैसी सहकर्मी मिली हो, तो मुझे ज्यादा माथा-पच्ची करने की क्या जरूरत थी ! वैसे भी यह मेरा अतिरिक्त कार्यप्रभार था, अपने मूल काम के साथ-साथ. सो, मैं कुछ देर के लिये ही ऑफिस बैठता और कुछ जरूरी फाइलों को निपटाकर आवश्यक निर्देश देकर वापिस अपने दूसरे कार्यालय चला जाता जो इस भवन से डेढ़ किलोमीटर दूर एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित था, जहाँ मुझे विद्युत् विभाग की निर्माण इकाई में अधीक्षण अभियंता का पद प्राप्त था. कई बार जरूर रात के आठ-साढ़े आठ भी बज जाते थे. तब सृष्टि सहित सारा स्टाफ भी रुका रहता, जब तक मैं उन्हें स्वयं जाने को नहीं कह देता.

हालाँकि काम उतना ही था पर अब मेरे रुकने की अवधि बढ़ गई थी. अब मैं अपने मूल ऑफिस के काम को कम समय देने लगा और इस ऑफिस में मेरा ज्यादा समय गुजरने लगा. कब से, यह मुझे पता ही नहीं चला, और क्यों, इसका भी कोई तर्क मेरे पास नहीं था. कई बार तो नौ भी बज जाते पर न तो कोई टोकता, न मैं जल्दी जाने में रुचि दिखाता. अब मुझे समय-समय पर चाय, कॉफ़ी और कभी कुछ स्नैक्स या कटे हुए फल भी सर्व होने लगे. विशिष्ठ विजिटर को आवश्यकतानुसार बिना कहे चाय पिलाना और भी सुखद लगता था. बाद में पता चला की यह सब सृष्टि के प्रबंधन का नतीजा था. मैं अभिभूत हो जाता. कई बार सृष्टि मुझे देर होने पर कुछ जरूरी बातें याद कराती. सारांश में, मेरी ऑफिस की दुनिया सृष्टि के आसपास घूमने लगी, और वह मेरी जरूरतों का भी हिसाब रखने लगी. अच्छा लगने लगा था यह बदलाव मुझे भी.

जनवरी का महीना और सर्दी का मौसम चरम पर. कुछ दिनों बाद फिर वही हुआ. तूफानी और बर्फीली आंधियां आने लगी. स्टाफ के सब लोग जल्दी जाने की बात करने लगे. मुझे अपनी कोई चिंता नहीं था, क्यूंकि मेरा आवास इस ऑफिस से मात्र एक किलोमीटर, नये विकसित क्षेत्र में था, जहाँ न तो रास्तों की कोई दुविधा थी और न ही कोई अन्य समस्या. मैंने स्वयं सृष्टि को बुलाकर उसे घर जाने की अनुमति दे दी थी. वह अपने पति को फोन कर उनके आने की प्रतीक्षा में बाहर चली गई.

अगले दिन वह नहीं आ पाई. दूसरा दिन भी बीत गया. अफ़सोस इस बात का था कि लैंडलाइन फोन भी पिछले कई दिन से डेड था. तीसरे दिन सृष्टि ने किसी के हाथ ऑफिस में अपनी छुट्टी की एप्लीकेशन भिजवाई थी जिसमें उसके वायरल फीवर से बीमार होने का जिक्र था.

चौथे दिन सृष्टि मेरे आने से पहले ही मुझे ऑफिस में दिख गई. वह स्वस्थ लग रही थी, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था. मुझे पता था कि वायरल के बाद लगभग एक सप्ताह इन्सान काम करने योग्य नहीं रहता, पर चौथे दिन ही उसे मौजूद देख कर मुझे अच्छा लगा. मैंने उसे अपने कक्ष में आने को कहा. हालचाल लेने के बाद मैंने उसे औपचारिकतावश कहा,

“अच्छा हुआ आप आज आ गई, फोन डेड था, वर्ना मैं तो आपको पडौस के नंबर पर फोन कर हाल-चाल लेने वाला था आज !”

“अरे सर, हमारी ऐसी किस्मत कहाँ, और अगर आप फोन कर देते तो हमारी तो स्लीपलेस नाइट्स हो जातीं”,

यह कहकर वह मेरी आँखों में झांक कर खिलखिलाकर हंस पड़ी. सर्दी का मौसम और फर का लांग कोट, उस पर काफी फब रहा था. मैं उसकी इस बात और हंसी के लिये तैयार नहीं था और मेरी सकपकाहट मेरी झेंप में दिखी. उसका यह बिंदास रूप मैंने कभी नहीं देखा था. बस, उससे जब भी होती थी, काम की बात. आज वह बिना काम के निस्संकोच सामने की कुर्सी पर बैठ गई. मैंने भी चाय मंगा ली थी, उसके और अपने लिये. बातें चल निकली… उसने बताया कि घर में पति और दो छोटे बच्चों के अलावा सास-ससुर और ननद भी है. छोटा बेटा उसका लगभग एक साल का था जिसे वह कभी आया, कभी पडौस और कभी अपनी मां के हवाले करने के बाद ऑफिस आती थी. सास-ससुर से कोई ख़ास सहयोग नहीं था, माँ शहर के दूसरे छोर पर रहती थी. दो भाई थे उसके मायके में जिनमें से लगातार बीमार बना रहता था, दूसरा अभी बेरोजगार था.

वायरल की बीमारी तो सामान्य मानी जाती है, सबको कभी न कभी होती रहती है. बीमारी से उठकर इन्सान शारीरिक और मानसिक रूप से दुर्बल महसूस करता है, जबकि सृष्टि इसके विपरीत दुरुस्त और अधिक ही आकर्षक लग रही थी. मैंने आज शायद पहली बार उसके नयन-नक्श को गौर से देखने की कोशिश की. वह हमेशा साडी ही पहनती थी. पतली, आकर्षक व छरहरी काया की स्वामिनी कॉटन की ऑरगंजा साड़ी, हाथों में केवल कांच की चूड़ियों तथा बिना किसी अन्य ज्वेलरी में भी वह काफी आकर्षक दिखती थी. आज जरूर साड़ी से अधिक उसका लांग कोट नज़र आ रहा था, जिसने उसके शरीर के ८० प्रतिशत भाग को कायदे से ढक रखा था. उसका साडी बाँधने का स्टाइल कुछ अलग था जिसमें पल्लू से पूरा शरीर ढका रहता और केवल हाथों के किनारे या अंगुलियाँ ही दिखाई पड़ती थी, जिनसे वह साड़ी का किनारा संभाले रखती. बड़ी-बड़ी गोल, सुरमई सी आँखें और हँसते समय गालों में हल्के गड्ढे पड़ने से उसकी हंसी और भी मोहक बन जाती थी. रंग जरूर उसका थोडा सांवला था, लेकिन अच्छे फीचर्स के सामने वह सृष्टि की कृशांगी आकर्षकता को कहीं से भी विपरीत रूप से प्रभावित नहीं करता था.

अब लगभग रोज़ ही कोई न कोई बात व्यक्तिगत भी होने लगी सृष्टि से. अपने काम में निपुण, और अपने विषय में गोल्ड मैडल के बाद भी उसका पिछले सात साल से कोई प्रमोशन नहीं हुआ था, जबकि उसके जूनियर दो-दो प्रमोशन पाकर सृष्टि से वरिष्ठ बन बैठे थे. इस बात को भी उसने खिलखिलाकर बताया मुझे. उसे कोई ख़ास शिकायत नहीं थी किसी से. वह जानती थी कि यह सिस्टम की पेचीदिगियों के कारण है, न कि उससे किसी पूर्वाग्रह के कारण. इस बीच उसने गैर-तकनीकी विषय समाज शास्त्र में शोध के लिये विश्वविद्यालय से अपना पंजीकरण करा लिया था.

उसके पति ने सृष्टि को रोजाना लेने आना तो बंद कर दिया था, पर कभी-कभी वह अचानक गैर-समय अवश्य टपक पड़ता और विचित्र से भावों से अपनी नापसंदगी जाहिर करता दिखता. मैंने उसकी परवाह करनी छोड़ दी थी, उसके रूखे व्यवहार को देखते हुये. उसे मेरी मंगवाई हुई चाय जो पसंद नहीं आती थी. वह वरांडे में चपरासियों और अन्य विजिटर के आस पास या तो बैठा रहता या टहलते हुए अपना समय बिताता.

बाद में सृष्टि से ही पता चला कि रोज-रोज़ के झंझटों के सम्बन्ध में. अन्तत: एक दिन सृष्टि ने बताया कि उसने अपने दोनों बच्चों के साथ अलग रहने का फैसला किया है, और अब वह फैसला अटल है, क्यूंकि पिछले लगभग नौ साल से वह नाकाम से रिश्ते को पल-पल जिन्दा रखने के लिये स्वयं को मारती आ रही थी. अब वह थक चुकी थी. इस फैसले में अभी भी एक ‘सिल्वर लाइनिंग’ यह थी कि सृष्टि अपने दोनों बेटों के साथ अपनी मां के पास ही लौट आई.

…याद करते-करते मैं अतीत में खो सा गया था. कहते हैं कि अतीत की स्मृतियाँ तथा भविष्य की कल्पनाएँ मनुष्य को उसके वर्तमान का आनंद नहीं लेने देती परन्तु, मेरे विचार से वर्तमान में सही तरीके से जीने के लिये अनुकूलता और प्रतिकूलता— दोनों में रम जाना आवश्यक है. यह भी उतना ही जरूरी है कि अतीत को कभी विस्मृत न होने दो, क्यूंकि अतीत का बोध हमें जाने-अनजाने में की गई भूलों से बचाता है…यही सोचते हुये मैं पार्किंग से गाडी निकालकर सीधे घर वापिस चला आया, हालाँकि कुछ अदद खरीदारियां करनी थी मुझे किताबों की, पर वह कार्यक्रम अब टल गया था.

चेंज करने और फ्रेश होने के बाद कुछ हल्का-फुल्का लिखने को मन किया. बहुत कोशिश की, पर पेन ने साथ नहीं दिया, सो निढाल होकर बेड पर आ लेटा ! पत्नी बिना कुछ बोले एक कप चाय और दो बिस्कुट रख गई. मैंने एक मुस्कान के साथ उसकी ओर देखा तो वह भी मुस्कुराकर अपने काम में फिर से व्यस्त होने के लिये जाने लगी. मैंने हौले से उसके हाथ को पकड़ लिया, पर यह क्या! वैदेही शायद इसके लिये तैयार नहीं थी. वह पहले चौंकी, फिर शरारतपूर्ण ढंग से अपने को बचाकर, छिटक कर दूर दरवाजे की ओर चली गई और वहीँ से बोली.

“क्या बात, आज बहुत प्यार उमड़ रहा है ?”,

और वैदेही के उस प्रश्न में छिपे आश्चर्य का उत्तर शायद मेरे पास था भी नहीं. आज बहुत दिनों बाद प्रेम पर चिंतन का मन हुआ. लगा कि दरअसल, भावनाएं पत्थर नहीं होतीं, वे गुलाब के फूलों की भांति होती हैं. आप प्रेम दोगे तो प्रेम मिलेगा, हो सकता है पत्थर का बदला आपको पत्थर से नहीं मिले, पर यह उस इंसान की सदाशयता है, और आपका संयोग ! यह बात अब मेरी समझ में आने लगी थी, वैदेही के ही सरल ज्ञान के माध्यम से !

….यादें फिर हावी होने लगीं. लगा कि आज का दिन सृष्टि और उसकी यादों को ही समर्पित रहने वाला है. या तो वर्षों से उससे अभिवादन या “हाय!” तक भी नहीं हुआ था, और आज— जी, आज तो उसकी यादों के पन्ने स्वतः खुलते जा रहे थे. मुझे भी इन पन्नों में अपना वो अतीत ढूँढने की उत्सुकता हो आई, जिनके कारण आज मुझे कुछ ग्लानि और कुछ अपराध-बोध कई वर्षों से हो रहा था, और वह अपराध बोध कई तरफ़ा था. पत्नी की जब जानकारी में आया था कि मेरी सृष्टि से अंतरंगता बढ़ रही है, तो उसने मुझे समझाया था कि इस सम्बन्ध से कोई प्रसन्न नहीं रह सकता, न तुम, न मैं, न बच्चे और ना ही सृष्टि स्वयं और उसका परिवार ! उसका कहना था कि यह संबध प्रेम है ही नहीं और दैहिक आकर्षण भले ही क्षणिक सुख दे, लेकिन आजन्म ऐसी टीस छोड़ जाता है कि पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ नहीं दीखता. उस समय मुझे पत्नी की इन बातों से बहुत चिढ लगती थी क्यूंकि जो दिखता है वह हमेशा सच हो, यह जरूरी नहीं है. असलियत यह भी थी कि मेरा और सृष्टि का सम्बन्ध प्रेम का था या नहीं, यह तो तब तक स्पष्ट नहीं था, पर हां, यकीनन यह मात्र दैहिक आकर्षण नहीं था. यह बात या तो मैं जानता हूँ या सृष्टि, कि हम दोनों में अंतरंगता के बावजूद और भरपूर अवसर के बाद भी कोई भी ऐसा सम्बन्ध स्थापित नहीं हुआ था जिसे आम भाषा में स्त्री-पुरुष का स्वाभाविक आकर्षण अथवा प्यार की परिणति कहा जाता था. मैं स्वयं इस बात के लिये बहुत सतर्क था कि उसका और मेरा मित्रभाव उस मोड़ पर न पहुँच जाये जिसे भटकाव कहते हैं और उस अंधी गली से निकलना बहुत जटिल हो जाता है. इस द्वंद ने मुझे हालाँकि बहुत जटिल स्थिति में रख दिया था पर दिमाग के सामने हमेशा दिल ही जीतता था. अंतरंगता के बावजूद सृष्टि की ओर से ऐसा कोई आमंत्रण भाव भी मैंने उसकी आँखों में नहीं पढ़ा था.

