मेरा विश्वास

तुममें निहित हैं... कुछ कल्पनाएं... स्वप्न..रचनाधर्मिता के, और सुखद अहसास... तुम्हारी सहज-सी भावनाओं के... वह प्रतीति... जिससे तुम्हारा होना... अर्थपूर्ण बनता है...

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गुलदोपहरी का फूल

बस.. उगना.. बढना… फ़ैलते जाना… बिना किसी खुशबू के.. सिमट जाना.. और अंततः मिट जाना… फिर एक दिन… हमेशा के लिए… इस जिजीविषा में… यही है न… नियति मेरी ?

धूप हूँ मैं

जानते तुम भी हो... धूप और अंधेरों के मायने... एक आशा जगाता... तो दूसरा निराशा कहलाता, बस अवसाद की ही... राह दिखाता... और मैंने तो हमेशा... आशाएँ बांटी हैं,

मंगलेश डबराल का सानिध्य : हिन्दी कविता का एक शालीन नाम

मंगलेश डबराल का व्यक्तित्व कुछ ऐसा था कि वह अपने खादी के एक झोले को लटकाए जब कहीं निकलते थे, तो ऐसा लगता था कि गली के नुक्कड़ वाला कोई पडौसी आपके निकट से निकल कर चला जा रहा है. लेश मात्र भी बनावटीपन नहीं. न दिखने में, न पहनने में, न बातचीत में और न ही व्यवहार में. यह बात तब की है जब मैं कन्हैया लाल नंदन जी के भी संपर्क में नहीं आया था. डबराल जी ने मुझे बहुत प्रोत्साहित किया. विषय देकर लेख लिखवाये और सम्मानजनक भुगतान भी कराया.

आप पर गर्व है डॉ अनूप खरे !

अनूप खरे आगरा के प्रतिष्ठित ऑर्थोपेडिक सर्जन हैं. वह स्वयं अपना क्लिनिक चलाते हैं और कई प्रतिष्ठित नर्सिंग होम्स में अपनी सेवाएँ भी देते हैं. पत्नी को उनकी हड्डियों की समस्या के कारण दिखाना था. पहली बार की भेंट ने ही उन्होंने हम लोगों का दिल जीत लिया. फीस तो उनको भी अदा ही की न. पर जिस निश्छल तथा निर्मल स्वभाव से वह पेशेंट्स को पूरी तल्लीनता से समय देते हैं, और उससे व्यक्तिगत संवाद स्थापित करते हैं हैं, वह चमत्कारिक है.

प्रारब्ध

हालांकि ठाकुर साब से मेरी मित्रता अधिक पुरानी भी नहीं थी. मात्र लगभग साढ़े तीन साल हुए थे, उनसे मुलाक़ात हुए, और वह भी वाकिंग प्लाजा में. कॉलोनी का यह पार्क टहलने वालों के लिए स्वर्ग से कम नहीं था. ठाकुर साब अपने आठ-दस लोगों की मण्डली में चुटकुले और अपने किस्से सुनाते हुए तेज़ और सधे क़दमों से जब पार्क की दूरियां नापते तो कोई अनजान व्यक्ति भी समझ सकता था कि यह छः फीट का इंसान जरूर किसी पुलिस, सेना या ऐसी ही किसी संस्था से जुडा होगा, जहाँ चुस्ती और फिटनेस की अलग ही महत्ता है.