इसी सब झुंझलाहट में कई बार इस प्रसंग के भटकाव और सृष्टि की ओर से भी मन में वितृष्णा के भाव आते थे, परन्तु ऑफिस पहुंचे-पहुँचते फिर से सब सामान्य हो जाता. सृष्टि की भूमिका कई बार मुझे बहुत मासूम लगती और जो भी हो रहा था उसके लिये मैं उससे अधिक स्वयं को दोषी मानता. उसके और मेरे बीच कोई प्रेम-रहित सम्बन्ध नहीं थे, पर असामाजिक सम्बन्ध भी नहीं थे, इसलिये मैं अपने ऊपर उठती अँगुलियों को लेकर अधिक चिंतित नहीं था, बल्कि बेपरवाह हो गया था. इसे वह स्थिति कह सकते हैं जिसमे इंसान अपनी सुविधानुसार मानक तय करता है, नैतिक मूल्यों के !

कभी चोर मन में लगता कि सृष्टि में भी अपना भविष्य खोजा जा सकता है. क्या नहीं है उसमें जिसकी कल्पना मेरे अवचेतन में बचपन से रही है? तब यह भी लगता था कि ओशो ने सही कहा है कि सभी मनुष्य प्रेम करने के पात्र हैं. एक ही व्यक्ति के साथ आजीवन बंधकर रहने की जरूरत नहीं है. यह एक कारण है कि दुनिया में लोग इतने ऊबे हुए क्यों लगते हैं. वे तुम जैसे हंस क्यों नहीं सकते? वे तुम्हारी तरह नाच क्यों नहीं सकते? वे अदृश्य जंजीरों से बंधे हैं जैसे परिवार, पति, पत्नी, बच्चे. वे हर तरह के कर्तव्यों, जिम्मेदारियों और त्याग के बोझ तले दबे हैं, और तुम चाहते हो कि वे हंसें, मुस्कुराएं, और आनंद मनाएं? तुम असंभव की मांग कर रहे हो. लोगों के प्रेम को स्वतंत्र करो, लोगों को मालकियत से मुक्त करो. लेकिन यह तभी होता है जब तुम ध्यान में अपने अंतर्मन को खोजते हो. इस प्रेम का अभ्यास नहीं किया जा सकता, इसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है…. तब तक मैंने कभी ओशो के विचार जानने का कोई प्रयास भी नहीं किया था.

पर, अगले ही पल मैं इस कल्पना को भी पाप मानने लगता और इस ख्याल को जबरिया अपने दिमाग से दूर निकाल फेंकता. दरअसल, जब आप वास्तव में किसी से प्रेम करते हैं तो आप अपना व्यक्तित्व, अपनी पसंद-नापसंद अपना सब कुछ समर्पित करने के लिए तैयार होते हैं और यह बात हमें लचीला बनाती है. जब वह प्रेम नहीं होता, तो लोग कठोर होने में सुविधा महसूस करते हैं. परन्तु, जैसे ही वे किसी से प्रेम करने लगते हैं, तो वे हर जरूरत के अनुसार स्वयं को ढालने के लिए तैयार हो जाते हैं. यह अपने आप में एक अद्भुत, चमत्कारिक और यूँ कहें कि एक शानदार आध्यात्मिक प्रक्रिया है, क्योंकि इस तरह आपके स्वभाव में आधारभूत तथा परिपूर्ण परिवर्तन आते हैं. आपको जीवन में तरह-तरह के रंग दिखने लगते हैं. प्रेम निस्संदेह स्वयं को मिटाने वाला है और यही इसका सबसे खूबसूरत पहलू भी कहा जा सकता है, जरूरी नहीं कि प्रेम खुद को मिटाने वाला ही हो, यह महज विनाशक भी हो सकता है. जिसे आप ’मैं’ कहते हैं, जो आपका सख्त व्यक्तित्व है, प्रेम की प्रक्रिया में उसका विनाश होता है, और यही स्वयं को मिटाना है. लेकिन दुर्भाग्यवश यह न तो प्रेम था न अप्रेम. यह असमंजस था, जिसने मुझे अनिर्णय की स्थिति में ला खड़ा किया था और इसकी हवा अब मेरे और सृष्टि के घरों तक जा पहुंची थी जो मेरे लिये भी विनाशकारी हो रही थी. संदेह, अनिश्चय और कलह का वातावरण मेरे लिये कष्टकर होने लगा था उधर ऑफिस में भी फ़ैल रही कुछ चर्चाएँ कानों तक पहुँचने लगी थी.

घर पर न जाने कितनी बार पत्नी की चीख–चिल्लाहटों और तानों से मैं परेशान आ चुका था. जबकि असलियत अभी भी यही थी कि सृष्टि और मैं मात्र अच्छे मित्र थे. इस रिश्ते से इतर हमरे प्रेम की सुगबुगाहट तो अभी न मेरे दिल ने सुनी थी और शायद न ही सृष्टि को ऐसा भी कोई आभास हुआ होगा. पर, जब भी फुर्सत होती तो सृष्टि और वैदेही की तुलना अपने आप होने लगती..एक तरफ चीख-चिल्लाहट और जली-भुनी बातें, दूसरी तरफ सौम्य, प्रसन्नचित्त और स्वयं में सम्पूर्ण-सी दिखती सृष्टि !

इसी ऊहापोह में न जाने कब एक साल बीतने को था. अब मैंने कुछ कडा निर्णय लेने का निश्चय किया. वैसे भी मेरा प्रतिनियुक्ति का समय पूरा हो रहा था. साथ में मेरे पास भारत सरकार में एक और प्रतिनियुक्ति का ऑफर मौजूद था. मैंने न घर बताया, न सृष्टि को, और विभाग से अपनी विदाई की तैयारी कर ली. दो दिन पहले मैंने यह रहस्योद्घाटन किया तो काफी हलचल हुई, हर जगह, जैसाकि प्रत्याशित भी था. सृष्टि भी इस अचानक हुए घटनाक्रम से विचलित हुई, पर मुझे कुछ और करना नहीं था. अब तो मुझे विभाग को रिलीव करना था और दिल्ली जाकर मुझे नये पद पर ज्वाइन करना था.

ठीक तीसरे दिन, ०२ अप्रैल को, मैंने दिल्ली के शास्त्री भवन में मानव संसाधन विभाग के संस्कृति प्रकोष्ठ में परियोजना निदेशक के पद पर अपना योगदान दे दिया. परिवार को भी मैं यहाँ साथ ही ले आया था. मैंने एक सप्ताह में ही कार्यालय और नए जॉब की जिम्मेदारियों को काफी अच्छे से समझ लिया था. यह मेरी दूसरी पारी था और मेरा इरादा नई स्लेट पर नई इबारत लिखकर अपनी जिन्दगी को फिर से बेहतर और पारिवारिक जीवन को खुशनुमा बनाने का था.

नैनीताल से लगभग ३०० किलोमीटर दूर अपनी नई पारी तो मैं आरम्भ कर चुका था, पर इसका अर्थ यह कतई नहीं था कि मैं सृष्टि से बचकर चोरों की तरह भाग आया था. मैं उससे सम्पर्क में अवश्य बना रहा, लेकिन यह भी व्यवहारिक तथ्य है कि दूर के रिश्ते टिकाऊ नहीं रह पाते, और तब जबकि आप किसी रिश्ते से दूरी बनाना चाहते हैं, तो उनका निष्प्रयोज्य होना स्वाभाविक व नैसर्गिक प्रक्रिया बन जाता है. धीरे-धीरे फोन कॉल्स की संख्या घटने लगी, फिर कॉल की अवधि भी घटी और दिन से हफ़्तों, महीनों पर बात आ गई. अब कोई विशेष बात होती तो ही उसका फोन आता था. उधर मैं भी अपने काम में बहुत व्यस्त हो गया था.

इस बीच जो बात मुझे उलझन में डालती रही वह सृष्टि के प्रति मेरी सोच और उसको लेकर आत्मग्लानि थी. मुझे लगता था कि उसे मैंने मंझधार में छोड़ दिया था. हालाँकि यह भी उतना ही सच था कि इस रिश्ते को किसी बेहतर परिणिति पर ले जाने का न तो मेरा उद्देश्य था, न ही साहस. कई बार लगता था कि समय और परिस्थितियां सृष्टि के मार्ग को स्वयं प्रशस्त कर देंगी, और मुझे यह सोचकर ही सूकून सा मिल जाता.

… सृष्टि का बुक स्टोर में दिखना कल की ही तो बात थी. मुझे आज का दिन और भी अच्छा लगा. आज फिर मैंने मॉल रोड का रुख किया, और नारायण बुक डिपो पहुंचकर वहां से जाकर अपनी पसंद की चार अदद पुस्तकें छांटी, उनके अंश पढ़े, काउंटर पर रु ४३८ का भुगतान किया और बांस के कागज़ के लिफाफे में रखवा कर बाहर का रुख किया. नजदीक ही हनुमान मंदिर में आरती के बोल, घंटों और घंटियों की मिश्रित आवाजें, गैंदे के फूल और मालाओं की सुगंध, आस-पास के अव्यवस्थित तथा धीमे-से ट्रैफिक के बीच रेंगती जिंदगियां कभी पर्यटकों की बातों और वेंडर्स की चिल्ल-पों पर भारी पड़ने लगी थी. मंदिर के बाहर प्रसाद लेने वालों को कुछ लोग श्रद्धा सुमन के रूप में बेसन के लड्डू और गुल्दाने का भोग प्रसाद के रूप में वितरित कर रहे थे. मैले-कुचैले वस्त्र धारण किये तथा भिखारीनुमा बच्चों की ही भरमार दिख रही थी.

…पहले मैं रुका, फिर मैंने निश्चय किया और मंदिर के बाहर से रु ५०१ का प्रसाद तथा गेंदे की माला खरीदी. भक्तों की भीड़ से रास्ता बनाते हुये लगभग चार मिनट में, मैं मंदिर की मुख्यमूर्ति तक पहुँच गया था. पुजारी जी को सामग्री दे, टीका लगवाकर और प्रसाद पाकर मैं निश्चिन्त वापिस लौटने लगा. प्रसाद मैंने वहां बच्चों की भीड़ में ही बाँट दिया और केवल थोडा सा अंश लेकर घर लौटते हुए लगा कि आज शरीर और आत्मा दोनों हल्के हो गये हैं. लग रहा था कि मैंने स्वयं को पा लिया था, वापिस, अपने अतीत से ! यहाँ स्नेह भी था, प्रेम भाव भी था और लचीलापन भी. बस, अब मेरा दृष्टिकोण बदल गया था, और मुझे घर का वातावरण भी खुशनुमा लगने लगा था. और सृष्टि भी प्रसन्न दिख रही थी न ? उसकी भी दूसरी पारी अच्छी तरह चलने का मुझे सुबूत दिख गया था.

मेरा अपराधबोध उड़न-छू हो गया था और मैंने पत्नी के लिये आर्चीस गैलरी से एक बिना किसी अवसर वाला एक खूबसूरत कार्ड खरीदा. उस पर लिखे सन्देश वाले पृष्ठ को निकल कर दुकानदार को वापिस किया और उससे मांगकर एक कोरा कागज़ इन्सर्ट किया. उस पर जो पंक्तियाँ मैंने लिखी वह यूँ थी-

“…प्रेम निश्छल था तुम्हारा,
सदा समर्पित हर पल,
मेरे मन की दुविधा थी वह,
पीता रहा जब मैं कोलाहल,
न दुविधा है, अब न कोई द्वन्द,
तुम हो और सिर्फ तुम रहोगी,
अब इस निर्मल मन.. !”

…मैंने देखा, पत्नी चाय बनाने गयी थी, पर चाय बने, उससे पहले वह मेरे कार्ड और उसकी पंक्तियों को पढने का लोभ संवरण न कर पायी. मैं धीरे से, दबे पाँव पीछे आकर खड़ा हो गया. वह गौर से उन्हीं पंक्तियों में खोयी थी. अचानक मुड़कर मुझे देखा वैदेही ने. उसकी आंखें डबडबा आई थी. मैंने कुछ कहे बिना उसे हौले से अपने सीने से लगा लिया. पिछले वर्षों में जो कुछ जाने-अनजाने में मुझसे हुआ था, उसकी ग्लानि कुछ कम हुई लग रही थी.

और हो क्यों न, इस खूबसूरत जीवन की दूसरी पारी जो आरम्भ हो गयी थी. किचन की खिड़की से बाहर देखा तो लगा कि काफी नीचे रुई जैसे उड़ रहे सफ़ेद-आसमानी बादल अचल आकाश की नीली पृष्ठभूमि में बहुत ही रूमानी लग रहे थे.

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एक स्वप्न की मौत

मैं सुनिधि को अधिक नहीं जानता. वह सुरभि से मेरी आखिरी मुलाकात के समय लगभग आठ साल की रही होगी. हाँ, उसकी माँ सुरभि को सालों से जानता था. आज सुनिधि का नाम जब अन्तरराष्ट्रीय लघु फिल्म समारोह में उसकी फिल्म को पुरस्कृत किये जाने के समाचार में पढ़ा तो सुरभि की याद में आँखें छलछला आईं.

…हम लोग दिल्ली की कालिंदी  विहार कॉलोनी में रहते थे. ऑफिस हमारा कोई नज़दीक नहीं था, मेरा जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के डाउन कैंपस यानि मुनीरका से सटा हुआ, और उसका उससे भी दूर, इंस्टीट्यूटशनल एरिया में क़ुतुब होटल के भी उस पार, लगभग २२ किलोमीटर दूर. मेट्रो ट्रेन की तो दिल्ली में उन दिनों कल्पना भी नहीं हुई थी. हमारी मुलाकात डी टी सी की जिस बस में होती थी, उसका नाम था पी-३२. यह ऑफिस जाने वाले लोगों के लिये चलाई जाने वाली पॉइंट-टू-पॉइंट बस सर्विस थी जो हम जैसे लोगों के लिये बेहद सुगम थी.

बहुत बिंदास थी वह. उसके चेहरे पर दिखते आत्मविश्वास से कई बार डर भी लगता था. जितनी बिंदास थी, उतनी टची भी. धीरे-धीरे पता चला कि वह जिस सरकारी ऑफिस में काम करती है, वहां उसकी भी जॉब रेस्पोंसिबिलिटी मेरे जैसी ही थी. स्वाभाविक था उसे और जानने की इच्छा होना. पर, दिन यूँ ही बीतते गए और सवेरे ८.४०, और शाम ५.५० की पी-३२ से यूँ ही आना-जाना लगा रहा– सप्ताह में पांच  दिन. एक दिन मेरे सहयोगी एक अधिकारी दयानंद परमार जी को उसके नज़दीक की सीट पर बैठने का मौका मिला. मैंने दूर से ही देखा कि परमार जी ने अपनी जेब से पढने का चश्मा निकाल कर अपनी आँखों पर लगाया, फिर उन्होंने आभा जिस किताब को पढ़ रही थी, उसमें झाँकने का प्रयास किया, या यूँ कहें उन्होंने भी उस किताब को पढने में रूचि लेनी आरम्भ की.

किताब वह झाँक रहे थे, धडकनें मेरी बढ़ रही थी. मैं असहज हो रहा था. दरअसल सुरभि को लेकर हम लोग अक्सर चर्चा करते थे, और मैंने ही अपने स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर परमार जी को बताया था कि वह भी सम्पादन के क्षेत्र से जुडी है. अब मैंने देखा, कि परमार जी ने चश्मा उतारकर वापिस कवर में रखकर जेब के हवाले कर दिया. परमार जी ने सुरभि से संवाद आरम्भ कर दिया था. मैं असहज था, और परमार जी पूरी तरह सहज. उनके लिये सहज होने का कारण उनके पूरे सफ़ेद बाल, झुर्रियां और उम्र का आखिरी पड़ाव होना था. और मैं? मैंने तो अभी नौकरी शुरू ही की थी—लगभग २४ वर्ष, यही आयु रही होगी मेरी, प्रोबेशन पीरियड था अभी मेरा. सुरभि मुझसे आयु में लगभग दो-चार साल बड़ी रही होगी.

खुशमिजाज़ अधिकारी थे परमार जी. वह मेरे ही साथ टेक्निकल ऑफिसर थे, और इंडियन स्टैण्डर्ड इंस्टिट्यूट की नौकरी छोड़कर लगभग छह महीने पूर्व ही आये थे. परमार जी का स्टॉप मेरे स्टॉप से एक स्टॉप पूर्व ही पड़ता था. सो, वह पहले ही उतर गये. इस बीच में मैं उन्हें कनखियों से सुरभि से काफी विस्तार में बात करते बार-बार देखने का मोह संवरण नहीं कर पाता था. एक बार तो उन्होंने सुरभि को मेरी और इंगित कर कुछ बताया, और उसने गर्दन घुमा कर दूर बैठे मुझे देखा तो, लगा कि मेरे प्राण सूख गए हों, मैंने ऐसा करते हुए देख लिया था, सो मेरी निगाह खुद ही खिड़की की ओर घूम गई थी. मैं असहज तो था ही, अब विचलित भी हो गया था, और परमार जी पर झुंझलाहट हो रही थी. मेरी धड़कनें कानों तक पहुँच रही थी. पर, कुछ विशेष चिंता की बात नहीं लगी, क्यूंकि विदा लेते समय परमार जी को सुरभि ने बहुत सहज ढंग से विदा किया था.

मुझे ठीक से याद नहीं कि इस घटना के कितने दिन बाद सुरभि ने एक बार लौटते समय एक सौम्य मुस्कान के साथ अभिवादन कर, पी-३२ बस में मुझे आग्रहपूर्वक अपने निकट की सीट पर बिठाया था. हाँ, इससे पहले परमार जी मुझे उस दिन की घटनाक्रम का विवरण अवश्य दे चुके थे. उन्होंने मेरे विषय में, मेरे लेखन, और साहित्यिक संबंधों के बारे में वह जो भी जानते थे, उसका बखूबी मक्खन के साथ सुरभि के सामने प्रस्तुतिकरण कर दिया था. इस संक्षिप्त सी पहली मुलाकात में सुरभि ने कुछ विषयों पर हमारी लाइब्रेरी में पुस्तकों की उपलब्धता पर कुछ जानकारी ली, और कुछ मेरी पृष्ठभूमि की. तब तक हमारा स्टॉप भी आ गया था. उसके फ्लैट तथा मेरे फ्लैट की दूरी लगभग आधा किलोमीटर होगी. वह सेक्टर तीन में रहती थी, और मैं सेक्टर चार में. हमने एक दूसरे से विदा ली. उसके बाद भी कभी-कभी हम लोगों में अभिवादन तथा छोटी-मोती बातों की रस्म अदायगी हो जाती थी.

एक दिन देर शाम लगभग ७.४५ बजे, घर की डोर बैल बजी. देखा तो, सुरभि सामने थी. तीसरी मंजिल का फ्लैट और लगभग हांफती हुई आभा, बोली, “चलिए, घर चलिए, चाय गैस पर चढ़ा कर आई हूँ, मुझे लगा कि आपका घर बिल्कुल पास ही होगा, अनन्त भी आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं”. पत्नी से यह पहली मुलाकात थी उसकी. हमने उसे आश्वस्त किया कि अभी आते हैं आधे घंटे में, तब जाकर वह वापिस लौटी, उसी तरह.  रुकना उसे था नहीं, सो नहीं रुकी. जल्दी इतनी थी कि पानी भी नहीं पिया उसने.

आप सोच रहे होंगे कि मेरा यह कैसा आकर्षण था सुरभि में?  कैसी दिखती होगी वह?  तो सुनिये– सुरभि एक साधारण शरीर की, कुछ ओवरवेट, स्वयं अपने और ज़माने से बेपरवाह सी लड़की थी, जो न तो अपने कपड़ों पर ध्यान देती थी, न अपने लुक या ज्वेलरी पर ! उसका आईसाईट  के चश्मे का फ्रेम भी उसी की तरह बहुत साधारण था. कभी-कभी वह खादी का कुरता और सलवार भी पहन आती थी, पैरों में चप्पल और कंधे पर लटकता था एक थैला. थैले में और तो पता नहीं, पर कुछेक अच्छी किताबें और उसकी डायरी जरूर होती थी. इस साधारण लुक के बावजूद एक बात अवश्य थी जो मुझे हमेशा उसकी ओर आकर्षित करती थी— उसका भरपूर आत्म विश्वास, और बाद में जब मैंने उसे जाना, तब मैं उसके दृष्टिकोण और विचारों की तार्किक दृढ़ता से भी प्रभावित हुआ. वह बॉटनी में परास्नातक थी पर उसे प्राचीन व मुगलकालीन भारतीय इतिहास रोमांचित करता था. उसे जितनी रूचि इस विषय में थी उतनी इतिहास में अपनी परास्नातक की शिक्षा के बावजूद मुझे शायद न रही हो. वह हिंदी और अंग्रेजी भाषा की  जानी मानी लेखिका थी– उसकी कई कहानियां चर्चित रहीं जो उस समय धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान और हंस सरीखी पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित होती रहती थी. उसने दूरदर्शन के कई प्रमुख कार्यक्रमों की स्क्रिप्ट भी लिखी और सामाजिक मुद्दों को भी उठाने का साहस दिखाया. निजी चैनल का जमाना तब तक अजन्मा था.

खैर, मैं सुरभि के आग्रह पर पत्नी के साथ उसके घर पहुंचा जहाँ उसके पति अनन्त भी हमारी ही प्रतीक्षा कर रहे थे. उनके कोई बच्चा नहीं था तब. तमाम औपचारिक बातों और परिचय के बाद उसने मेरी पत्नी से कहा, “जानती हैं आप, वर्मा जी का रिश्ता लेकर आये थे परमार जी, मेरे पास!”, मैं सकपका गया था, परन्तु उसने अपने पति और मेरी पत्नी के सामने बताना जारी रखा, “परमार जी ने मुझे इनके बारे में ऐसे बताया जैसे कोई व्यक्ति किसी लड़की को लड़के के गुणों के बारे में बताता है…”, और यह कहकर उसकी जोरदार, उन्मुक्त खिलखिलाहट वातावरण में फ़ैल गई. अब सब सामान्य हो गया था. हम सब एक दूसरे से काफी घुल-मिल गए थे और समय-समय पर एक दूसरे के घर या बाहर मुलाकातें होती होती रहती थी.

समय बीतता गया, सुरभि  की जिन्दगी के पन्ने खुलते गए. अब अमिय से भी मुलाकातें होती थी जो सुरभि  के पति का मित्र था, और लखनऊ से दिल्ली आकर किसी बड़े समूह के साथ खोजी पत्रकारिता में जुडा था. वह भी सुरभि के घर पर रुका था. यूँ तो सामान्य तौर पर सब कुछ अच्छा दिखता था पर एक दिन पता चला कि सुरभि ने अपना घर छोड़ दिया है. पता नहीं यह उसकी जिन्दगी के प्रति उदासीनता थी या फिर उसके इरादों की मजबूती– जब तक उसने स्वयं नहीं बताया, मैं कभी सुरभि और अनन्त के संबंधों की वितृष्णा महसूस नहीं कर पाया. गंभीर बातों को भी मजाक में उडा देने की प्रवृति जो थी उसकी. बाद में जरूर उसने मुझे बताया था कि किस प्रकार एक-एक दिन उसके सब सपने मर रहे थे. वह जीना चाहती थी अपनी एक विस्तृत, मायावी और परीलोक की सी जिन्दगी में, पर अनन्त चाहता था कि वह नौकरी करे और वहां से लौटकर चूल्हा-चौका संभाले. जैसे-तैसे लगभग पांच साल तक उसने जी भी यह जिन्दगी. और अनन्त? वह पत्रकार था और स्वयं न जाने कितनी नौकरी बदलता था. टिकना उसकी फितरत में नहीं था– और नौकरी छोड़ने के लिये उसके पास प्रबंधतंत्र के विरुद्ध  कोई न कोई सैद्धांतिक मतभेद का बहाना जरूर हाज़िर रहता. साथ में, वह जब भी बिहार के अपने पैत्रक घर से अपनी मां को बुला लेता तो बच्चा न जन्मने के खोट से उपजी कुंठा और उसके रूखे व्यवहार से जो अवसाद मिलता उससे व्यथित हो वह अक्सर लम्बे समय तक ऐसी हो जाती  जैसे नदी के किसी  बंजर किनारे पर पड़े रेत के ढेर जैसी ही उसकी भी नियति हो, सिर्फ भावनाशून्य !

अब, वह नयी दिल्ली के ग्रीनपार्क इलाके में एक वर्किंग वीमेन हॉस्टल में शिफ्ट हो गई थी. उसने एक बार मुझे वहां फोन कर बुलाया भी. वहां की जिन्दगी भी उसके जीवन में रंग नहीं भर पा रही थी. दरअसल, वह उसकी जिन्दगी का ठौर नहीं था, वह उसका संक्रमण काल था. तब उसने अपनी जिन्दगी के वह पन्ने भी मेरे साथ साझा किये जिनसे मैं अनजान था. सुरभि पश्चिम उत्तर प्रदेश के हाथरस जनपद के एक अनजान से कस्बे में पली-बढ़ी थी, जबकि उसका पति बिहार के चंपारण जिले के किसी जमींदार का बेटा था जो वैसे तो एक पत्रकार था, पर मूलरूप से विद्रोही स्वभाव का था. मैट्रिमोनियल विज्ञापन के माध्यम से उनकी शादी तय हुई थी, पर उनके विचार और जिन्दगी में ठहराव सात साल के दाम्पत्य जीवन में शायद कभी नहीं हो पाया. बीच में उससे मिलना जुलना नहीं हो पाता था. उन दिनों मोबाइल फोन नहीं थे, और लैंडलाइन तब एक स्टेटस सिंबल मात्र था, जो हम दोनों के पास नहीं था, इसलिए बातें कम ही हो पाती थी. फिर, वह अपनी भागदौड़ और प्राथमिकताओं की जटिलताओं में अकसर ऑफिस भी मिस कर देती थी, जहाँ जाकर कभी-कभार उसके पास बैठ कर बातें करना हो जाया करता था.

एक दिन हर बार की ही तरह अचानक स्वयं ही हाज़िर हुई सुरभि, उसी खिलखिलाती बेबाक हंसी के साथ. उसने बताया कि वह अनन्त  से अलग हो रही है. मेरे और वैदेही के चेहरे के उड़ते रंग को भांप कर वह आगे बोली–“अलग तो बरसों से थे ही, बस अब अलग-अलग छत के नीचे रहेंगे”. वह शायद कुछ और भी कहना चाहती थी पर जल्दी से चाय का अंतिम घूँट लेकर पुनः आने का आश्वासन दे उठ खड़ी हुई. मैं और वैदेही अभी भी असमंजस में ही थे. वह दरवाजे तक पहंच चुकी थी जब वैदेही ने कहा—“सुरभि ! कोई भी मदद चाहिए हो तो बताना !”, वह बस मुस्कुराते हुये सीढियां उतरती चली गई.

बाद में पता चला की सुरभि और अमिय साथ रहने लगे हैं. उन्होंने कालिंदी विहार के ही सेक्टर-४ के निकट ही एक फ्लैट खरीद लिया था. उसके गृह प्रवेश के समय उन्होंने अपने सभी मित्रों को आमंत्रित किया था. सुरभि के सरल व्यवहार और लेखन की दुनिया में नाम के कारण यूं भी उसके मित्रों की सूची लंबी थी. टी वी तथा पत्रकारिता की दुनिया की कई चर्चित हस्तियों से भी आभा ने मेरा वहां परिचय कराया.

सुरभि की दुनिया में बदलाव अब साफ दिखने लगा था. यह सुरभि मेरे लिए कई मायने में नई थी. उसे देखकर यकीन किया जा सकता था कि सच्चा प्रेम निश्चय ही स्त्री को सहज सौंदर्य प्रदान कर देता है. सुरभि के चेहरे की दमक उसके प्रभामंडल की कहानी स्वयं बयां कर रही थी. अनन्त की निरन्तर उपेक्षा तथा उसकी अपनी अन्मस्यक जटिलताओं ने जहाँ सुरभि जैसी आत्मविश्वासी लड़की को अपने परिधान और लुक तक के लिए उदासीन बना दिया था वहीं अमिय के उसमें विश्वास तथा नैसर्गिक सहयोग ने उसकी जिन्दगी को यकीनन नये आयाम दिये थे. लगता था कि उसे ऊँची उडान के लिए पंख मिल गये हों ! मेहमानों से फुरसत मिलते ही वह मेरे  सामने आ खड़ी हुई, “बताओ कैसी लग रही हूं?“ मैं उसके बदले हुये स्वरूप को यूँ ही निहार रहा था और उसके अचानक प्रश्न से मुझे लगा जैसे मेरी चोरी पकड़ी गई. मेरे जवाब का इन्तज़ार किये बगैर ही वह मेरी बांह पकड़कर बोली – “अरे, लेंस लगाये हूँ. पुरानी यादों के साथ वह पुराना चश्मा भी दफन कर दिया जिससे सब स्याह ही दिखता था”, और फिर वही खिलखिलाहट भरी उन्मुक्त हंसी का झोंका !

अब सुरभि को नवीनतम परिधानों, ज्वेलरी तथा घर की साज सज्जा में भी बहुत आनंद मिलने लगा था. वह समय-समय पर हम लोगों को घर पर भोजन के लिये आमंत्रित करती और मन से अच्छी-अच्छी डिश बनाकर सर्व करती, घर के  इंटीरियर के बारे में सलाह भी लेती. अमिय और वह दोनों बहुत प्रसन्न थे. उन्हें सुनिधि के रूप में जब बेटी की प्राप्ति हुई तो दोनों ने बहुत शानदार पार्टी दी. उसने निकट ही एक और फ्लैट लेकर उसे फिल्म स्टूडियो में बदल दिया था और दोनों मिलकर बेहतरीन डाक्यूमेंट्री, सीरियल्स, लघु फिल्म्स तथा एड फिल्म्स बनाने लगे. सामजिक मुद्दों पर जागरूक करती लघु फिल्मों से समाज को झकझोरना उसका सपना था. पर, गंभीरता के साथ ही परिहास की उसकी आदत बदस्तूर जारी थी. एक बार उसने मेरे घर फोन किया. बेटी ने फोन उठाकर जानना चाहा तो उसका जवाब था, “बेटा, मैं तुम्हारे पापा की गर्लफ्रेंड बोल रही हूँ, बात कराओ उनसे!”.

बेटी को कुछ समझ नही आया. उसे असमंजस में रिसीवर हाथ में लिए खडा देख मैंने पूछा – “कौन है?”

वह बोली—“आपकी गर्लफ्रैंड”.

वैदेही  ने कहा– “सुरभि के अलावा और कोई हो ही नही सकती”.

…इस बीच मेरा चयन लखनऊ में हो गया था. मेरा कोई ख़ास परिचय नहीं था वहां. अमिय के पापा तब लखनऊ में पुलिस विभाग के जाँच प्रकोष्ठ में वरिष्ठ अधिकारी थे, जिन्हें वहां पुलिस लाइन में सरकारी आवास मिला हुआ था. पुलिस के दंद-फंद से दूर सात्विक प्रवृति थी उनकी. सुरभि  ने अपना भी प्रोग्राम बनाया और रिजर्वेशन कराया लखनऊ के लिये. मैं और वह लखनऊ मेल से दिल्ली के लिये रवाना हुये. सुनिधि लगभग दो साल की रही होगी. टिकट दो थे, और रिजर्वेशन केवल एक सीट का कन्फर्म हुआ था. मैंने सुरभि  को सीट दे दी. वह सुनिधि  को लेकर निचली सीट पर सोने के लिए तैयारी के साथ लेट गई. मैं कभी इधर बैठता, कभी उधर. अन्ततः मध्यरात्रि के आसपास टिकट चेकर ने टिकट चेक किये और सुझाव दिया कि कोई सीट खाली नहीं है, क्यूँ न आप दोनों इसी सीट पर एडजस्ट हो जायें…! सुरभि ने मेरी तरफ देखा, और मैंने सुरभि  की तरफ…फिर सुरभि उसी स्फूर्त हंसी के साथ खिलखिला पड़ी जो उसका ट्रेडमार्क थी. टी टी महोदय अपने कंधे उचककर आगे निकल लिये थे.

सुरभि  के साथ बिताए वह दिन मेरी स्मृति में जस के तस कैद हैं. न केवल उसने मुझे लखनऊ की प्रमुख जगह दिखाई वरन दो दिन में ही कई लोगों से मेरी मुलाकात भी कराई. ऐसे लोग जो आज भी मेरी जीवन यात्रा में मेरे लिए संबल बने हैं.  मैं लगभग दो सप्ताह सुरभि  की ससुराल में रहा. उनके श्वसुर बेहतरीन इंसान थे और सास बहुत ममत्वपूर्ण. बिलकुल घर की तरह बीत गए वह दिन मेरे. बाद में भी, उनके रिटायरमेंट तक, उनसे मिलना-जुलना लगातार बना रहा और उनका वही स्नेह भी लगातार मुझे मिलता रहा.

मैं जब भी दिल्ली जाता सुरभि  से मुलाकात जरूर होती. वह अपनी व्यस्तता के बावजूद मेरे लिये समय निकालती और हम सब मिलकर कुछ अदद मिली-जुली यादों में उलझ जाते. सुनिधि ने सुरभि को अपना प्यार और ममता उड़ेलने का एक और जरिया प्रदान कर दिया था. वह अपनी व्यस्तताओं के बावजूद सुनिधि के बचपन को भी पूरी शिद्दत के साथ जी रही थी. सुरभि  ने अपनी सरकारी नौकरी को अलविदा कह दिया था. या, बकौल सुरभि, उसने एक दिन यूँ ही ऑफिस जाना बंद कर दिया, न कोई इस्तीफ़ा, न कोई हिसाब किसी तनख्वाह या फण्ड का. बस, छोड़ दी नौकरी !

आज, फिर से, यह सब यादें मेरी आँखों के सामने तैर रही हैं. लेकिन अंतर यह है कि आज मेरा मन अन्दर से रुदन कर रहा है. अंतिम बार गौतम बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली सारनाथ पर पर्यटन विभाग के लिये निर्मित्त लघु फिल्म उसने मुझे बहुत मन से दिखा कर उसके निर्माण की बारीकियों के सम्बन्ध में भी समझाया था. अभी भी याद है मुझे वह खूबसूरत फिल्म. उसके फेड इन, और फेड आउट इफ़ेक्ट, साथ ही बेहतरीन कल्पनाशील स्क्रिप्ट ! बिहार सरकार ने पर्यटन संबंधी कई परियोजनाओं पर विचार-विमर्श के लिये उन्हें आमंत्रित भी किया था. उनकी अगली फिल्म तमिलनाडु के शिवाकासी में पटाखा उद्योग की दशा पर प्लांड थी…और फिर एक सुबह, मैंने लखनऊ में अखबार में खबर पढ़ी— “प्रसिद्ध लघु फिल्म निर्माता पति-पत्नी की आग में घिरकर मौत” !

सुरभि  से मेरा कोई रक्त का सम्बन्ध नहीं था, पर कुछ कमतर भी नहीं था. एकबारगी मुझे लगा कि यह नहीं हो सकता. उस संक्षिप्त समाचार को फिर मैंने अन्य समाचारपत्रों में भी पढ़ा. मेरी आँखों के सामने अँधेरा छा रहा था. लगा, कि मेरा दिल बैठा जा रहा है. उससे जो रिश्ता था वह ऐसे कैसे विलीन हो सकता था? ईश्वर इतना निर्दयी कैसे हो सकता है ? अभी तो उसकी जिन्दगी के बेहतर दिनों का आगाज़ हुये मात्र चंद साल ही बीते थे. कितनी प्रसन्न दिखती थी वह. पर, खबर सच थी. बाद में पता चला कि सुरभि और अमिय ने वह रात अगर किसी अच्छे होटल में गुजारी होती तो शायद वह दोनों आज हमारे बीच होते. पर, उन्हें तो जूनून था. काम में जब तक वह दोनों अपना दिल-दिमाग और शरीर सब कुछ नहीं झोंक देते थे, उन्हें मजा नहीं आता था. बाद में पता चला कि उन्होंने स्वयं यह निर्णय लिया था कि वह पटाखों के विशाल गोदाम के ऊपर बने कमरे में ही रात्रि विश्राम करेंगे ताकि सवेरे भोर से ही शूटिंग की जा सके. शार्ट सर्किट से उठी आग की लपटों से कम, दम घुटना उनकी मौत का कारण अधिक बना. कहें तो उनका काम के प्रति जूनून ही उनकी मौत का कारण बना.

….आज, सुनिधि को पुरस्कार मिलने की खबर से पुनः मेरी आँखें नम हो आई. पर, आज यह आंसू ख़ुशी के थे. सुरभि के स्वप्न को जो जिया था सुनिधि ने, उसके अधूरे काम को बेहतरीन ढंग से पूरा कर. फिल्म थी “शिवाकासी—एक स्वप्न की मौत”, जो वहाँ के असंगठित पटाखा उद्योग में लगे हजारों बाल श्रमिकों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिति के दोहन तथा सरकारी उपेक्षा पर एक बेहतरीन रिपोर्ताज थी ! …कम से कम सुरभि  और अमिय का यूँ अचानक अखबार के पन्ने में एक खबर में सिमट जाने का आशीर्वाद सुनिधि को मिल गया था. क्या सपने मरते हैं भला कभी ?

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–राजगोपाल सिंह वर्मा 

रामकिशोर

आज लगातार तीन दिन हो चुके थे, अपनी आदत के विपरीत रामकिशोर को बिना किसी पूर्व सूचना के अनुपस्थित रहे हुये. पहले दिन जरूर उसकी पत्नी का फोन आया था कि वह वाइरल से पीड़ित हैं, और आज नहीं आ सकेंगे. अगले दिन मैंने अपने अर्दली से जानकारी लेने को कहा तो पता चला कि मोबाइल स्विच ऑफ है.  उसके बाद भी वह ऑफिस नहीं आया तो मुझे चिंता हुई. तब तक चौकीदार हारून जीवित था, और अकसर वह भी ड्राईवर की ड्यूटी करने को बेझिझक तैयार रहता था. वैसे भी ऑफिस के कर्मचारी ना तो रामकिशोर के घर कभी आना-जाना रखते थे, और ना ही वह किसी से ऐसे सम्बन्ध निर्वहन की अपेक्षा रखता था. बस, केवल हारुन ही था, जो उसका घर जानता था.

तो, दोपहर के बाद लगभग ४.३० बजे हारून को लेकर मैं रामकिशोर के घर की ओर रवाना हुआ. उसका घर ऑफिस के ठीक विपरीत दिशा में उत्तर में था जबकि कार्यालय आगरा जैसे व्यस्त नगर में दक्षिण के छोर पर स्थित था. संकरे रास्तों से पार करते हुए हम लोग अंततः खटीक मोहल्ले के उस छोर पर पहुँचने में सफल हो गये जो जयपुर की ओर जाने वाली रेलवे लाइन के समानांतर चलते हुए बीच-बीच में ऊबड़-खाबड़ तथा और भी संकरा  भी हो जाता था. रामकिशोर के घर के नजदीक गली में मुड़ने तक रास्ते की कूड़े की दुर्गन्ध नथुनों में अधिक प्रवाह से चढ़ने लगी थी. मन खराब सा हो रहा था, कोई दुर्बल मन का व्यक्ति होता तो अब तक इरादा बदल चुका होता, परन्तु मैं अपने निश्चय पर दृढ था. अब मंजिल भी नजदीक थी, इसलिये भी हिम्मत खोने का खतरा लेना मूर्खता होती.

ड्राईवर का कोई अपना नाम भी होता है, यह बहुत कम लोग जानते हैं, या जानना नहीं चाहते क्यूंकि वे स्वयं, उनके परिजन, बच्चे या मित्र भी उसे ड्राईवर के नाम से ही संबोधित करना अपना धर्म समझते हैं. इसके विपरीत, बचपन की एक घटना ने मेरे मन पर ऐसा प्रभाव डाला कि मैं अपने ड्राईवर के साथ-साथ किसी टैक्सी या अन्य दूसरे ड्राईवर के साथ कहीं यात्रा करने से पूर्व उसका नाम पूछना नहीं भूलता, और बाद में उसे उसी नाम से संबोधित करता हूँ. बात उन दिनों की है जब मैं अपने पिता के साथ उनके एक मित्र अधिकारी के घर गया था. उन्होंने जैसे ही अपने ड्राईवर को चलने के लिये आवाज लगाई तो वह गाडी की चाभी का गुच्छा उनकी मेज पर रखकर हाथ जोड़कर बोला, “सर, बहुत हुआ, अब हम नौकरी नहीं कर पायेंगे. आप हमें इन्सान नहीं कुछ और ही समझते हैं. जब हमारी पहचान ही नहीं बन पा रही, तो ऐसी नौकरी की रोटी कैसे हज़म करें. फिर हमारा नाम इतना बुरा भी नहीं”. चौबे जी की समझ में बात आ गई, और उसके बाद वह उस ड्राईवर को हमेशा विनोद के नाम से ही पुकारते पाये गये. दरअसल आपका नाम जो भी हो, वह नाम दूसरे किसे व्यक्ति के मुंह से जब लिया जाता है तो उस व्यक्ति के कानों में संगीत का सा काम करता है, ऐसा मेरा मानना है, और मेरी इस सोच के कई बार मुझे अद्भुत परिणाम मिले हैं.

जी,  रामकिशोर मेरा ड्राईवर था. वह मुझे सरकारी ओहदे के कारण मिला हुआ था, जिसकी अलिखित ड्यूटी में अघोषित समय तक मेरे साथ रहना, और आवश्यकतानुसार छुट्टियों तथा देर समय तक भी अपनी ड्यूटी को निभाना शामिल था, जिसके लिये उसे अलग से पारिश्रमिक भी मिलता था. गाडी की पार्किंग कार्यालय परिसर में होती थी, इसलिये या तो एक दिन पूर्व वह बताये समय पर मेरे घर की डोरबेल को अपनी चिर परिचित लम्बी घंटी के रूप में  पुश करता था, या ऑफिस में समय से पहुँच कर मेरी कॉल की प्रतीक्षा करता, और १० मिनट के भीतर घर के गेट पर खड़ा होता था. लोग बताते हैं कि वह १० बजे के समय से काफी पूर्व, आमतौर पर ८.३० बजे सुबह ही अपनी साइकिल से कार्यालय पहुँच जाता और एक घंटे तक मनोयोग से गाडी की सफाई करता. पता नहीं ऐसी सफाई की कुछ जरूरत भी होती है या बस यूँ ही. भरी सर्दियों और बारिश या आंधी-तूफ़ान में भी वह अपना रूटीन परिवर्तित करता हो, ऐसा मेरी जानकारी में नहीं था. वैसे रामकिशोर का घर कार्यालय से लगभग १२ किलोमीटर दूर था. यानि उसे कार्यालय आने और जाने में २४ किलोमीटर प्रतिदिन की साइकिलिंग तथा दो घंटे अतिरिक श्रम करना पड़ता था. शायद इसी कारण वह अपने रिटायरमेंट से मात्र दो वर्ष पूर्व तक भी अपनी काया को छरहरा बनाये रखने में सफल दिखता था.

मीटिंग्स तथा भ्रमण कार्यक्रमों में ले जाने के अलावा उसे बाकी का समय ऑफिस में ही गुजारना पड़ता था. वह दिन भर हाल में आराम से बैठा रहता. दोपहर में नियत समय पर गाडी से निकालकर अपना टिफिन लाता और एक कोने में बैठकर अकेले अपना खाना खा लेता. गाडी में टिफिन रखने का लाभ यह था कि वह आवश्यता पड़ने पर बाहर भी अपना भोजन समय से कर सकता था. इस बीच अगर कभी मुझे भी किसी जरूरी काम से कहीं जाना होता तो भी वह बेपरवाह बन कर उसी गति से भोजन करता, जिससे पहले से करता आ रहा था. हारकर, मैंने स्वयं आदत डाल ली थी कि वह आराम से भोजन कर निवृत हो जाये तभी चलने की बात सोची जा सकती थी, भले ही कोई इमरजेंसी क्यूँ न हो ! यदि किसी समारोह में, या शादी जैसे कार्यक्रमों में मुझे सरकारी गाडी से जाना पड़ता तो भी वह अपने टिफ़िन से ही भोजन करता, कई बार तो आयोजकों के बहुत अनुनय-विनय पर भी वह टस से मस नहीं हुआ, और मैंने उसे फिर भोजन के लिये पूछना भी छोड़ दिया. उसने इस नियम को कभी भी नहीं तोडा, हाँ, नगर से बाहर की बात अन्यथा थी, वहां इस आदत को वह छोड़ देता.

रामकिशोर दिन में भोजन के अलावा दो बार चाय जरूर पीता, पर वह चाय ऑफिस में कभी पीते नहीं देखा गया. उसका शौक था कि अपने किसी साथी चपरासी या अन्य कर्मचारी को चाय वाले की दुकान पर ले जाता जहाँ वे एक-एक कप चाय पीते और आपस में तथा अन्य ग्राहकों से दुनिया-जहाँ के मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखते. इसके लिये उसे कम से कम ४५ मिनट का समय देना जरूरी था. वह चाय पीने जब भी जाता धीरे से मेरे कक्ष का आधा दरवाजा खोलता, और पूछ कर जाता. अगर उसे कहा जाता कि आधे घंटे में आ जाना, चलना है कहीं, तो वह असमंजस में पड़ जाता, और बोलता कि ठीक है सर, बाद में पी लेंगे चाय, आप चलिये.

हाँ, एक बात और. वह सवेरे चींटियों को आटा और खाना खाने के बाद चिड़ियों को दाना, और रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े पूरे नियम से जरूर डालता. इसके लिये उसने ऑफिस की चारदीवारी की एक मुंडेर की जगह निर्धारित की हुई थी. वहां गर्मियों में पक्षियों के लिये बाजरा और मिटटी के बर्तन में पानी की व्यवस्था की भी उसने जिम्मेदारी खुद ही ओढ़ी हुई थी. आसपास मंडराने वाले कुत्तों को भी वह कुछ न कुछ प्यार से खाने का भी इंतज़ाम करता रहता. वह सब निरीह बनकर पूँछ हिलाते हुये उसके आसपास मंडराते दिख जाना आम बात थी.

इस सबके बावजूद, रामकिशोर के बारे में मशहूर था कि वह एक नंबर का कंजूस था. वह चाय की दुकान पर जाता जरूर था, लेकिन किसी न किसी का साथ लेने का मतलब चाय के पैसे उससे दिलवाना होता था. अगर कभी मजबूरी में चाय पीने के लिये कोई और पैसे न निकलता तो बस अपनी चाय के पैसे भरने तक ही उदारता रहती उसके मन में. लोग बताते थे कि उसका काफी पैसा ब्याज पर भी चलता है, और उसने दो गाड़ियाँ टैक्सी में भी चलवा रखी हैं, वगैरह, वगैरह. ऑफिस के सब कर्मचारियों के बारे में सब एक दूसरे को जानते थे कि कौन किस किस्म के नशे के चंगुल में हैं, परन्तु मैं तो आज तक नहीं जान पाया कि रामकिशोर कौन सा नशा करता था. गाडी चलने में वह पूरा अलर्ट रहता, नशे में तो मैंने उसे कभी नहीं देखा. शहर से बाहर या यूँ कहें कि अनजान रास्तों पर उसका आत्मविश्वास जवाब दे जाता, विशेष रूप से जब भी दिल्ली या नॉयडा जाना होता. “अब किधर, अब किधर”, “साहब बाएं या दायें”, “जी, किधर”, बस ये ही उसके शब्द होते. कई बार झुन्झुलाहट भी होती, मैंने एक दो बार बोला भी कि भई, ड्राईवर कौन है, आप या मैं, पर मैं धीरे-धीरे समझ गया, और मैं अब  समय पड़ने पर उसका जीपीएस ट्रैकर का रोल करने में बुरा नहीं मानता था.

अभिवादन के अलावा पिछले लगभग पांच साल में उसका-मेरा कोई संवाद हुआ हो, ऐसा मुझे स्मरण नहीं पड़ता. हाँ, उसको आब्ज़र्व करते हुये ही मेरे पास इतने किस्से इकट्ठे हो गये थे कि उस पर एक पूरा उपन्यास लिखा जा सकता था. उसकी एक आदत मुझे बहुत पसंद थी, इशारों को समझकर काम को अंजाम देना. अगर चलती गाडी में मेरी कोई महत्वपूर्ण कॉल आ जाती तो वह हल्की सी तिरछी निगाहों से मुझे देखता और सड़क के किनारे गाडी लगाकर, गाडी से कुछ दूर इस प्रकार खड़ा हो जाता कि वार्तालाप का कोई अंश उसके कानों में न पड़ जाये. मैंने उसे न तो कभी अपने बारे में कुछ कहते सुना और न ही किसी की शिकायत करते.

एक और किस्सा. मेरे निर्देश थे कि यदि मैं अन्यथा न बताऊँ तो उसे सवेरे ठीक १० बजे गाडी लेकर घर पर उपस्थित हो जाना है. अगर मुझे कोई परिवर्तन करना होता तो मैं या तो उसे एक दिन पूर्व ही बता देता या फोन पर निर्देश दे देता. भीषण ठण्ड का समय था वह. मेरा मन बहुत आलस्य से भरा था. कोई विशेष काम भी नहीं था ऑफिस में. मैंने पत्नी को सुबह ही बता दिया था कि आज मैं बस अपनी नींद पूरी करूंगा, न ऑफिस जाना और न कुछ और. मुझे याद ही नहीं रहा कि अगर रामकिशोर को मना नहीं किया तो वह अपने समय पर हाज़िर हो जाएगा. खैर, मैंने रजाई तानकर सोने की अपनी इच्छा को मन भर पूरा किया. बारह बजे के आसपास उठकर स्नान कर, ब्रेकफास्ट किया, और फिर बिस्तर में घुस गया. मोबाइल मैंने अपना स्विच ऑफ कर लिया था. जानता था कि यदि कोई बहुत ही जरूरी काम होगा तो सरकारी लैंडलाइन पर कॉल आ ही जायेगी. लगभग चार बजे फिर से कुछ भूख लगी तो उठ बैठा और कुछ हल्का भोजन लेकर मैं लॉन में टहलने आ गया. सरकारी मकान काफी बड़ा था. लगभग छः हज़ार वर्ग फुट का तो लॉन ही होगा, उसके बाद फिर खुला एरिया और चारदीवारी के बाद प्राइवेट रोड़ जो महात्मागांधी मार्ग की मुख्य सड़क पर खुलता था. अचानक मुझे घर के बाहर चारदीवारी के पार अपनी सरकारी गाड़ी खड़ी होने का आभास हुआ. मैंने गौर से देखा, हाँ, यह तो सरकारी टाटा स्पेसियो थी. मैंने कौतुहलवश नजदीक आकर देखा तो रामकिशोर बाहर एक छोटे से चबूतरे पर बैठा हुआ ऊंघ रहा था. मैंने नजदीक जाकर पूछा, “तुम कब आये यहाँ”, वह हडबडाकर खड़ा हो गया, और बोला, “जी, सुबह १० बजे”.

…उफ़, मुझे बहुत ग्लानि हुई. यह सही था कि मुझे याद ही नहीं रहा उसको मना करना, न ही कोई फोन किया; और वह हमेशा की तरह अपने समय पर आ बैठा. यही नहीं, वह पिछले छह घंटों से कडकती ठण्ड में बाहर बैठा अपनी ड्यूटी निभा रहा है, और मैं नींद की विलासिता में डूबा हुआ, अपने पद के दुरुपयोग में संलिप्त हूँ. मैंने उससे अपने अक्षम्य-से अपराध के लिये क्षमा मांगी और उसे मुक्त किया. उसने केवल एक मुस्कान में मुझे प्रतिउत्तर दिया, और अभिवादन कर वापिस चला गया. पर, मेरी ग्लानि ने काफी समय तक मुझे बहुत कष्ट दिया.

अगर रामकिशोर का हुलिया आपको बताया जाये तो मेरे सहित कुछ लोगों की राय थी कि वह अपने समय में तमिलनाडु के कुख्यात दस्यु सम्राट वीरप्पन का मिनी रूप लगता था, खास तौर से अपनी विशिष्ट घनी व् घुमावदार मूंछों के कारण, जो हालाँकि मेरी राय में उसके अपेक्षाकृत कमजोर हड्डियों के ढांचे वाले शरीर पर जंचने के बजाय उसे कार्टून का रूप अधिक प्रदान करती थी, पर कुछ लोग बिना किसी परवाह के अपना लुक बनाये रखने में ही शान समझते हैं—वह उनमे से ही एक था. जब हँसता तो उसके आगे के सिर्फ दो ही दांत दिखाई पड़ते, जो उसकी हंसी को विद्रूपता में बदल देते. उसके साथी कहते कि साहब यह जो पक्षियों और कुत्तों को रोटी के टुकड़े डालता है, उसका कारण रोटी के कड़े किनारों का उसके जबड़ों से न चबाया जाना है, न कि उसका प्रेम भाव.

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…पिछले लगभग पांच सालों की इन यादों के बीच पता ही नहीं चला कि कब रामकिशोर का घर आ गया. गली का अंतिम मकान, जहाँ उसका किनारा अस्थाई दीवार, जो बीच से जगह-जगह से टूटी थी और टीन की एक चादर के टुकड़े से ढंका था, उसकी बाउंड्री का ऐलान कर रहा था. टूटी, अधूरी कुण्डी को थपथपाने से पहले ही, कौतूहलवश गाडी की आवाज को सुनकर, एक अपेक्षाकृत हष्ट-पुष्ट महिला ने आधा दरवाजा खोल कर झाँका ही था, कि वह और हारून एक दूसरे को पहचान गये. मैं तब तक दूर ही था कि हारून ने इशारे से मेरे आने की सूचना सार्वजनिक कर दी थी. वह एक कमरेनुमा आधे-अधूरे से मकान में घुस कर तेज़ी से एक कुर्सी उठा लाई और उसे एक कपडे से झाड़ने का उपक्रम करने लगी. कुर्सी लोहे की थी, और उसके हत्थों व अन्य जगहों पर जंग के पुराने निशान दृष्टिगत हो रहे थे, जिन्हें संभवतः कभी दूर करने का प्रयास नहीं किया गया था.

पत्नी ने रामकिशोर को हमारे आने की सूचना दे दी थी…पर उसे आने में थोडा समय लग रहा था. वह एक स्टील के गिलास में मुझे पानी भी दे गई थी. हारून काफी दूरी पर खड़ा था. पत्नी ने बताया कि आज उसका बुखार कुछ कम हुआ है. शायद, परसों तक कमजोरी भी दूर हो जाए, ऐसा डॉक्टर का कहना है. मैंने रामकिशोर के आने की प्रतीक्षा करने से पहले उसकी पत्नी से ही जानना चाहा कि उसका मोबाइल क्यूँ स्विच ऑफ है, जिस पर पत्नी ने बताया कि बेटे का मोबाइल कुछ खराब हो गया था, तो टेम्पररी तौर पर उसने अपने पापा के मोबाइल में अपना सिम डाल रखा है, जिससे वह स्विच ऑफ बताता है. मुझे थोडा अटपटा भी लगा यह तर्क पर मैंने मान लिया. अभी भी रामकिशोर बाहर नहीं आ पाया था. मना करने के बावजूद उसकी पत्नी चाय बनाने चली गई थी.

जिस जगह मैं बैठा था, वह वरांडा कहा जा सकता है. चूँकि कमरा एक ही प्रतीत हो रहा था, इसलिये उस वरांडे को ही ड्राइंग रूम के तौर पर प्रयुक्त किया जा रहा था. वह हालाँकि अपेक्षाकृत बड़ा एरिया था, जिसके एक भाग से बाहर का दृश्य व खुली जगह साफ़ दिखाई पड़ती थी. मैं देख पा रहा था कि उस कक्ष के बाहर दो कुत्ते बैठे थे, एक बिल्ली कई बार हमारे नज़दीक से आकर गुजरी, जिससे लगता था कि वह पालतू है. दरवाजे के बाहर दो मिट्टी के बर्तनों में पक्षियों का दाना और पानी रखा हुआ था. अभी दो तोते बेख़ौफ़ पानी पीने के बाद उसमें किलोल कर रहे थे.

तब तक रामकिशोर बाहर आ गया. दूर से ही उसने अपने हाथ जोड़ लिये थे, और मैंने भी उसी तरह उसका अभिवादन लगातार तेज़ बुखार से उसका शरीर क्षीण पद गया दिखता था. वह एक छड़ी के सहारे धीमे-धीमे पास आया और नज़दीक पड़ी चारपाई पर बैठ गया. उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और चेहरा पीला पड़ गया था. मैंने जानकारी लेनी आरम्भ की थी कि घर के बाहर बैठे दोनों कुत्ते कुछ आभास सा पाकर धीरे-धीरे उसके पास आ गये और पैरों में लगभग लोटपोट हो गये, वह उन्हें सहलाता जा रहा था और अपने इलाज़ का अपडेट भी मुझे देता जा रहा था. उधर, आसपास घूम रही बिल्ली भी अब बेखौफ रामकिशोर की गोदी में जा बैठी थी, मानो उसे कुत्तों पर प्यार प्रदर्शित करने पर अपना रोष प्रकट करना हो. बिल्ली की म्याऊं-म्याऊ तथा कुत्तों की कूं-कूं के साथ प्यार भरी हलकी भौं-भौं से वातावरण में काफी ममत्व आ गया था. इस बीच उसका एकमात्र बेटा जो इंटरमीडिएट की पढाई कर रहा था, भी आ गया था, परन्तु उसने अभिवादन के नाम पर अपनी गर्दन हल्के से झुकाने के अलावा रुकने का भी प्रयास नहीं किया और सीधे कमरे में चला गया.

बुलाये जाने पर बेटा फिर से पास आया और न जाने क्या सोचकर उसने मेरे पैर छुए. अमित था उसका नाम. पूछे जाने पर उसने बताया कि वह पिछले साल अच्छी तैयारी न होने के कारण अपना एग्जाम नहीं दे पाया था. इस बार अच्छी से तैयारी के बाद फिर से एग्जाम देना है. उसके टाइट कपड़ों, फ़िल्मी हेयर स्टाइल और उसके आने से वातावरण में महक रहे परफ्यूम की सुगंध उसके पढाई के स्तर की चुगली कर रहे थे. बेटे से हुई संक्षिप्त वार्तालाप के दौरान रामकिशोर नीची निगाहें किये शांत बैठा रहा. इस बीच मैंने गौर किया कि एक विचित्र घटना घटी. अभी तक रामकिशोर के पैरों में लोटपोट कर रहे कुत्ते, गोदी में मचल रही बिल्ली और बाहर पानी पीते हुये तोते— सब धीरे-धीरे गायब हो गए, ऐसे, जैसे कहते हैं ना कि गधे के सर से सींग !

मैंने इस बीच चाय की घूंट खत्म कर ली थी. हारुन भी तैयार खड़ा था. रामकिशोर को अच्छे स्वास्थ की कामना के साथ उससे विदा ली, लेकिन वह बाहर मुझे गाड़ी में बिठाये बिना नहीं जाने वाला था, सो साथ चलने लगा. गेट से सटी खडी नई रॉयल-इनफील्ड क्लासिक मोटरसाइकिल के ५०० सी सी के डस्ट स्टॉर्म रंग के सबसे महंगे वर्ज़न से मेरी आँखें एकबारगी चुंधिया-सी गई. जब मैं आया तो यह बाइक कवर से ढक कर खड़ी थी, इसलिये उसकी भव्यता पर ध्यान नहीं गया. कभी मैंने भी इरादा किया था उसे लेने का पर या तो पूरे पैसे नहीं जुटा पाया, या फिर कंपनी के न्यूनतम छह माह के वेटिंग पीरियड के कारण मेरी किस्मत में वह नहीं हो पाई.

…अमित उस साफ़ मोटर साइकिल को भी शीशे की तरह चमकाने की अपनी कोशिशों में जुटा था. उसने अपने काम में जुटे हुए ही मुझे एक मुस्कुराहट युक्त अभिवादन किया !  …दोनों कुत्ते निरीह सा बन दूर से ही टकटकी लगाकर देख रहे थे, बिल्ली भी आस-पास नहीं दिख रही थी, हाँ कुछेक चिड़ियाएँ जरूर पानी के पात्र के आस-पास फुदक रही थी. गाडी में बैठने के बाद मैंने देखा कि अमित कुत्तों को कंकड़ के टुकड़े फेंक कर भगा रहा था. एक मोटा टुकड़ा उनमें से छोटे कुत्ते पर लगा और वह बिलबिलाकर भाग खड़ा हुआ. रामकिशोर ने एक बार बेटे अमित को घूरा और फिर प्यार से उस कुत्ते की और नजर डाली जो धीरे-धीरे आँखों से ओझिल हो गया था..

….और गाडी उस गली से काफी दूर निकल आई.

 

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–राजगोपाल सिंह वर्मा 

पंडित जी !

पिछले कुछ महीनों से गाडी पर निर्भरता काफी बढ़ गई थी. यूँ तो मेरे पास दुरुस्त हालत में बजाज पल्सर की बाइक है, जो बेसमेंट में गाडी के ठीक बगल में खड़ी रहती है, बाइक चलने का रोमांच अलग ही है, परन्तु सर्दियों में बाइक चलाना कतई भी अच्छा नहीं लगता, भले ही १०० मीटर दूर ही क्यूँ न जाना हो. सर्द हवा के झोंकों, और हाड़ कंपाती ठण्ड के मौसम में बाइक का उपयोग करना, और वह भी जब कि आपके पास फोर व्हीलर मौजूद हो, कोई अक्लमंदी का विकल्प तो है नहीं.

खैर, सर्दी अच्छी खासी थी. तीन दिन बाद मेरठ और नॉएडा के अपने सफ़र से आज शाम लौट आया हूँ. सरकारी काम के लिये तो चौबीस घंटों सरकारी गाडी व् ड्राईवर की सुविधा है. अगर व्यक्तिगत काम से कहीं अकेले जाना हो तो मुझे ट्रेन से भी बेहतर वॉल्वो में सफ़र करना सुहाता है. सही टाइम टेबल और सही स्थान से हर मौसम में लग्जरी बस जितनी सुगमता से आपको मिल सकती है, ट्रेन के विषय में, खासकर सर्दियों में तो ऐसा सोचना अकल्पनीय सा है. पुश बैक सीट पर थोडा आगे-पीछे फैलने की भी गुंजाईश होती है और कुशनिंग भी इतनी होती है कि उसे ए सी के चेयर कार की सीट से तो बेहतर ही कहा जा सकता है. उस पर कोहरा-धुंध तो ट्रेन के विलम्ब से चलने या रद्द होने का साल-दर-साल में सीजन भर का एक रटा-रटाया बहाना बन गया है रेलवे के लिये. मेरा घर आगरा के अन्तर्राज्यीय बस टर्मिनस के दो किलोमीटर के दायरे में होना भी स्टेशन के एक घंटे के मुकाबले पांच मिनट में पहुँचने की गारंटी की तरह है, क्यूंकि या तो ऑटो उस दिशा में जा रहे होते हैं या वाहन उधर से आ रहे होते हैं.

ऑटो से घर पहुंचकर फ्लैट की उस एक्स्ट्रा चाभी को लगाकर दरवाज़ा खोला, जो अक्सर मेरे पास रहती है. ड्राइंग रूम से ही दिख गया कि पत्नी बेडरूम में सिरहाने तकिया लगाकर रजाई में बैठी, कई रंगों के अधूरे स्वेटर की बुनाई के लिये ऊन तथा सलाइयों से जूझ रही है. यह स्वेटर वह अपने पडोसी मिसेस दुबे की पुत्रवधू के अजन्मे शिशु के लिये बना रही है. पिछले कई वर्षों के अंतराल के बाद पत्नी के हाथ ऊन और सलाइयाँ लगी हैं, और वह अपना पसंददीदा जूनून पूरी शिद्दत के साथ उतारने में जुटी है, यह जानते हुए भी कि उसकी स्लिप डिस्क की बीमारी में शरीर को जैसा आराम चाहिये वैसा वह उसे दे नहीं पा रही है. मुझे याद था कि कल उसका डॉक्टर से भी अपॉइंटमेंट था. कल, जो बीत गया है. उसने मुझे जाने से पहले बताया भी था और मैंने कहा भी था कि, ‘देखते हैं !’. क्या करूं, जाना भी जरूरी था, नहीं तो पता नहीं कौन सी और बड़ी मुसीबत मोल पड़ जाती.

डॉ वशिष्ठ अस्थि रोग के जाने-माने विशेषज्ञ हैं शहर में. पास में, नेशनल हॉस्पिटल में वह सप्ताह के केवल मंगलवार के दिन ही ओ पी डी में पेशेंट्स देखते हैं. मंगलवार का अपॉइंटमेंट तो मिस हो गया, अब लगभग १० किलोमीटर दूर सदर बाज़ार के निकट उनके आवास पर ही दिखाना पड़ेगा. मैंने सुबह ही पत्नी को तैयार रहने के लिए बोल दिया था. १०.३० बजे सुबह हम दोनों घर से निकल कर डॉक्टर के पास जाने के लिये नीचे उतरे. मैंने पत्नी को बगल की सीट पर बिठाया और इग्निशन स्टार्ट किया. …उफ्फ, यह क्या? इग्निशन घुर्र घुर्र की आवाज़ के साथ बंद हो गया. दो बार और कोशिश की पर वही स्थिति थी.

पत्नी ने उस समय जिस दृष्टि से मुझे घूरा, उसका वर्णन करने के लिये फिलहाल मेरे पास उपयुक्त शब्द नहीं हैं पर वह मुझे गुस्सा, तिरस्कार और हेय सा साबित करती नज़र का मिश्रण व अंदाज़ था उनका. उनका यह गुस्सा भी जायज लग रहा था. उधर, मुझे स्वप्न में भी यह अंदेशा नहीं था कि गाडी स्टार्ट ही नहीं हो पाएगी. कोई सवा साल ही तो हुए हैं, इसे लिये हुए. अर्थात मैं भी पूरी तरह से इस प्रकरण में निर्दोष ही था. यह निश्चित था कि बाइक पर मैडम के जाने का कोई चांस नहीं था. ऑटो उस रूट तक प्रतिबंधित हैं. वैसे ही उनको आम तौर पर भी बाइक पर बैठना अच्छा नहीं लगता, अब तो कमर का दर्द, जो हल्के से गड्ढे या टूटी-फूटी सड़क और स्पीड ब्रेकर पर असहनीय हो जाता था, के कारण मैं भी अब उन्हें बाइक पर नहीं ले जाना चाहता था.

मैंने कुछ क्षण सोचा, फिर स्टीयरिंग पर टेक लगाये हुये ही कंपनी के सर्विस सेंटर पर फोन मिलाया. सौभाग्य से मेरी गाडी के साथ सम्बद्ध एग्जीक्यूटिव भान सिंह से फोन मिला गया. “जी, मैं समझ रहा हूँ कि यह बेट्री की प्रॉब्लम हो सकती है, पर आपको गाडी तो यहाँ लानी पडेगी, तभी तो हम चेक कर पायेंगे”, यह कह कर वह अपना पल्ला झाड़ते नज़र आ रहे थे. अब उन्हें कैसे समझायें कि स्टार्ट हुए बिना गाडी को वर्कशॉप ले जाना कितना दुरूह कार्य हो सकता है. मेरी तमाम तरह की कोशिशों, या कहें मिन्नतों के बावजूद उसने इस काम में मेरी मदद करने में असमर्थता व्यक्त कर दी.

पत्नी का मूड उखड चुका था. उसने अपना पर्स, डॉक्टर के पर्चों और रिपोर्ट्स वाली पालीथीन की थैली को समेटा और बुदबुदाते हुए पहली मंजिल पर घर जाने के लिये जीने की और चल दी. मैं अभी भी गाडी के स्टीयरिंग व्हील पर ही था, मैंने एक प्रयास और किया, परन्तु इस बार बैटरी बिलकुल फुस्स हो गई लगती थी, क्यूंकि अब घुर्र-घुर्र की आवाज़ भी नहीं निकल रही थी.

मैंने बिना समय खोये किसी बैटरी मैकेनिक को ढूँढने की ठानी. नजदीक ही ट्रांसपोर्ट नगर के अव्यवस्थित से और ऊबड़-खाबड़ सड़कों में आड़े-टेढ़े खड़े ट्रकों के बीच एक दुकान मिल गई जो केवल वाहनों की बैटरी के विक्रय का ही काम करता था. दूकानदार पहले ही तीन ग्राहकों से जूझ रहा था जिनमें से एक सरदारजी उसकी दी हुई बैटरी की शिकायत कर रहे थे और वह उन्हीं की गलती सिद्ध करने में अपनी पूरी ऊर्जा जाया कर रहा था. उसने मुझे एक बार देखा जरूर, पर फिर से सरदारजी से बहस में नईं ऊर्जा के साथ जुट गया. मैंने उसे टोकने की कोशिश की, तो उसने मुझे हाथ के इशारे से रोकते हुए सरदारजी से अपना मल्ल युद्ध जारी रखा. बहस से ध्यान हटाने के लिये अंततः उसने मुझसे अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिये पूछ ही लिया, “हाँ जी, कौन सी बैटरी चाहिए आपको?”. मेरे बताने पर कि मुझे फिलहाल कोई बैटरी नहीं चाहिये, और, कि समस्या क्या है, उसने गर्दन हिलाकर संकेत बनाते हुये, लगभग ६० डिग्री एंगल पर मुंह फेरते हुये दूसरे ग्राहक से बात करनी शुरू कर दी, हालाँकि सरदारजी की समस्या भी अभी हल नहीं हुई थी, लेकिन वह अब जोर-जोर से बोलने के बजाय बुदबुदा रहे थे, और दुकानदार भी अन्य ग्राहक को एक्सआइड की बैटरी की क्वालिटी और अन्य ब्रांड्स के रेट में अंतर के गणित को समझा रहा था. मैं अभी भी उसकी दुकान के बाहर बने ढाई फुट के प्लेटफार्म पर अपने पैर और काउंटर पर एक कुहनी टिकाये उसे आशा भरी नज़रों से देख रहा था.

दो मिनट के लगभग होने को आये, तब उसने फिर मेरी और ध्यान दिया और बोला, “यहाँ आपको टाइम वेस्ट करने का कोई फायदा नहीं है. यहाँ तो आपको नई बैटरी ही मिल सकती है, आप एक काम करें कि कंपनी चले जायें, वो कुछ न कुछ इंतज़ाम जरूर कर देंगे….” मैंने उसे शून्य में देखा. पर वह मेरी और से बेपरवाह होकर अपने काम में जुट गया था. अब मैं उसे कैसे बताऊँ कि कंपनी में तो सबसे पहले ही बात की थी मैंने ! फिर भी, मैंने दुकानदार को धन्यवाद ज्ञापित किया और न जाने क्या सोचकर कंपनी के वर्कशॉप की राह पकड़ ली, जो ट्रांसपोर्ट नगर के ठीक विपरीत निर्भय नगर में स्थित था. लगभग साढ़े चार मिनट में मैं हाईवे के भयावह रूप से चीखते से बेतरतीब ट्रैफिक और चौराहे को क्रॉस कर मुख्य मार्ग से होता हुआ फोर्ड के वर्कशॉप पहुँच गया. गेट के बाहर मैंने दीवार के सहारे बाइक खड़ी की. अन्दर जाकर मेरी निगाहें भान सिंह को खोजने लगी. वह निश्चित रूप से वहां नहीं दिख रहा था. एक मैकेनिक ने बताया कि वह शायद बॉडी शॉप में है, जहाँ गाड़ियों के डेंटिंग और पेंटिंग का काम किया जाता है. मैं वहां पहुंचा, तो भान सिंह निश्चिंत होकर एक स्टूल पर बैठे, अपने सहयोगी के साथ सिगरेट के धुवें का खेल कर रहे थे.

मुझे देखकर भान सिंह ने अपनी व्यस्तता कुछ कम की. बोले, “सर, मैंने तो आपको बताया था कि यहाँ से कुछ नहीं हो पायेगा. दरअसल, आपने व्हीकल-टो फैसिलिटी के लिये भी तो अपना रजिस्ट्रेशन नहीं कराया हुआ है”. मेरे याद दिलाने पर कि उन्हीं के सुझाव पर मैंने कंपनी के माध्यम से ही लगभग एक महीना पहले ही कम्प्रीहेंसिव बीमा कराया था, जिसके लिए खर्च किये गए १८,९२० रूपये का दर्द मुझे अभी तक महसूस हो रहा था, तो उन्होंने तत्काल मेरा ज्ञानवर्धन किया, कि “सर, बीमे में बैटरी, टायर, प्लास्टिक पार्ट और टोइंग की सुविधा शामिल नहीं होती है”.

मैंने बिना कुछ वापिस जाने में ही उचित समझा, क्यूंकि उसका मेरी सहायता करने का कुछ मूड या मन दिख ही नहीं रहा था. बहस कर के अपना मन भी ख़राब करो, और काम वहीँ का वहीँ. क्या करूं…किसी प्राइवेट गेराज में… या कुछ और… समझ ही नहीं आ रहा था. अब यह समस्या पत्नी की बीमारी से भी बड़ी होती दिख रही थी.

मैं वर्कशॉप के गेट से बाहर आ गया. मोटरसाइकिल अपनी जगह खड़ी थी.  मैंने उसे स्टैंड से नीचे उतारा, सीट पर बैठा और स्टार्ट करने से पहले मनन किया. मुझे आईडिया आया— क्यूँ न खंदारी वाले पंडित जी की मदद ली जाये ! पंडित जी की तो छोटी सी कार एक्सेसरीज की दुकान है…क्या वो मेरी कोई मदद कर पायेंगे बैटरी को ठीक कर, गाडी को चलाने में ? पता नहीं, मुझे लगा कि हो न हो, वह कोई रास्ता जरूर निकाल देंगे… मेरा अंतर्मन कह रहा था कि अब तक मुझे यह विचार क्यूँ नहीं आया..और, मैंने फोन करने की बजाय उत्साह में उनकी दुकान की तरफ अपनी बाइक का रुख मोड़ दिया.

पंडित जी की आगरा विश्वविद्यालय के खंदारी कैंपस के पास एक छोटी सी, कामचलाऊ कार साज-सामान की दुकान थी, लेकिन वो स्वयं एक बेहतर कार इलेक्ट्रीशियन और ए सी मैकेनिक ज्यादा थे. जब लोगों की समस्या कंपनी के वर्कशॉप में भी दूर नहीं हो पाती थी तो पंडित जी का नाम लिया जाता था. और कोई गाडी हो, कोई मॉडल हो, पंडित जी के दिमाग में कंप्यूटर की तरह सबके इलेक्ट्रिक डायग्राम का जाल बीचा हुआ था. ऐसा कभी नहीं हुआ होगा, कि किसी गाडी की इलेक्ट्रिक फिटिंग की समस्या पंडित जी ने दूर न कर दी हो. और खर्चा ? एक बार मुझे अपनी गाडी के पिछले वाइपर को सुचारू करना था, तो कंपनी ने जो खर्चा बताया वह मशीन बदलने में रु. ९८०० का था, और पंडित जी ने उसे मात्र १५० रु. में ऐसा चालू किया कि आज तक कोई असुविधा नहीं हुई. कोई मशीन नहीं बदली गई, केवल कुछ कनेक्शन ठीक किये उन्होंने. उसपर उनकी जुबान की गारंटी कि कभी भी चले आना, निस्संकोच अगर कभी काम ना करे वो वाईपर ! पर, वैसी नौबत तो आई ही नहीं कभी. मोबाइल चार्जिंग के लिये यू एस बी पोर्ट के तो उन्होंने मुझसे पैसे ही नहीं लिये एक बार, मेरे बार-बार आग्रह के बावजूद. वो अक्सर मुझे अपनी सबसे प्रिय चेयर को झाड-पोंछ कर उसपर आग्रहपूर्वक बिठा देते और तल्लीनता के साथ भरी धूप में गाडी के साथ अपने काम में व्यस्त हो जाते.  एक छोटा सा कूलर भी था दूकान में, जिसको वे उस समय ऑन करना नहीं भूलते गर्मियों में. न जाने कितनी बार उन्होंने मुझे कुल्हड़ की स्पेशल लस्सी पिलाई होगी, और कभी कोई फल काटकर…सेब, केला, चीकू खिलाया या फिर चाय. मेरे ऊपर उनकी कुछ विशेष कृपा रही हो, ऐसा भी नहीं, वह सामान्य रूप से ऐसे ही व्यवहार के लिये जाने जाते थे. देखने में वह जितने दुर्बल लगते थे, काम करने में उतनी ही स्फूर्ति ेतथा ऊर्जा के धनी थे.

खैर, मैं लगभग छः-सात मिनट में पंडित जी की दुकान पर पहुँच गया था. बाइक खड़ी कर मैं ऊपर दुकान पर देखा तो दुकान तो खुली थी पर वहां कोई नहीं था. यह कोई ख़ास बात नहीं थी, अक्सर ऐसा होता था. फोन करने पर वह कहीं से प्रकट हो जाते या क्षमा मांग लेते, तुरंत ना आ पाने के लिये.  मैंने दुकान पर खड़े-खड़े ही उनको फोन लगाया. कुछ देर बाद पंडित जी ने कॉल पिक की. उन्होंने अभिवादन के बाद काम पूछा. ट्रैफिक की आवाजों से स्पष्ट था कि वह रास्ते में हैं. मैंने उन्हें अपनी समस्या बताते हुये कुछ अर्जेंट व्यवस्था के लिए अनुरोध किया. उन्होंने कुछ क्षण सोचा, और कहा, “ठीक है सर, आप घर पहुँचो. मैं नजदीक पहुँच कर आपको फोन करता हूँ. हो जाएगा आपका काम !”

मुझे इतनी प्रसन्नता हुई कि मैं व्यक्त नहीं कर पा रहा हूँ, पर मुझे अपनी मूर्खता पर पश्चाताप हो रहा था कि पंडित जी से संपर्क करने का विचार मुझे पहले क्यूँ नहीं आया. इस भागदौड़ में लगभग पौने दो घंटे बीत चुके थे. मैं तत्काल घर लौट आया और मुंह-हाथ धोकर फोन की प्रतीक्षा करने लगा पंडित जी के. पत्नी समझ चुकी थी कि आज की डेट में तो डॉक्टर के पास जाना संभव नहीं हो पायेगा, इसलिए वह अपने कपडे बदलकर टीवी पर दिन में ही अपने किसी पसंदीदा कार्यक्रम को देख रही थी, या देखने का उपक्रम कर रही थी. मैंने उसे स्थिति से अपडेट कराना चाहा, परन्तु उसने कोई रूचि न लेकर टीवी का वॉल्यूम बढा दिया. अब मैं कैसे समझाऊँ कि इस सब में मेरा कोई दोष नहीं.

मोबाइल की घंटी बजी. एक निगाह घडी पर डाली तो समझ में आ गया कि मुझे वापिस लौटे मात्र १७ मिनट ही हुए होंगे. पंडित जी की कॉल थी, वह घर के पास ही, पोस्ट ऑफिस के सामने खड़े थे, वही पॉइंट जो मैंने उन्हें समझाया था. मैंने उन्हें रास्ता बताया और तेज़ी से स्वयं भी जीना उतर कर घर के बाहर आ गया. ३० सेकंड नहीं हुये होंगे कि पंडित जी अपने पुराने वेस्पा स्कूटर पर एक साथी और एक स्टैंड-बाई बैटरी के साथ मौजूद थे.

इस पौने दो, या दो घंटों की भागदौड़ में मैं इस सीमा तक निराश हो चुका था कि मुझे पंडित जी का आना एक अद्भुद घटना लग रही थी. ऐसा लग रहा था कि वह मुझे मेरे जीवन की सबसे बड़ी समस्या से उबारने के लिये ईश्वरीय दूत बनकर प्रकट हुये हैं.

पंडित जी ने बिना समय व्यय किये, गाडी का बोनट खोला. उनके साथ आये व्यक्ति ने बैटरी को गाडी में लगी बैटरी के पॉइंट्स को अपनी बैटरी से एक लीड से टच कर मुझे इग्निशन लगाने का निर्देश दिया. वाह ! एक ही सेल्फ में गाडी चमत्कार की तरह स्टार्ट हो गई. मेरा दिल प्रसन्नता से भर आया और पंडित जी का आभार व्यक्त करते हुये मैं भावुक हो उठा. मैंने पंडित जी से इस सबके लिए खर्चा पूछा, तो उन्होंने हंस कर मना कर दिया. उनके शब्दों में, “सर, मेरी इसमें कोई लागत थोड़े ही आई है, जो मैं आपसे खर्चा लूँगा. बस, मैं कहीं रास्ते में था, वहां कल चला जाऊंगा.” मुझे पंडित जी की सह्रदयता ने निरुत्तर कर दिया. कम से कम आने-जाने में रु. ५० का पेट्रोल तो लगा ही होगा. और फिर इन कामों में तो हुनर का खर्च देय होता है, वह तो उनका बनता ही था. पर, उन्हें पैसे नहीं लेने थे, सो उन्होंने नहीं लिये, मुझे दृढ़ता से मना कर दिया.

चूँकि वह पहली बार मेरे घर आये थे, अतः मैंने उनसे ऊपर चलकर एक कप चाय पीने का आग्रह किया. लेकिन उन्होंने विनम्रता से अस्वीकार कर दिया और हाथ जोड़कर वापिस हो लिये. मैं उन्हें लगभग दो दशक पुराने वेस्पा स्कूटर पर जाते हुये देखता रहा जो अजीब सी आवाजों के साथ-साथ सफ़ेद धुवें के गुबार छोड़ता चला जा रहा था.

किस्सा अभी खत्म नहीं हुआ है.

चूँकि डॉक्टर साहब प्रातः १० से दोपहर १ बजे तक ही बैठते थे, तो, आज का दिन तो मिस हो गया उन्हें दिखाने का. अगले दिन फिर डॉक्टर साहब के पास जाने का उपक्रम दोहराया जाना था. मैंने पंडित जी के निर्देशानुसार गाडी को १० मिनट तक स्टार्ट रखा. आज पत्नी को गाडी में बिठाने से पूर्व ही सावधानीवश मैं गाडी पहले ही स्टार्ट कर देख आया था. मैंने पत्नी को आवाज लगाई और वह अपने पर्स व पर्चों के साथ गाडी में आकर बैठ गई.

लगभग १५ मिनट बाद हम डॉक्टर वशिष्ठ के क्लिनिक पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके थे. आज हमारा अपॉइंटमेंट नहीं था इसलिये यूँ भी पेशेंट्स की भीड़ कुछ ज्यादा दिख रही थी. रिसेप्शन पर नाम लिखा कर हम लाउन्ज में बैठ गये, जहाँ लगभग १८-२० लोग पहले से अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे. हम भी  डॉक्टर साहब के केबिन की तरफ टकटकी लगाये देख रहे थे. यकायक डॉक्टर साहब के केबिन से घंटी बजी, जो इस बात का संकेत था, कि अगले मरीज़ का नंबर आ चुका है… चर्र की आवाज से उनका दरवाज़ा खुलते ही मैंने जो देखा, उस पर मैं यकायक यकीन नहीं कर सका. पर, यकीनन मैं जो देख रहा था, वही सच था.

पंडित जी एक हमउम्र महिला को एक ओर से सहारा देते हुये बाहर ला रहे थे. उसकी पीड़ा चेहरे पर साफ़ दिख रही थी. दूसरी ओर से उस स्त्री को एक लगभग १५ वर्ष के बच्चे ने संभाल रखा था, जो संभवतः उनका बेटा था. महिला के उदर के भाग पर खाकी रंग की चौड़ी पट्टी वाली वह बेल्ट कस कर बंधी थी जो स्लिप डिस्क के गंभीर रोगियों को बाँधने की सलाह दी जाती है.

मेरे कदम कब पंडित जी के पास पहुँचने की लगभग १५ फुट की दूरी नाप चुके थे, मुझे स्वयं ही पता नहीं चला. तब तक पंडित जी ने भी मुझे देख लिया था. वह चेहरे पर अपनी चिरपरिचित मुस्कुराहट ओढने की कोशिश करते दिख रहे थे. मैंने नजदीक जाकर उनका हाथ अपने हाथ में ले लिया. “क्या हुआ पंडित जी ?”, मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि कई वर्षों से उनकी पत्नी स्लिप डिस्क से गंभीर रूप से पीड़ित है. कल भी वह पत्नी को दिखाने के लिये ही निकल चुके थे, तभी मेरा फोन आ गया, और बात करने के बाद उन्होंने अपना प्रोग्राम टाल कर मेरी मदद करने का फैसला लिया था.

मैंने सरसरी तौर से उनके पर्चे पर निगाह दौड़ाई. फिजियोथेरेपी की कई एक्सरसाइज तथा कैल्शियम के तीन महीनों का इन्जेक्टिब्ल कोर्स भी उसमे पहले ही लिखा था. कुल मिलाकर १५ से १८ हज़ार रूपये प्रतिमाह का कुल खर्चा था—वो भी लगातार तीन महीनों तक. दरअसल, वह उन्हें इसलिये दिखाने आये थे कि डॉक्टर साहब कोई सस्ता विकल्प सुझा सकें. पर डॉक्टर साहब का कहना था कि आम दवाओं से और बिना फिजियोथेरेपी कराये इस गंभीर स्थिति में कोई ख़ास लाभ नहीं होने वाला.

मुझे याद है कि लखनऊ में रहते हुये पत्नी के गार्डनिंग के शौक और भारी-भारी गमलों को सर्वेंट के साथ-साथ स्वयं उठाकर इधर-उधर रखने की जिद से उसे जब स्लिप डिस्क की परेशानी हुई थी, तो मैं तो एक बार समझ ही नहीं सका था, कि यह क्या हो गया ! उफ्फ, उस असहनीय दर्द की केवल कल्पना ही की जा सकती है. किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉक्टर शर्मा के घर जब उन्हें मैं दिखाने ले गया था, तो चाहकर भी वह गाडी से उतरकर उनके क्लीनिक तक पहुँचने की हिम्मत नहीं कर पाई थी…एक-एक कदम चलना उनके लिये दर्द का घूँट पीने जैसा था…और इनकी हालत तो और भी ख़राब दिख रही थी. ना चाहते हुये भी सारा दृश्य मेरी आँखों के सामने किसी फ़िल्मी घटना के दृश्य की तरह कौंध गया. सर्दी का मौसम था, पर मेरे माथे पर पसीने की बूँदें चुहचुहा गयी थी. पंडित जी की पत्नी की हालत और मेरे कारण कल उनके अपॉइंटमेंट मिस होने की ग्लानि से मैं हतप्रभ हो गया था. साथ ही उनकी आर्थिक स्थिति में इलाज़ की क्षीण संभावनाओं को सोचकर मैं उलझन में पड गया.

जब तक मैं कुछ सोचता, पंडित जी ने मुझसे इजाजत मांगी. मैं उन्हें छोड़ने बाहर तक आया. बाहर पंडित जी ने जतन से अपनी पत्नी को स्कूटर पर बिठाया, बेटे ने एक ओर से सहारा देकर उसी स्कूटर पर अपनी बैठने की भी जगह बनाई, उन्होंने अपना हेलमेट लगाया, और अपने चिर-परिचित जोशीले अभिवादन के लिये एक हाथ ऊपर तथा गर्दन धीरे से नीचे झुकाई, उनकी पत्नी ने भी दर्द के बावजूद एक हल्की मुस्कान चेहरे पर ओढ़ी और अभिवादन में हाथ जोड़ दिये. स्कूटर स्टार्ट हो चुका था… पंडित जी अपने गंतव्य की ओर चल निकले.

…मैं यूँ ही खड़ा रहा कुछ देर वहां ! पंडित जी की पत्नी के दर्द का तो मुझे अनुमान नहीं, लेकिन मेरे अन्दर का दर्द बढ़ गया लगता था. ग्लानि से मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था कि कल वह मेरे कितना काम आये और मैं उनके लिये किसी काम का साबित नहीं हो पा रहा हूँ. पंडित जी के सामने मैं स्वयं को बहुत बौना समझ रहा था. उनके कद तक पहुँचने में यह जीवन भी कम लग रहा था. मैं जानता था कि वह मेरी किसी भी तरह की आर्थिक सहायता के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर देंगे, इसलिये मैं ऐसे किसी प्रस्ताव को कहने का साहस भी नहीं जुटा पाया, और उन्होंने मुझसे सहज भाव से विदा भी ले ली. उनकी पत्नी की रोग की पीड़ा से कहीं अधिक उनके चेहरे पर आत्म सम्मान और संतुष्टि के भाव, और उनकी चमक दिख रही थी– ऐसी आत्म संतुष्टि, जिसके लिये हम प्रयास तो करते हैं, पर वह हमारे आस-पास भी नहीं फटकती !

–राजगोपाल सिंह वर्मा 

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